नई दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत 25 अगस्त से अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन की यात्रा पर जा रहे हैं। आरएसएस के शताब्दी वर्ष के अवसर पर होने वाली इस यात्रा को संगठन विदेशों में अपने संपर्क, संवाद और वैश्विक पहुंच को मजबूत करने के अभियान के रूप में देख रहा है। लेकिन यात्रा शुरू होने से पहले ही अमेरिका में जिस तरह विरोध की आवाजें उठी हैं, उसने इस दौरे को केवल प्रवासी भारतीयों से मिलने-जुलने का कार्यक्रम नहीं रहने दिया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग यूएससीआईआरएफ़ के अधिकारियों ने आरएसएस और उसके नेताओं के खिलाफ प्रतिबंधात्मक कार्रवाई की मांग की है। आयोग ने यह भी कहा है कि आरएसएस नेताओं को, भले ही वे भारत सरकार के प्रभावशाली हलकों से जुड़े हों, अमेरिकी प्रशासन द्वारा उच्च स्तरीय मुलाकातों या विशेष राजनयिक सम्मान का लाभ नहीं मिलना चाहिए।
यह घटनाक्रम एक महत्वपूर्ण सवाल खड़ा करता है—जब आरएसएस अपने सौ वर्ष पूरे होने पर दुनिया के सामने अपनी छवि, विचारधारा और संगठनात्मक पहुंच को मजबूत करने की कोशिश कर रहा है, तब उसी समय धार्मिक स्वतंत्रता और अल्पसंख्यकों के अधिकारों को लेकर उसके खिलाफ अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सवाल इतने तीखे क्यों हो रहे हैं?
शताब्दी वर्ष और वैश्विक विस्तार की कोशिश
आरएसएस के अनुसार, मोहन भागवत की अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन यात्रा स्थानीय संगठनों और भारतीय प्रवासी समुदाय से जुड़े संस्थानों के निमंत्रण पर हो रही है। संघ का कहना है कि यह विदेशों में संपर्क और संवाद की उसकी व्यापक प्रक्रिया का हिस्सा है। अमेरिका में भागवत का सबसे प्रमुख सार्वजनिक कार्यक्रम 29 अगस्त को न्यूयॉर्क में प्रस्तावित है, जहां वह ‘यूनिवर्सल वननेस सेलिब्रेशन्स’ कार्यक्रम को संबोधित करेंगे। आयोजक इस कार्यक्रम को सामाजिक एकता, संवाद, नागरिक जिम्मेदारी और वैश्विक सद्भाव से जोड़ रहे हैं। इसे ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा के साथ भी प्रस्तुत किया जा रहा है।
लेकिन यहां सबसे दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। एक तरफ दुनिया को “पूरी मानवता एक परिवार है” का संदेश देने की तैयारी है, दूसरी तरफ भारत के भीतर धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति को लेकर अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं गंभीर सवाल उठा रही हैं। यही विरोधाभास भागवत की इस यात्रा को राजनीतिक और वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण बनाता है।
आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय छवि की परीक्षा
आरएसएस भारत का एक अत्यंत प्रभावशाली सामाजिक और वैचारिक संगठन है। भाजपा और संघ परिवार से उसके वैचारिक संबंध किसी से छिपे नहीं हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी स्वयं अपने आरंभिक राजनीतिक जीवन में आरएसएस से जुड़े रहे हैं। इसलिए मोहन भागवत की विदेश यात्रा को केवल किसी धार्मिक नेता की यात्रा मानना सही नहीं होगा। आरएसएस की विचारधारा और उसके संगठनात्मक नेटवर्क का प्रभाव भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में व्यापक है। शताब्दी वर्ष के अवसर पर विदेशों में संपर्क अभियान का उद्देश्य स्वाभाविक रूप से प्रवासी भारतीयों और हिंदू समुदायों के बीच संगठन की पहुंच मजबूत करना हो सकता है।
लेकिन आरएसएस के आलोचक इसे संगठन की अंतरराष्ट्रीय छवि सुधारने और हिंदुत्व की विचारधारा को वैश्विक स्तर पर स्वीकार्यता दिलाने की कोशिश के रूप में भी देख रहे हैं। यानी भागवत अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन में केवल संघ की उपलब्धियों की कहानी नहीं लेकर जा रहे, बल्कि अपने साथ उन आरोपों का बोझ भी लेकर जा रहे हैं जो आरएसएस और उससे जुड़े संगठनों पर वर्षों से लगाए जाते रहे हैं।
यूएससीआईआरएफ़ का विरोध: आखिर आरोप क्या हैं?
