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Home»भारत

कांवड़ के नाम पर कानून का राज कमजोर क्यों पड़ रहा है?

adminBy adminAugust 21, 2026 भारत No Comments7 Mins Read
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उत्तर  प्रदेश के हापुड़ में 24 वर्षीय अज़ीम की मौत ने एक बार फिर यह सवाल सामने खड़ा कर दिया है कि धार्मिक यात्राओं और जुलूसों के दौरान कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी आखिर किसकी है? रिपोर्ट के अनुसार, 31 जुलाई को अज़ीम का मिनी ट्रक सड़क किनारे खड़े एक ऑटो-रिक्शा से टकराया।  एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

ऑटो में कांवड़ यात्रा से जुड़े लोग सवार थे। आरोप है कि हादसे के बाद अज़ीम के साथ बुरी तरह मारपीट की गई। गंभीर हालत में उन्हें अस्पताल ले जाया गया, जहां कई दिनों तक कोमा में रहने के बाद 4 अगस्त को दिल्ली में उनकी मौत हो गई। पुलिस ने अज़ीम के पिता की शिकायत पर ऑटो चालक समेत कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया है।

दूसरी ओर अब इसे मज़ाक समझें या बेवकूफी-ऑटो चालक के पिता की शिकायत पर अज़ीम के खिलाफ भी हत्या के प्रयास का मामला दर्ज हुआ है। यानी घटना के दोनों पक्षों के आरोपों की जांच जरूरी है। लेकिन एक बात निर्विवाद रूप से गंभीर है। एक सड़क हादसा अगर भीड़ की हिंसा में बदल जाता है और एक युवक की जान चली जाती है, तो यह केवल दुर्घटना नहीं रह जाती। यह कानून-व्यवस्था का सवाल बन जाता है।

सड़क पर हादसा हुआ था या कानून का राज खत्म हो गया था?

सड़क दुर्घटना में गलती किसकी थी, यह जांच से तय होगा। लेकिन अगर दुर्घटना के बाद किसी घायल व्यक्ति को भीड़ घेर ले और कानून अपने हाथ में लेकर उसकी पिटाई शुरू कर दे, तो यह किसी भी सभ्य समाज के लिए बेहद चिंताजनक स्थिति है।सड़क पर दुर्घटना होने के बाद पुलिस को बुलाना चाहिए। घायल को अस्पताल पहुंचाना चाहिए। वाहन और घटनास्थल की जांच होनी चाहिए। सीसीटीवी और प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाने चाहिए।लेकिन अगर भीड़ खुद ही पुलिस, अदालत और सजा देने वाली संस्था बन जाए तो फिर संविधान और कानून का क्या अर्थ रह जाता है? किसी भी धार्मिक पहचान के नाम पर भीड़ को कानून अपने हाथ में लेने की अनुमति नहीं दी जा सकती।

कांवड़ यात्रा आस्था है, लेकिन आस्था कानून से ऊपर नहीं

कांवड़ यात्रा करोड़ों लोगों की धार्मिक आस्था से जुड़ी यात्रा है। किसी की धार्मिक आस्था का सम्मान करना भारतीय समाज की खूबसूरती है। लेकिन आस्था का अर्थ यह नहीं कि सड़क पर चलने वाले दूसरे नागरिकों के अधिकार खत्म हो जाएं। अगर किसी धार्मिक यात्रा के दौरान सड़कें बंद होती हैं, यातायात का मार्ग बदला जाता है, भारी वाहनों पर रोक लगती है या आम नागरिकों को घंटों जाम में फंसना पड़ता है, तो प्रशासन को पहले से ऐसी व्यवस्था करनी चाहिए कि धार्मिक आयोजन भी शांतिपूर्वक हो और आम जनता को भी अनावश्यक परेशानी न हो। सड़क किसी एक समुदाय की नहीं होती। सड़क पर चलने का अधिकार हर नागरिक का है।

आम आदमी आखिर कब तक भुगतेगा?

कांवड़ यात्रा के दौरान कई इलाकों में लंबा रूट डायवर्जन, भारी वाहनों पर प्रतिबंध, ट्रैफिक जाम और सड़क बंद होने जैसी समस्याएं सामने आती हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य श्रद्धालुओं की सुरक्षा होना चाहिए। लेकिन सवाल यह है कि क्या सरकार की जिम्मेदारी सिर्फ कांवड़ियों के लिए सड़क खाली करवाना है? क्या एंबुलेंस, मरीज, स्कूली बच्चे, कर्मचारी, मजदूर, व्यापारी और रोजमर्रा के काम से निकलने वाले करोड़ों लोगों के अधिकारों का कोई महत्व नहीं? एक तरफ सरकार कहती है कि उत्तर प्रदेश में कानून का राज है।

दूसरी तरफ अगर किसी धार्मिक जुलूस के नाम पर सड़क पर आम नागरिकों को डर का सामना करना पड़े, यातायात व्यवस्था चरमरा जाए या कथित रूप से किसी व्यक्ति की भीड़ द्वारा पिटाई हो जाए, तो प्रशासन को जवाब देना होगा। कानून का राज सिर्फ अपराधी को पकड़ने का नाम नहीं है। कानून का राज यह भी है कि किसी को अपराध करने से पहले ही रोका जाए।

योगी सरकार से सबसे बड़ा सवाल: कार्रवाई कहां है?

