गढ़चिरौली: महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस और उनकी सरकार अक्सर विकास, आधुनिक बुनियादी ढांचे, तेज़ प्रगति और आदिवासी क्षेत्रों के उत्थान के बड़े-बड़े दावे करते रहे हैं। लेकिन गढ़चिरौली के जपतलाई गांव के एक आदिवासी आवासीय स्कूल से सामने आई घटना ने इन दावों के सामने एक बेहद दर्दनाक और शर्मनाक सवाल खड़ा कर दिया है—जो सरकार आदिवासी बच्चियों को जमीन पर सोने से बचाने के लिए बिस्तर तक उपलब्ध नहीं करा सकती, वह आखिर किस विकास की बात करती है? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
एक सरकारी सहायता प्राप्त आश्रम स्कूल के हॉस्टल में जमीन पर सो रही बच्चियों को जहरीले सांप ने काट लिया। तीन मासूम छात्राओं—जिनकी उम्र महज 8, 12 और 14 वर्ष थी—ने अपनी जान गंवा दी। कई अन्य बच्चियां प्रभावित हुईं, जिनमें एक को गंभीर हालत में इलाज के लिए नागपुर ले जाना पड़ा। यह केवल एक दुखद दुर्घटना नहीं है। यह उस व्यवस्था की नाकामी का परिणाम है, जिसमें वर्षों से चल रहे एक आवासीय स्कूल में बच्चों के सुरक्षित सोने तक की व्यवस्था नहीं हो सकी।
सांप ने काटा, लेकिन सवाल व्यवस्था पर है
सरकार और प्रशासन यह कह सकते हैं कि सांप प्राकृतिक रूप से स्कूल परिसर में घुस आया। यह भी कहा जा सकता है कि खिड़की खुली थी, सुरक्षा में लापरवाही हुई या स्कूल प्रबंधन जिम्मेदार था। इन सभी पहलुओं की जांच होनी चाहिए और दोषियों पर कार्रवाई भी। लेकिन क्या केवल स्कूल का लाइसेंस रद्द कर देना तीन बच्चियों की मौत का जवाब है?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि बच्चियां जमीन पर सोने को मजबूर क्यों थीं?
रिपोर्टों के अनुसार, स्कूल में बिस्तरों की कमी का मुद्दा पहले भी उठाया गया था और छात्रों के लिए बिस्तरों की व्यवस्था भविष्य में करने का आश्वासन दिया गया था। यानी समस्या अचानक पैदा नहीं हुई थी। यदि बच्चों को सुरक्षित पलंग या उचित बिस्तर उपलब्ध होते, हॉस्टल की खिड़कियों और दरवाजों की सुरक्षा सुनिश्चित होती, सांपों से बचाव के इंतजाम होते और रात में जिम्मेदार कर्मचारी मौजूद रहते, तो क्या इस त्रासदी को रोका नहीं जा सकता था?
यहां सवाल सिर्फ सांप का नहीं है। सवाल उस सरकारी प्राथमिकता का है, जिसमें करोड़ों रुपये के विकास प्रकल्पों, विज्ञापनों और राजनीतिक आयोजनों के बीच आदिवासी बच्चों के लिए एक बिस्तर तक प्राथमिकता नहीं बन सका।
‘विकसित महाराष्ट्र’ के दावे और जमीन पर सोते बच्चे
आज सरकार विकास की तस्वीर बड़े एक्सप्रेसवे, विशाल इमारतों, निवेश सम्मेलनों और चमकदार परियोजनाओं के जरिए पेश करती है। लेकिन किसी भी सरकार के विकास की असली परीक्षा मुंबई की चमकती सड़कों पर नहीं, बल्कि गढ़चिरौली जैसे दूरदराज और आदिवासी इलाकों में होती है। अगर किसी आदिवासी बच्ची को शिक्षा पाने के लिए घर छोड़कर आवासीय स्कूल जाना पड़े और वहां उसे बिस्तर के बजाय जमीन पर चटाई बिछाकर सोना पड़े, तो सरकार के विकास मॉडल पर सवाल उठना स्वाभाविक है।
यह कैसी व्यवस्था है जिसमें सरकार बच्चों को स्कूल में भर्ती तो कर लेती है, लेकिन उनके लिए सुरक्षित आवास सुनिश्चित नहीं कर पाती? यह कैसी शिक्षा नीति है जिसमें किताबों और दाखिले के आंकड़े तो गिनाए जाते हैं, लेकिन यह देखने वाला कोई नहीं कि बच्चा रात को सो कहां रहा है? और यह कैसा विकास है जिसमें आदिवासी बच्चों की सुरक्षा को तब गंभीरता से लिया जाता है, जब तीन मासूम जानें चली जाती हैं?