यूएससीआईआरएफ़ अमेरिकी सरकार का कोई मंत्रालय नहीं है और न ही उसकी सिफारिशें स्वतः अमेरिकी विदेश नीति बन जाती हैं। यह धार्मिक स्वतंत्रता के मामलों पर अमेरिकी सरकार और कांग्रेस को सलाह देने वाला एक स्वतंत्र संघीय आयोग है। लेकिन उसकी राय को पूरी तरह नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। आयोग ने भारत में धार्मिक स्वतंत्रता की स्थिति को लेकर चिंता जताई है। उसके अनुसार, मुसलमानों और ईसाइयों सहित धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, नफरत भरे भाषण, भीड़ हिंसा और भेदभाव की घटनाएं चिंता का विषय हैं।
उसने नागरिकता संशोधन अधिनियम, एनआरसी की बहस, धर्मांतरण विरोधी कानूनों और गोहत्या संबंधी कानूनों के प्रभाव पर भी सवाल उठाए हैं। यूएससीआईआरएफ़ की आपत्ति का सबसे गंभीर पहलू यह है कि उसने आरएसएस से जुड़े कुछ व्यक्तियों के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध लगाने की सिफारिश की है, यदि वे धार्मिक स्वतंत्रता के उल्लंघन के लिए जिम्मेदार पाए जाते हैं।यह मांग कानूनी रूप से लागू आदेश नहीं है, लेकिन राजनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण है। क्योंकि यह आरएसएस को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर बन रही उस धारणा को दर्शाती है जिसमें संगठन और उससे जुड़े नेटवर्क को भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की स्थिति से जोड़कर देखा जा रहा है।
क्या आलोचना को केवल ‘भारत विरोध’ कहकर खारिज किया जा सकता है?
भारत सरकार और आरएसएस समर्थक लंबे समय से यूएससीआईआरएफ़ की रिपोर्टों को पक्षपातपूर्ण बताते रहे हैं। भारत सरकार का तर्क है कि यह आयोग भारत की जटिल सामाजिक और धार्मिक संरचना को समझे बिना एकतरफा निष्कर्ष निकालता है। यह भी सच है कि अमेरिका और पश्चिमी देशों की मानवाधिकार नीतियों पर स्वयं दोहरे मापदंड अपनाने के आरोप लगते रहे हैं। इसलिए किसी अमेरिकी संस्था की रिपोर्ट को अंतिम और निर्विवाद सत्य मान लेना भी उचित नहीं होगा।
लेकिन सवाल फिर भी बना रहता है। क्या किसी संस्था को पक्षपाती कह देने भर से भारत में अल्पसंख्यकों के खिलाफ हिंसा, नफरत फैलाने वाले भाषण, मॉब लिंचिंग और धार्मिक तनाव से जुड़े सारे सवाल खत्म हो जाते हैं? अगर आरोप गलत हैं, तो उनका सबसे प्रभावी जवाब तथ्यों और पारदर्शिता से दिया जाना चाहिए। और यदि कहीं वास्तविक समस्याएं हैं, तो उन्हें स्वीकार करके सुधार करना लोकतंत्र की मजबूती का संकेत होगा।
‘वसुधैव कुटुंबकम’ और जमीन पर समानता का सवाल
मोहन भागवत के न्यूयॉर्क कार्यक्रम को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की अवधारणा से जोड़ा जा रहा है—यानी पूरी दुनिया एक परिवार है। यह भारतीय दर्शन की एक सुंदर और व्यापक अवधारणा है। लेकिन इसका वास्तविक अर्थ तभी सार्थक होगा, जब अपने देश के भीतर भी हर नागरिक को बराबरी और सम्मान का अनुभव हो।