योगी आदित्यनाथ सरकार अक्सर कानून-व्यवस्था को अपनी सबसे बड़ी उपलब्धियों में गिनाती है। अगर ऐसा है तो फिर धार्मिक यात्राओं के दौरान कानून तोड़ने वालों के खिलाफ भी वही कठोरता दिखाई जानी चाहिए जो दूसरे मामलों में दिखाई जाती है। अगर कोई मुसलमान सड़क पर हिंसा करे तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। अगर कोई हिंदू हिंसा करे तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। अगर कोई राजनीतिक कार्यकर्ता कानून तोड़े तो कार्रवाई होनी चाहिए। और अगर कोई धार्मिक जुलूस में शामिल होकर कानून हाथ में ले तो उसके खिलाफ भी कार्रवाई होनी चाहिए। कानून की नजर में पहचान नहीं, अपराध मायने रखना चाहिए। यही असली कानून-व्यवस्था है।

सरकार की चुप्पी भी सवाल पैदा करती है

अज़ीम के परिवार का दावा है कि वह परिवार का इकलौता कमाने वाला था। उसके पीछे पत्नी, नवजात बच्चा और बीमार पिता रह गए हैं। यह सिर्फ एक एफआईआर का मामला नहीं है। यह एक परिवार की पूरी जिंदगी उजड़ जाने की कहानी है। ऐसे मामले में सरकार और प्रशासन की जिम्मेदारी केवल मुकदमा दर्ज करने तक खत्म नहीं होनी चाहिए। जांच निष्पक्ष होनी चाहिए। सीसीटीवी फुटेज सामने आना चाहिए।

प्रत्यक्षदर्शियों के बयान लिए जाने चाहिए। घटना में शामिल प्रत्येक व्यक्ति की भूमिका स्पष्ट होनी चाहिए। अगर किसी ने मारपीट की है तो उसके खिलाफ कार्रवाई होनी चाहिए। और अगर जांच में अज़ीम की तरफ से भी कोई गंभीर अपराध सामने आता है तो उसके बारे में भी कानून के अनुसार कार्रवाई होनी चाहिए। इंसाफ का मतलब किसी एक पक्ष को बचाना नहीं, बल्कि सच को सामने लाना है।

धर्म के नाम पर भीड़तंत्र को बढ़ावा देना खतरनाक है

सबसे खतरनाक बात यह है कि जब किसी धार्मिक पहचान से जुड़ी भीड़ कानून अपने हाथ में लेने लगे तो समाज में एक खतरनाक संदेश जाता है-कि संख्या बल के आधार पर न्याय किया जा सकता है। कि भीड़ फैसला कर सकती है। कि पुलिस और अदालत बाद में आएंगी। यह सोच किसी भी धर्म के लिए सम्मानजनक नहीं हो सकती। आज अगर भीड़ किसी मुस्लिम युवक को पीटती है और कल किसी हिंदू युवक को किसी दूसरी भीड़ का सामना करना पड़े तो क्या हम इसी व्यवस्था को स्वीकार करेंगे? भीड़ का न्याय किसी का न्याय नहीं होता।

कांवड़ियों के लिए अलग कानून नहीं हो सकता

यह बात बिल्कुल स्पष्ट होनी चाहिए कि कांवड़ यात्रा में शामिल हर व्यक्ति को अपराधी बताना गलत है। लाखों श्रद्धालु शांतिपूर्वक यात्रा करते हैं, नियमों का पालन करते हैं और अपनी धार्मिक आस्था पूरी करके घर लौटते हैं। समस्या उन लोगों से है जो धार्मिक पहचान को कानून तोड़ने की ढाल बनाते हैं। कांवड़ हो, गणेश विसर्जन हो, मुहर्रम का जुलूस हो, ईद की भीड़ हो या किसी राजनीतिक दल की रैली-कोई भी जुलूस संविधान और कानून से ऊपर नहीं हो सकता। अगर सरकार धार्मिक आस्था के नाम पर किसी एक समूह के कानून तोड़ने को नजरअंदाज करेगी तो इसका नुकसान अंततः पूरे समाज को होगा।

सवाल सिर्फ अज़ीम का नहीं है

अज़ीम की मौत हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि आखिर हम किस तरह का समाज बना रहे हैं? क्या सड़क दुर्घटना के बाद मदद करने के बजाय मारपीट करना सामान्य होता जा रहा है? क्या धार्मिक पहचान इंसान की जान से बड़ी होती जा रही है? क्या प्रशासन धार्मिक भीड़ के सामने कमजोर पड़ रहा है? क्या आम नागरिक को सड़क पर निकलते समय यह डर होना चाहिए कि किसी जुलूस या भीड़ से विवाद हुआ तो उसकी जान खतरे में पड़ सकती है?

और सबसे बड़ा सवाल-अगर सरकार सचमुच कानून के राज में विश्वास करती है तो कानून तोड़ने वाले चाहे किसी भी धार्मिक पहचान के हों, उनके खिलाफ कार्रवाई करने में हिचक क्यों? उत्तर प्रदेश की सरकार को इन सवालों का जवाब देना चाहिए। अज़ीम के मामले में निष्पक्ष जांच होनी चाहिए और दोषी पाए जाने वालों को कानून के अनुसार सजा मिलनी चाहिए। साथ ही कांवड़ यात्रा के दौरान यातायात व्यवस्था, भीड़ नियंत्रण और कानून-व्यवस्था के लिए ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए जिसमें श्रद्धालुओं की आस्था भी सुरक्षित रहे और आम नागरिकों के अधिकार भी।

क्योंकि आस्था की रक्षा कानून तोड़कर नहीं, कानून के भीतर रहकर ही की जा सकती है। और सरकार को याद रखना चाहिए कि सड़क पर भगवा हो या कोई दूसरा झंडा, कानून की किताब सबके लिए एक होनी चाहिए। यही लोकतंत्र है। यही संविधान है। और यही असली कानून का राज है।

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