हिंदू दुकानों से ही खरीदो: दिवाली, जो रोशनी और सौहार्द का पर्व मानी जाती है, इस बार महाराष्ट्र में राजनीति की स्याही से रंगी हुई दिख रही है। एनसीपी (अजित पवार गुट) के विधायक संग्राम जगताप ने एक सार्वजनिक रैली में जो कहा, उसने सियासत और समाज दोनों के लिए एक गंभीर सवाल खड़ा कर दिया है:
“दिवाली पर खरीदारी करते समय हमें देखना चाहिए कि पैसा और मुनाफ़ा सिर्फ़ हिंदुओं को मिले।”
यह वाक्य न केवल एक राजनेता की असंवेदनशीलता दिखाता है, बल्कि यह भी उजागर करता है कि धर्म की दीवारें अब सिर्फ़ सियासत की ज़मीन पर नहीं, बल्कि समाज के बाज़ार तक पहुँच गई हैं।
अल्पसंख्यक आयोग की प्रतिक्रिया: संविधान की याद दिलाने की कोशिश
महाराष्ट्र अल्पसंख्यक आयोग के चेयरमैन प्यारे ख़ान ने इस बयान को “ग़ैर-जिम्मेदाराना” बताते हुए स्पष्ट किया — “यह देश बिना हिंदू-मुसलमान के चल नहीं सकता… संग्राम जगताप को ऐसी भाषा नहीं बोलनी चाहिए।”
यह वक्तव्य उस संवैधानिक चेतावनी की तरह है जो यह याद दिलाता है कि भारत की ताकत विविधता में एकता है, न कि ‘आर्थिक बहिष्कार’ की संकीर्ण राजनीति में।
अजित पवार की दोहरी मुश्किल: गठबंधन की मजबूरी या नैतिक कमजोरी?
विवाद बढ़ने के बाद उपमुख्यमंत्री और एनसीपी (अजित पवार गुट) के नेता अजित पवार ने जगताप के बयान पर “आपत्ति” ज़रूर जताई — लेकिन बात वहीं खत्म हो गई: सिर्फ़ आपत्ति, कोई ठोस अनुशासनात्मक कार्रवाई नहीं।
यहाँ से असली सवाल उठता है — क्या अजित पवार की आपत्ति सिर्फ़ एक ‘राजनीतिक औपचारिकता’ थी? क्योंकि अगर पवार सचमुच महाराष्ट्र के मुसलमानों और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों के साथ खड़े हैं — जैसा वे सार्वजनिक मंचों पर बार-बार दावा करते हैं — तो फिर ऐसे सांप्रदायिक बयान देने वाले विधायक को सिर्फ़ नोटिस क्यों दिया गया? उन्हें पार्टी से निलंबित या निष्कासित क्यों नहीं किया गया?
राजनीतिक समीकरण: सत्ता के संतुलन में दबा नैतिक पक्ष
अजित पवार वर्तमान में महायुक्त आघाड़ी (BJP+NCP+Shiv Sena Eknath Shinde गुट) का हिस्सा हैं। यह गठबंधन ही पवार की वर्तमान राजनीतिक प्रासंगिकता का आधार है, और उसी गठबंधन की हिंदुत्ववादी छवि उनकी सीमा तय करती है।
पवार अच्छी तरह जानते हैं कि अगर वे अपने ही विधायक पर कठोर कार्रवाई करेंगे, तो भाजपा खेमे में यह संदेश जाएगा कि पवार “मुस्लिम तुष्टिकरण” कर रहे हैं। इसलिए उन्होंने वही किया जो आज की राजनीति का सबसे “सुरक्षित” रास्ता है — “बयान पर असहमति” जताओ, लेकिन “बयान देने वाले” को मत छुओ।
पर यही वह बिंदु है जहाँ राजनीतिक व्यावहारिकता और नैतिक जिम्मेदारी आमने-सामने आ खड़ी होती है।
विधायक संग्राम जगताप: दोहराव की राजनीति का नया चेहरा
संग्राम जगताप कोई पहली बार विवाद में नहीं हैं। वे पहले भी आक्रामक भाषणों और विवादों से सुर्खियों में रह चुके हैं। उनका यह बयान इस बात का संकेत है कि एक तबके के राजनीतिक नेताओं को यह भरोसा हो गया है — कि नफरत की भाषा अब सज़ा नहीं, बल्कि सियासी इनाम दिला सकती है।
जब अजित पवार जैसे अनुभवी नेता भी ऐसे बयानों को “माफ़ी योग्य गलती” मानकर आगे बढ़ जाते हैं, तो यह संदेश पार्टी के भीतर नीचे तक जाता है: “संविधान से पहले चुनाव है।”
समाज पर असर: ‘आर्थिक राष्ट्रवाद’ की आड़ में सामाजिक दरार
“सिर्फ़ हिंदू दुकानों से खरीदो” जैसी बातें सिर्फ़ एक वाक्य नहीं होतीं; वे आर्थिक बहिष्कार की मानसिकता को वैध बनाने का काम करती हैं। ऐसे बयान देश की स्थानीय अर्थव्यवस्था, रोज़गार और, सबसे बढ़कर, आपसी भरोसे को चोट पहुँचाते हैं।
महाराष्ट्र के लाखों छोटे व्यापारी — चाहे वे हिंदू हों या मुसलमान — एक-दूसरे के भरोसे और आपसी सौदेबाजी से ही जीवित हैं। अगर राजनीति इसी दिशा में चलती रही, तो वह “मेक इन इंडिया” नहीं, बल्कि “डिवाइड इन इंडिया” का नया नारा बना देगी।
‘आपत्ति’ काफी नहीं — कार्रवाई ज़रूरी है
अजित पवार के सामने अब यह चुनाव है — क्या वे सिर्फ़ सत्ता में साझेदारी करेंगे, या संविधान में निहित जिम्मेदारी भी निभाएँगे?
संग्राम जगताप का बयान सिर्फ़ एक गलती नहीं, बल्कि एक विचारधारा का प्रदर्शन है — जो संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता), अनुच्छेद 15 (भेदभाव पर रोक) और अनुच्छेद 19 (अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता की मर्यादा) के सीधे खिलाफ़ है।
अगर ऐसे नेताओं पर सिर्फ़ “नोटिस” देकर मामला निपटा दिया जाएगा, तो यह भारत के सांप्रदायिक विमर्श में एक और खतरनाक सामान्यीकरण होगा।
“जो जोड़ता है, वही नेता कहलाता है; जो बाँटता है, वह केवल भीड़ का सरगना होता है।”
दिवाली पर रोशनी की बात करने वाले नेताओं को अब तय करना होगा कि वे दीया जलाएँगे या अंधेरा फैलाएँगे।
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