मंगलुरु से सामने आई यह खबर सिर्फ एक व्यक्ति के पत्र की खबर नहीं है। यह उस बड़े सवाल को सामने लाती है, जिससे भारतीय लोकतंत्र लंबे समय से जूझ रहा है। आखिर धर्म के नाम पर पैदा की जा रही नफरत की जिम्मेदारी किसकी है और इसकी सीमा कहां खत्म होती है? राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के पूर्व प्रचारक यशवंत सहदेव शिंदे ने कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह को पत्र लिखकर आरएसएस, विश्व हिंदू परिषद (विहिप) और बजरंग दल को ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित करने की मांग की है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
शिंदे ने कुछ वरिष्ठ हिंदुत्ववादी नेताओं पर 2000 के दशक के कथित बम विस्फोटों से जुड़े होने के आरोप भी लगाए हैं। इन आरोपों की अपनी कानूनी स्थिति है। जिन मामलों में अदालतें आरोपियों को बरी कर चुकी हैं, वहां किसी व्यक्ति या संगठन को दोषी घोषित करना न्यायिक रूप से उचित नहीं होगा। लेकिन लोकतंत्र में बरी होना और किसी गंभीर आरोप की स्वतंत्र जांच की जरूरत खत्म हो जाना दो अलग बातें हैं। यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है।
सवाल सिर्फ बम धमाकों का नहीं, नफरत के उस माहौल का भी है
भारत जैसे बहुधार्मिक देश में सबसे बड़ा खतरा केवल हिंसा नहीं है। उससे पहले पैदा होने वाली वह मानसिकता है, जिसमें एक समुदाय को लगातार दूसरे समुदाय के खिलाफ खड़ा किया जाता है। जब राजनीतिक भाषणों, सोशल मीडिया, धार्मिक मंचों और कुछ संगठनों के प्रचार में किसी पूरे समुदाय को संदेह की नजर से देखने की आदत पैदा होने लगे, तो समाज धीरे-धीरे दो हिस्सों में बंटने लगता है। आज सवाल यह नहीं होना चाहिए कि नफरत किस धर्म के नाम पर फैलाई जा रही है।
सवाल यह होना चाहिए कि नफरत फैला कौन रहा है? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या कानून सभी के लिए बराबर है? अगर किसी मुस्लिम संगठन पर हिंसा या आतंकवाद का आरोप लगता है तो जांच, गिरफ्तारी और संगठन की गतिविधियों पर सवाल उठाना स्वाभाविक माना जाता है। लेकिन यदि किसी हिंदुत्ववादी संगठन से जुड़े व्यक्ति पर इसी तरह के गंभीर आरोप लगते हैं, तो जांच का पैमाना अलग क्यों होना चाहिए? कानून का सिद्धांत बिल्कुल साफ होना चाहिए। न आरोपी का धर्म देखा जाए, न संगठन की राजनीतिक ताकत। केवल सबूत देखा जाए।
आरएसएस, विहिप और बजरंग दल पर बहस क्यों जरूरी है?