अगर दुनिया को एक परिवार मानने का संदेश दिया जाए, लेकिन देश के भीतर मुसलमानों, ईसाइयों, दलितों, आदिवासियों और अन्य कमजोर समूहों को लेकर भेदभाव और हिंसा के आरोप लगातार सामने आते रहें, तो स्वाभाविक रूप से अंतरराष्ट्रीय मंचों पर सवाल उठेंगे। वैश्विक सद्भाव का संदेश देने से पहले घरेलू सामाजिक सद्भाव की स्थिति को भी मजबूत करना होगा। यही आरएसएस और भारत सरकार, दोनों के सामने सबसे बड़ी चुनौती है।
आईआईटी निदेशकों को लेकर नया विवाद
भागवत की अमेरिका यात्रा को लेकर भारत में भी राजनीतिक विवाद शुरू हो गया है। कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने आरोप लगाया कि कई आईआईटी निदेशकों को अमेरिका में अपने पूर्व विद्यार्थियों से संपर्क कर भागवत के साथ संवाद के लिए जोड़ने में लगाया गया। यदि किसी सरकारी या संस्थागत स्तर पर प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों का इस्तेमाल किसी गैर-सरकारी वैचारिक संगठन के प्रमुख के कार्यक्रमों के लिए किया जाता है, तो यह निश्चित रूप से गंभीर सवाल पैदा करता है।
हालांकि इस संबंध में ऐसा कोई स्पष्ट आधिकारिक सरकारी आदेश सार्वजनिक रूप से सामने नहीं आया है, जिससे यह सिद्ध हो कि आईआईटी निदेशकों को औपचारिक रूप से ऐसा निर्देश दिया गया था। इसलिए इस मामले में पूरी सच्चाई सामने आना जरूरी है। फिर भी विवाद एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाता है—क्या देश के प्रतिष्ठित शैक्षणिक संस्थानों को किसी विशेष विचारधारात्मक या संगठनात्मक कार्यक्रम से जोड़ा जाना चाहिए? आईआईटी किसी राजनीतिक दल या वैचारिक संगठन की संपत्ति नहीं हैं। वे राष्ट्रीय संस्थान हैं और उनकी स्वायत्तता तथा अकादमिक गरिमा बनाए रखना आवश्यक है।
संवाद का अवसर या कठिन सवालों से सामना?
अमेरिकी धार्मिक स्वतंत्रता आयोग की पूर्व अध्यक्ष नादिन माएंज़ा ने मोहन भागवत से यूएससीआईआरएफ़ के साथ सीधे संवाद करने की अपील की है। यह सुझाव विचार करने योग्य है। यदि आरएसएस का उद्देश्य विदेशों में संगठन को लेकर बनी कथित गलतफहमियों को दूर करना है, तो केवल समर्थकों और प्रवासी समुदाय के बीच भाषण देना पर्याप्त नहीं होगा। वास्तविक संवाद तब होगा जब संगठन अपने सबसे कटु आलोचकों के सवालों का भी सामना करे।
मोहन भागवत यदि धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और भारत के धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र से जुड़े कठिन सवालों पर खुले मंच पर बातचीत करते हैं, तो यह आरएसएस के लिए अपनी बात रखने का अवसर हो सकता है। लेकिन यदि यात्रा केवल समर्थक समूहों और अनुकूल मंचों तक सीमित रहती है, तो आलोचकों का यह आरोप और मजबूत हो सकता है कि आरएसएस दुनिया के सामने अपनी छवि तो बदलना चाहता है, लेकिन आलोचनात्मक सवालों का सामना करने से बचता है।
2005 से 2026 तक: बदलती छवि और पुराना विवाद