घटना के बाद कार्रवाई—पहले व्यवस्था क्यों नहीं?
तीन बच्चियों की मौत के बाद मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने स्कूल का लाइसेंस स्थायी रूप से रद्द करने का आदेश दिया। अधिकारियों और प्रबंधन को नोटिस दिए गए, जांच शुरू हुई और राज्य के सैकड़ों आदिवासी आवासीय स्कूलों के तीसरे पक्ष से ऑडिट कराने की बात कही गई। लेकिन यहां एक और सवाल उठता है—यह ऑडिट पहले क्यों नहीं हुआ? क्या सरकार को यह जानने के लिए तीन बच्चियों की मौत का इंतजार करना पड़ा कि आदिवासी आवासीय स्कूलों में बिस्तर, सुरक्षा, कर्मचारियों, स्वास्थ्य सुविधाओं और बुनियादी ढांचे की क्या स्थिति है?
यदि राज्य में 500 से अधिक आश्रम स्कूल हैं और अब उनकी जांच तथा सत्यापन की आवश्यकता महसूस हो रही है, तो इसका सीधा अर्थ है कि इतने वर्षों से इन संस्थानों की स्थिति पर पर्याप्त और नियमित निगरानी नहीं की गई। त्रासदी के बाद जांच बैठाना आसान है। लाइसेंस रद्द करना भी आसान है। लेकिन सरकार की असली जिम्मेदारी मौत के बाद कार्रवाई नहीं, मौत से पहले सुरक्षा सुनिश्चित करना है।
10 किलोमीटर की दूरी और एक कमजोर व्यवस्था
रिपोर्टों के अनुसार, सबसे नजदीकी अस्पताल करीब 10 किलोमीटर दूर था। बारिश और खराब सड़क की वजह से अस्पताल पहुंचने में देरी हुई। यह भी सवाल उठाता है कि दूरदराज के आदिवासी क्षेत्रों में शिक्षा, स्वास्थ्य और सड़क जैसी मूलभूत सुविधाओं को लेकर सरकार की तैयारी आखिर कितनी मजबूत है? सरकारें अक्सर आंकड़ों में विकास दिखाती हैं।
कितने स्कूल खोले गए, कितने करोड़ का बजट दिया गया, कितनी योजनाएं शुरू की गईं—लेकिन जब आपातकाल में एक घायल बच्ची को समय पर अस्पताल पहुंचाना मुश्किल हो जाए, तब इन आंकड़ों के पीछे की हकीकत सामने आती है। विकास का मतलब केवल नई सड़क का उद्घाटन नहीं है। विकास का मतलब यह भी है कि उस सड़क से एक घायल बच्ची समय पर अस्पताल पहुंच सके।
आदिवासी बच्चों के साथ दोयम दर्जे का व्यवहार क्यों?
गढ़चिरौली की यह घटना एक और कड़वा सवाल खड़ा करती है—क्या राज्य के सबसे कमजोर और दूरदराज के समुदायों के बच्चों को वास्तव में वही सुविधाएं मिल रही हैं, जिनका वादा संविधान और सरकारें करती हैं? यदि यही घटना किसी बड़े शहर के महंगे निजी स्कूल या किसी प्रभावशाली वर्ग के बच्चों के हॉस्टल में होती, जहां बच्चे जमीन पर सो रहे होते, सुरक्षा के लिए कोई वॉर्डन मौजूद नहीं होता और सांप के काटने के बाद अस्पताल पहुंचने में भारी देरी होती—तो क्या सरकार और प्रशासन इतने वर्षों तक ऐसी व्यवस्था को चलने देते?
