15 अगस्त सिर्फ कैलेंडर की एक तारीख नहीं है। यह वह दिन है जब हम उन लाखों लोगों को याद करते हैं जिन्होंने अंग्रेज़ी हुकूमत से आज़ादी के लिए अपना सब कुछ कुर्बान कर दिया। हर साल लाल किले से आज़ादी, विकास और दुनिया में भारत की बढ़ती ताकत की बातें होती हैं। तिरंगा शान से लहराता है और पूरा देश देशभक्ति के रंग में रंग जाता है।लेकिन इस बार जश्न के साथ कुछ सवाल भी जरूरी हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
क्या आज़ादी सिर्फ सत्ता बदलने का नाम है? क्या उस गरीब के लिए देश आज़ाद है जिसके घर का बजट महंगाई ने बिगाड़ दिया? क्या उस युवा के लिए देश आज़ाद है जो पढ़ाई करने के बाद भी रोजगार के लिए दर-दर भटक रहा है? क्या उस नागरिक के लिए आज़ादी पूरी है जो अपनी धार्मिक पहचान के कारण डर, नफरत और भेदभाव का सामना करता है?आज देश की सबसे बड़ी चिंताओं में महंगाई और बेरोज़गारी शामिल हैं। नौजवानों के हाथ में डिग्रियां हैं, लेकिन स्थायी रोजगार के अवसर उनकी उम्मीदों के मुकाबले कम दिखाई देते हैं। किसान अपनी मेहनत और लागत के बीच फंसा हुआ है।
छोटे व्यापारी आर्थिक दबाव झेल रहे हैं और आम परिवार रोजमर्रा की जरूरतों का हिसाब लगाने को मजबूर है। सरकार विकास के बड़े आंकड़े और उपलब्धियां गिनाती है, लेकिन लोकतंत्र में केवल आंकड़े काफी नहीं होते। आम आदमी की जिंदगी में कितना बदलाव आया—यह भी विकास की कसौटी होनी चाहिए। भ्रष्टाचार के खिलाफ लड़ाई के दावे भी लगातार होते रहे हैं। लेकिन आम नागरिक के लिए सवाल आज भी वही है—सरकारी दफ्तर में काम कराने के लिए उसे कितने चक्कर लगाने पड़ते हैं? व्यवस्था में राजनीतिक प्रभाव और बड़े लोगों की पहुंच कितनी मजबूत है?
क्या कानून और सरकारी संस्थाएं वास्तव में हर नागरिक के लिए समान रूप से काम करती हैं? और फिर आता है सबसे गंभीर सवाल—सामाजिक माहौल का। पिछले वर्षों में देश में धार्मिक पहचान के नाम पर बढ़ती नफरत, हेट स्पीच, सोशल मीडिया पर जहरीली भाषा, आर्थिक और सामाजिक बहिष्कार की अपीलें तथा अल्पसंख्यकों के खिलाफ भेदभाव के आरोप बार-बार सामने आए हैं। कहीं किसी के खान-पान को लेकर विवाद, कहीं धार्मिक पहचान को लेकर हिंसा, कहीं मकान-दुकान के बहिष्कार की बातें और कहीं मंचों से खुलेआम नफरत भरे बयान—यह सब उस भारत की तस्वीर नहीं हो सकती जिसकी कल्पना हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने की थी।
भारत की आज़ादी किसी एक धर्म, जाति या बहुसंख्यक समुदाय की आज़ादी नहीं थी। यह मुसलमान की भी आज़ादी थी, हिंदू की भी; सिख की भी, ईसाई की भी; दलित की भी, आदिवासी की भी; गरीब की भी और अमीर की भी। इसीलिए जब किसी अल्पसंख्यक नागरिक को उसकी पहचान के कारण निशाना बनाया जाता है, जब उसके खिलाफ नफरत फैलाने वालों को राजनीतिक संरक्षण मिलने के आरोप लगते हैं, जब सामाजिक बहिष्कार की आवाजें उठती हैं या जब किसी व्यक्ति को अदालत के फैसले से पहले ही भीड़ दोषी मान लेती है, तब सवाल केवल एक समुदाय का नहीं रहता—सवाल संविधान और लोकतंत्र का बन जाता है।