नरेंद्र मोदी को 2005 में अमेरिकी वीजा से इनकार किए जाने का मामला भारत-अमेरिका संबंधों और धार्मिक स्वतंत्रता की बहस का एक महत्वपूर्ण अध्याय रहा है। उस समय वह गुजरात के मुख्यमंत्री थे। बाद में 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद उन्हें राजनयिक स्तर पर अमेरिका ने स्वीकार किया और दोनों देशों के संबंध और मजबूत हुए। यह इतिहास बताता है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सिद्धांत और रणनीतिक हित अक्सर साथ-साथ चलते हैं।
जिस व्यक्ति को कभी वीजा देने से इनकार किया गया था, वही बाद में अमेरिकी राष्ट्रपतियों के साथ उच्च स्तरीय बैठकों का हिस्सा बना। इसलिए यह मान लेना भी गलत होगा कि यूएससीआईआरएफ़ की सिफारिश के बाद अमेरिकी सरकार आरएसएस पर तुरंत प्रतिबंध लगा देगी या मोहन भागवत की यात्रा रोक देगी। आयोग की सिफारिश और अमेरिकी सरकार की वास्तविक विदेश नीति दो अलग-अलग बातें हैं।
असली सवाल भारत की छवि का है
मोहन भागवत का यह दौरा एक संगठन के प्रमुख की विदेश यात्रा से कहीं बड़ा अर्थ रखता है। आरएसएस आज भारत की सबसे प्रभावशाली वैचारिक शक्तियों में से एक है। इसलिए उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि का असर अप्रत्यक्ष रूप से भारत की लोकतांत्रिक छवि पर भी पड़ता है। आरएसएस अपनी शताब्दी मना रहा है। वह अपने सौ वर्षों के इतिहास, सेवा कार्यों और संगठनात्मक विस्तार को दुनिया के सामने रखना चाहता है। यह उसका अधिकार है। लेकिन एक लोकतांत्रिक समाज में किसी संगठन की उपलब्धियों के साथ उसके आलोचकों के सवाल भी मौजूद रहेंगे।
सवाल यह नहीं है कि मोहन भागवत विदेश क्यों जा रहे हैं। सवाल यह है कि जब वह विदेश में भारत की संस्कृति, एकता और ‘वसुधैव कुटुंबकम’ की बात करेंगे, तब दुनिया उनसे भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समान नागरिकता को लेकर उठने वाले सवाल भी पूछेगी या नहीं। और शायद यही इस पूरे दौरे की सबसे बड़ी परीक्षा है।
छवि भाषणों से नहीं, व्यवहार से बनती है
मोहन भागवत का अमेरिका, कनाडा और ब्रिटेन दौरा आरएसएस के लिए अपने शताब्दी वर्ष में वैश्विक पहुंच बढ़ाने का अवसर है। लेकिन यूएससीआईआरएफ़ का विरोध यह भी दिखाता है कि आरएसएस की अंतरराष्ट्रीय छवि को लेकर गंभीर मतभेद मौजूद हैं। इन मतभेदों को केवल “भारत विरोध” या “हिंदू विरोध” कहकर समाप्त नहीं किया जा सकता। उसी तरह हर विदेशी आलोचना को बिना जांचे अंतिम सत्य मान लेना भी उचित नहीं है। जरूरत है तथ्यों, संवाद और आत्ममंथन की।
यदि आरएसएस वास्तव में दुनिया को ‘वसुधैव कुटुंबकम’ का संदेश देना चाहता है, तो उसे यह भी दिखाना होगा कि भारत में हर नागरिक—उसका धर्म, जाति या पहचान चाहे जो हो—सम्मान, सुरक्षा और बराबरी के साथ जी सकता है। क्योंकि दुनिया में किसी देश या संगठन की सबसे मजबूत छवि महंगे आयोजनों, विशाल सभाओं और प्रभावशाली भाषणों से नहीं बनती। वह इस बात से बनती है कि उसके प्रभाव वाले समाज में सबसे कमजोर और सबसे छोटे अल्पसंख्यक के साथ कैसा व्यवहार किया जाता है।
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