आदिवासी बच्चों की जिंदगी भी उतनी ही कीमती है। उन्हें भी सुरक्षित कमरा, बिस्तर, स्वच्छ परिसर, पर्याप्त कर्मचारी, चिकित्सा सुविधा और आपातकालीन व्यवस्था चाहिए। यह कोई विशेष सुविधा या एहसान नहीं, बल्कि सरकार की बुनियादी जिम्मेदारी है।
सिर्फ ट्रस्ट को दोष देकर सरकार बच नहीं सकती
स्कूल एक ट्रस्ट द्वारा संचालित था और उसके प्रबंधन की जिम्मेदारी तय होना आवश्यक है। यदि प्रबंधन ने सुरक्षा नियमों की अनदेखी की, बिस्तरों की व्यवस्था नहीं की या कर्मचारियों की नियुक्ति में लापरवाही बरती, तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए। लेकिन स्कूल सरकारी सहायता प्राप्त था। इसका मतलब यह है कि सरकार की जिम्मेदारी केवल धन देने के बाद समाप्त नहीं हो जाती। सरकारी सहायता के साथ सरकारी निगरानी, नियमित निरीक्षण और बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करने की जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है। इसलिए इस मामले को केवल ट्रस्ट या स्कूल प्रबंधन की विफलता बताकर सरकार अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकती।
विकास के दावों की असली परीक्षा
देवेंद्र फडणवीस सरकार को इस घटना को केवल एक प्रशासनिक दुर्घटना मानकर आगे नहीं बढ़ जाना चाहिए। यह घटना उस ‘विकास’ के दावे की परीक्षा है, जिसकी तस्वीर सरकार लगातार पेश करती रही है। जब आदिवासी इलाकों के बच्चों को सुरक्षित बिस्तर नहीं मिलता, हॉस्टल में पर्याप्त निगरानी नहीं होती, सांपों से बचाव की व्यवस्था कमजोर होती है और अस्पताल तक पहुंचने वाली सड़कें आपात स्थिति में बाधा बन जाती हैं, तो सरकार के विकास के दावे खोखले नजर आते हैं।
जो सरकार करोड़ों और अरबों की परियोजनाओं के दावे करती है, लेकिन आदिवासी बच्चियों के सोने के लिए बिस्तर तक उपलब्ध नहीं करा पाती, उसे विकास के अपने मॉडल पर गंभीर आत्ममंथन करना चाहिए। तीन बच्चियों की मौत के बाद पांच-पांच लाख रुपये का मुआवजा, जांच समिति, नोटिस और लाइसेंस रद्द करने की कार्रवाई जरूरी हो सकती है। लेकिन कोई भी मुआवजा उन परिवारों के बच्चों को वापस नहीं ला सकता। अब जरूरत केवल दोषियों को खोजने की नहीं, बल्कि पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा करने की है।
गढ़चिरौली की तीन बच्चियों की मौत महाराष्ट्र सरकार से एक सीधा सवाल पूछती है—जब आपके ‘विकास’ में आदिवासी बच्चों के लिए एक सुरक्षित बिस्तर तक नहीं है, तो फिर यह विकास आखिर किसके लिए है? और इस सवाल का जवाब केवल जांच रिपोर्ट से नहीं, बल्कि राज्य के हर आदिवासी आवासीय स्कूल में वास्तविक सुधार करके देना होगा। क्योंकि अगली बार कोई जांच समिति बैठाने से पहले सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए कि किसी और मां को अपने बच्चे की लाश देखकर यह न पूछना पड़े—“मेरी बेटी को पढ़ने भेजा था, मरने के लिए नहीं।”
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