आरएसएस स्वयं को राष्ट्र निर्माण और सामाजिक संगठन के रूप में प्रस्तुत करता है। विहिप और बजरंग दल भी अपने उद्देश्यों को हिंदू समाज और धार्मिक हितों से जोड़कर देखते हैं। लेकिन किसी भी बड़े संगठन के लिए केवल अपनी घोषित विचारधारा पर्याप्त नहीं होती। उसके लिए यह भी जरूरी है कि उसके नाम पर काम करने वाले लोग क्या कर रहे हैं, उसके भाषणों का समाज पर क्या प्रभाव पड़ रहा है और उसकी गतिविधियां संविधान के मूल्यों से कितनी मेल खाती हैं। यह बात केवल आरएसएस या हिंदुत्ववादी संगठनों पर लागू नहीं होती।
जो भी संगठन धर्म, जाति या समुदाय के नाम पर नफरत फैलाता है, हिंसा को जायज ठहराता है या दूसरे समुदाय को दुश्मन के रूप में पेश करता है, उसकी जवाबदेही तय होनी चाहिए। चाहे वह भगवा झंडा लेकर निकले या किसी दूसरे रंग का झंडा। कट्टरता किसी एक समुदाय की समस्या नहीं है लेकिन उसका राजनीतिक इस्तेमाल खतरनाक है। भारत में धार्मिक कट्टरता का इतिहास पुराना है और यह किसी एक समुदाय तक सीमित नहीं है। हर धर्म और हर समुदाय में ऐसे तत्व हो सकते हैं जो अपने विचार को अंतिम सत्य मानकर दूसरे को दुश्मन समझने लगते हैं।
लेकिन समस्या तब और गंभीर हो जाती है जब कट्टरता को राजनीतिक शक्ति, चुनावी लाभ और भीड़ की भावनाओं से जोड़ दिया जाता है। धर्म जब इंसान को इंसान से जोड़ता है तो वह समाज की ताकत बनता है। लेकिन जब धर्म को दूसरे धर्म के खिलाफ खड़ा किया जाता है तो वही धर्म राजनीतिक हथियार में बदल जाता है।
आज देश में मंदिर-मस्जिद, लाउडस्पीकर, खान-पान, पहनावे, जनसंख्या, धर्मांतरण, लव जिहाद, बुलडोजर और इतिहास के नाम पर लगातार ऐसी बहसें खड़ी की जाती हैं जिनमें वास्तविक मुद्दे पीछे चले जाते हैं। रोजगार कहां है? महंगाई क्यों बढ़ रही है? शिक्षा की हालत क्या है? अस्पतालों में सुविधाएं क्यों नहीं हैं? किसानों की आय और युवाओं के भविष्य का क्या होगा? इन सवालों की जगह अगर लगातार हिंदू-मुस्लिम बहस खड़ी कर दी जाए तो इसका सबसे बड़ा फायदा किसे मिलता है? आम नागरिक को नहीं।
नफरत की सबसे बड़ी कीमत आम आदमी चुकाता है
सोशल मीडिया पर एक भड़काऊ वीडियो कुछ मिनटों में लाखों लोगों तक पहुंच जाता है। एक झूठी खबर पूरे शहर में तनाव पैदा कर सकती है। एक भाषण भीड़ को उकसा सकता है और एक अफवाह किसी निर्दोष की जान ले सकती है। इसके बाद नेता बयान देते हैं, राजनीतिक दल एक-दूसरे पर आरोप लगाते हैं, टीवी चैनल बहस करते हैं और सोशल मीडिया पर हजारों पोस्ट लिखी जाती हैं। लेकिन जिस परिवार का सदस्य मर जाता है, उसके लिए यह कोई राजनीतिक बहस नहीं होती।
जिस दुकान को जला दिया जाता है, उसके मालिक के लिए यह कोई विचारधारा नहीं होती। जिस बच्चे के मन में दूसरे धर्म के बच्चे के प्रति नफरत भर दी जाती है, उसके भविष्य के लिए यह कोई छोटी बात नहीं होती। नफरत की राजनीति का सबसे बड़ा नुकसान यही है कि वह आने वाली पीढ़ी को एक-दूसरे से डरना सिखाती है।
आरोपों की जांच हो-लेकिन अदालत की जगह राजनीति न करे
