दिल्ली के प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया परिसर से सामने आया एक वीडियो इन दिनों सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बना हुआ है। वीडियो में कुछ लोग प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीर के सामने आरती करते हुए और कथित तौर पर ‘मोदी चालीसा’ का पाठ करते दिखाई दे रहे हैं। “जय-जय मोदी” और “हर-हर मोदी” जैसे नारे भी सुनाई देते हैं। सवाल केवल इतना नहीं है कि किसी व्यक्ति या संगठन ने प्रधानमंत्री की प्रशंसा में यह कार्यक्रम क्यों किया; असली सवाल यह है कि पत्रकारिता, संवाद और सत्ता से सवाल पूछने के लिए पहचाने जाने वाले संस्थान के परिसर में ऐसा दृश्य क्या संदेश देता है?
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने इस मामले से दूरी बनाते हुए कहा है कि कार्यक्रम का आयोजन क्लब ने नहीं किया था। उसके अनुसार, एक संगठन ने प्रेस कॉन्फ्रेंस के लिए हॉल किराये पर लिया था, लेकिन तय शर्तों का उल्लंघन होने पर क्लब के अधिकारियों ने हस्तक्षेप कर कार्यक्रम रुकवा दिया। यह स्पष्टीकरण महत्वपूर्ण है, क्योंकि किसी परिसर में होने वाला हर कार्यक्रम उस संस्था की आधिकारिक विचारधारा या गतिविधि नहीं होता। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन इसके बावजूद यह घटना एक बड़े सवाल को जन्म देती है। क्या लोकतंत्र में राजनीतिक नेतृत्व के प्रति समर्थन और सम्मान धीरे-धीरे व्यक्तिपूजा का रूप ले रहा है? लोकतंत्र में प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री या कोई भी जनप्रतिनिधि जनता द्वारा चुना जाता है। उसकी नीतियों की प्रशंसा हो सकती है, उपलब्धियों का समर्थन किया जा सकता है, लेकिन लोकतांत्रिक व्यवस्था में किसी नेता को आलोचना और जवाबदेही से ऊपर रखना लोकतांत्रिक संस्कृति के लिए स्वस्थ संकेत नहीं माना जा सकता।
प्रेस क्लब जैसे संस्थानों का मूल चरित्र सत्ता के प्रति निष्ठा नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल करना है। पत्रकार का काम किसी नेता की आरती उतारना नहीं, बल्कि यह पूछना है कि सरकार के दावे और जमीन की हकीकत में कितना अंतर है। महंगाई, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार, सामाजिक तनाव, अल्पसंख्यकों की सुरक्षा, किसानों की समस्याएं और नागरिक अधिकार—ये वे सवाल हैं जिन पर लोकतंत्र में खुली बहस होनी चाहिए।
विडंबना यह है कि जिस दौर में पत्रकारिता पर दबाव, मीडिया की स्वतंत्रता और आलोचनात्मक आवाज़ों की जगह को लेकर लगातार बहस चल रही हो, उसी दौर में किसी राजनीतिक नेता के नाम पर चालीसा और आरती का दृश्य सामने आना स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है। क्योंकि जब राजनीति में भक्ति का स्थान तर्क से बड़ा होने लगे, तो सवाल पूछने वालों को विरोधी और आलोचना को दुश्मनी समझे जाने का खतरा बढ़ जाता है।
यह बहस किसी एक व्यक्ति या एक पार्टी तक सीमित नहीं होनी चाहिए। सिद्धांत साफ़ होना चाहिए—लोकतंत्र में कोई भी नेता इतना बड़ा नहीं कि उससे सवाल न पूछा जा सके। आज मोदी है, कल कोई दूसरा होगा; लेकिन संस्थाओं का चरित्र व्यक्तियों से ऊपर होना चाहिए।
प्रेस क्लब ऑफ़ इंडिया ने कार्यक्रम को अपना आयोजन न बताकर और हस्तक्षेप कर उसे रुकवाने की बात कहकर अपनी स्थिति स्पष्ट की है। फिर भी यह घटना एक चेतावनी की तरह देखी जानी चाहिए कि सार्वजनिक और संस्थागत मंचों का उपयोग किस दिशा में हो रहा है। पत्रकारिता के मंच पर बहस, तथ्य, सवाल और जवाब होने चाहिए—न कि ऐसी राजनीतिक भक्ति, जो लोकतांत्रिक आलोचना की जगह व्यक्तिपूजा को स्थापित करने लगे।
लोकतंत्र में नेता का सम्मान हो सकता है, समर्थन हो सकता है, लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत किसी नेता की आरती में नहीं, बल्कि उससे बेखौफ सवाल पूछने की आज़ादी में होती है।
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