भाजपा सरकार के वर्षों में देश ने कई क्षेत्रों में प्रगति की है, इसे नकारा नहीं जा सकता। लेकिन लोकतंत्र में सरकार की उपलब्धियों के साथ उसकी कमियों पर सवाल करना भी उतना ही जरूरी है। बेरोज़गारी, महंगाई, किसानों की परेशानी, भ्रष्टाचार, बढ़ती असमानता, संस्थाओं की स्वतंत्रता, पत्रकारिता की आज़ादी और सामाजिक तनाव जैसे सवालों को केवल विपक्ष की राजनीति कहकर टाला नहीं जा सकता। सरकार से सवाल करना देश से सवाल करना नहीं है। सरकार की आलोचना देश की आलोचना नहीं है। बल्कि लोकतंत्र में मजबूत सरकार वही है जो आलोचना सुन सके, सवालों का जवाब दे सके और अपनी नीतियों की जांच के लिए स्वतंत्र संस्थाओं को जगह दे।
आज हमें यह भी देखना होगा कि संविधान ने जिस समानता का वादा किया था, वह जमीन पर कितनी दिखाई देती है। कानून की नजर में हिंदू और मुसलमान, अमीर और गरीब, सत्ता के करीब और सत्ता के विरोधी—क्या वास्तव में सभी बराबर हैं? अगर किसी गरीब का घर गिराने से पहले कानून की पूरी प्रक्रिया जरूरी है तो वही प्रक्रिया हर नागरिक के लिए होनी चाहिए। अगर किसी पर अपराध का आरोप है तो फैसला अदालत करेगी, भीड़ नहीं। अगर कोई नेता हेट स्पीच देता है तो कार्रवाई उसकी पहचान देखकर नहीं, कानून देखकर होनी चाहिए। यही तो संविधान की असली परीक्षा है।
15 अगस्त पर हम पाकिस्तान, चीन या किसी दूसरे देश से तुलना करके अपनी उपलब्धियां गिना सकते हैं। लेकिन सबसे जरूरी तुलना अपने संविधान के आदर्शों से होनी चाहिए। क्या हमारे बच्चे सुरक्षित भविष्य देख रहे हैं? क्या युवाओं को रोजगार मिल रहा है? क्या गरीब सम्मान के साथ जी रहा है? क्या किसान अपनी मेहनत का उचित मूल्य पा रहा है? क्या पत्रकार बिना डर सवाल पूछ सकता है? क्या अल्पसंख्यक अपने धर्म और पहचान के साथ सुरक्षित महसूस कर सकता है?
क्या सरकार से असहमति रखने वाला नागरिक देशद्रोही नहीं, बल्कि लोकतंत्र का हिस्सा माना जाता है? अगर इन सवालों के जवाब में कहीं कमी है तो 15 अगस्त हमें सिर्फ जश्न मनाने का नहीं, आत्ममंथन करने का भी अवसर देता है। आजादी का अर्थ केवल यह नहीं कि देश पर किसी विदेशी का शासन नहीं है। असली आजादी तब होगी जब कोई नागरिक भूख से मजबूर न हो, युवा बेरोजगारी से निराश न हो, गरीब न्याय के लिए तरसे नहीं और किसी इंसान को उसकी धार्मिक पहचान के कारण डर में न जीना पड़े।
इस 15 अगस्त को तिरंगा जरूर फहराएं। राष्ट्रगान जरूर गाएं। देश के लिए शहीद हुए लोगों को सलाम जरूर करें। लेकिन साथ में यह संकल्प भी लें कि नफरत के सामने खामोश नहीं रहेंगे, अन्याय को सामान्य नहीं मानेंगे, भेदभाव को स्वीकार नहीं करेंगे और सत्ता से सवाल पूछने के लोकतांत्रिक अधिकार को कभी नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि देशभक्ति का अर्थ केवल सरकार की प्रशंसा करना नहीं है।
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