यशवंत शिंदे ने अपने पत्र और पूर्व में दिए हलफनामे में कई गंभीर आरोप लगाए हैं। इन आरोपों की सच्चाई का फैसला किसी राजनीतिक दल, मीडिया स्टूडियो या सोशल मीडिया की भीड़ नहीं कर सकती। अगर आरोपों में कोई नया और जांच योग्य तथ्य है तो संबंधित एजेंसियों को उसकी निष्पक्ष जांच करनी चाहिए। अगर आरोप गलत हैं तो जांच के बाद यह भी स्पष्ट रूप से सामने आना चाहिए। और यदि किसी व्यक्ति या संगठन के खिलाफ ठोस सबूत मिलता है तो कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। न न्याय से पहले सजा, न राजनीतिक दबाव में जांच से बचाव। यही लोकतंत्र और कानून के शासन की असली कसौटी है।
देश को संगठन नहीं, संविधान सबसे ऊपर चाहिए
भारत किसी एक धर्म का देश नहीं है। यह संविधान से चलने वाला लोकतांत्रिक गणराज्य है। इस देश में आरएसएस को अपनी विचारधारा रखने का अधिकार है। विहिप को धार्मिक-सामाजिक गतिविधियां करने का अधिकार है। बजरंग दल या कोई अन्य संगठन भी कानून के दायरे में अपनी गतिविधियां कर सकता है। लेकिन किसी को भी संविधान से ऊपर जाने का अधिकार नहीं है। और यही बात किसी मुस्लिम, ईसाई, सिख, दलित या किसी अन्य समुदाय के संगठन पर भी लागू होती है। अभिव्यक्ति की आजादी का मतलब नफरत फैलाने की आजादी नहीं हो सकता। धार्मिक स्वतंत्रता का मतलब हिंसा की छूट नहीं हो सकता। और बहुमत का मतलब अल्पसंख्यक के अधिकार खत्म करना नहीं हो सकता।
आज जरूरत प्रतिबंध से पहले जवाबदेही की है
किसी संगठन को ‘आतंकवादी संगठन’ घोषित करना बेहद गंभीर कानूनी कदम है। इसके लिए भावनात्मक आरोप नहीं, ठोस प्रमाण और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया जरूरी है। लेकिन इसका मतलब यह भी नहीं कि बड़े संगठनों से सवाल ही न पूछे जाएं। आरएसएस हो, विहिप हो, बजरंग दल हो या कोई अन्य धार्मिक अथवा राजनीतिक संगठन उसकी गतिविधियों, वित्तीय पारदर्शिता, संगठनात्मक ढांचे और कानून के पालन पर सवाल पूछना लोकतंत्र में पूरी तरह जायज है। सवाल पूछना किसी धर्म के खिलाफ होना नहीं है। बल्कि सवाल पूछना लोकतंत्र को मजबूत करना है।
सबसे बड़ा खतरा बंदूक से पहले दिमाग में पैदा होता है
बम बनाने वाला हाथ अचानक पैदा नहीं होता। उसके पीछे विचार हो सकते हैं, प्रशिक्षण हो सकता है, प्रचार हो सकता है और ऐसा माहौल हो सकता है जिसमें दूसरे समुदाय के खिलाफ हिंसा को सही ठहराया जाने लगे। इसीलिए आतंकवाद और सांप्रदायिक हिंसा से लड़ाई केवल पुलिस और अदालतों तक सीमित नहीं हो सकती। हमें उस विचारधारा से भी लड़ना होगा जो इंसान को उसकी नागरिक पहचान से पहले उसके धर्म से पहचानती है। जो कहती है कि ‘वह’ और ‘हम’ अलग हैं। जो पड़ोसी को दुश्मन बनाती है। जो इतिहास की गलतियों का बदला आज के नागरिकों से लेना चाहती है।
और जो चुनावी फायदे के लिए समाज की दरारों को और गहरा करती है। भारत को हिंदू-मुस्लिम की लड़ाई नहीं चाहिए। भारत को कानून और संविधान की जीत चाहिए। किसी मंदिर की घंटी हो या मस्जिद की अजान-दोनों के बीच खड़ी सबसे बड़ी चीज नफरत नहीं, बल्कि इंसानियत होनी चाहिए। और अगर कोई संगठन, नेता या राजनीतिक शक्ति इस देश के नागरिकों के बीच नफरत की दीवार खड़ी करती है, तो उससे सवाल पूछना जरूरी है।
क्योंकि अंततः सवाल आरएसएस बनाम मुस्लिम, हिंदू बनाम मुसलमान या किसी एक संगठन बनाम दूसरे संगठन का नहीं है। सवाल यह है कि हम कैसा भारत चाहते हैं। डर और नफरत से चलने वाला भारत, या संविधान, इंसाफ और भाईचारे से चलने वाला भारत? फैसला केवल नेताओं को नहीं करना है। फैसला पूरे समाज को करना है।
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