एमनेस्टी इंटरनेशनल की रिपोर्ट ने भारत की विदेश नीति पर बेहद गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। संगठन का आरोप है कि गाज़ा में इज़रायल के सैन्य अभियान के दौरान भारत से हथियार, गोला-बारूद और सैन्य उपकरणों के पुर्ज़ों की आपूर्ति जारी रही। रिपोर्ट में 2,596 शिपमेंट का उल्लेख है और नौ भारतीय कंपनियों के निर्यात का दावा किया गया है, जिनमें तीन सरकारी रक्षा कंपनियां भी शामिल हैं। अगर ये आरोप और आंकड़े सही हैं, तो सवाल सिर्फ व्यापार का नहीं है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सवाल यह है कि क्या भारत अप्रत्यक्ष रूप से उस युद्ध का हिस्सा बन गया, जिसमें हजारों फिलिस्तीनी नागरिकों की जान गई? भारत हमेशा से फिलिस्तीन के अधिकारों की बात करता रहा है। महात्मा गांधी से लेकर जवाहरलाल नेहरू और बाद की सरकारों तक भारत की विदेश नीति में फिलिस्तीन के प्रति समर्थन और इज़रायल-फिलिस्तीन विवाद के शांतिपूर्ण समाधान की बात प्रमुख रही है। लेकिन आज तस्वीर बदलती हुई क्यों दिखाई दे रही है?
क्या हथियारों का व्यापार इंसानी जिंदगी से बड़ा हो गया?
अगर भारत की सरकारी कंपनियां वास्तव में इज़रायली रक्षा कंपनियों को तोप के गोलों, मोर्टार लॉन्चर और सैन्य उपकरणों के हिस्से उपलब्ध करा रही थीं, तो सरकार को देश के सामने साफ जवाब देना चाहिए—इन निर्यातों की अनुमति किसने दी? क्या सरकार को गाज़ा में हो रही तबाही की जानकारी नहीं थी? क्या उसे संयुक्त राष्ट्र और अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठनों की चेतावनियां दिखाई नहीं दे रही थीं? और सबसे महत्वपूर्ण—अगर भारत खुद को विश्व में शांति और मानवता का समर्थक बताता है, तो फिर ऐसे हथियारों की आपूर्ति क्यों जारी रही?
एमनेस्टी के आरोपों को अंतिम न्यायिक निष्कर्ष नहीं माना जा सकता, लेकिन इतने गंभीर आरोपों के बाद सरकार की चुप्पी भी सवालों से बचने का रास्ता नहीं हो सकती और इसी बीच ईरान से रिश्तों में तनाव क्यों?इस पूरी कहानी का दूसरा पहलू और भी महत्वपूर्ण है। ईरान भारत का कोई नया परिचित नहीं रहा। दोनों देशों के बीच सदियों पुराने सभ्यतागत, सांस्कृतिक और व्यापारिक संबंध हैं। चाबहार बंदरगाह भारत के लिए रणनीतिक रूप से भी बेहद महत्वपूर्ण रहा है।
लेकिन पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और ईरान-इज़रायल संघर्ष के बीच भारत की नीति पर यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या भारत इज़रायल के साथ अपने रणनीतिक संबंधों को इतना महत्व दे रहा है कि पुराने मित्र ईरान के साथ रिश्ते प्रभावित होने लगे हैं? अगर एक तरफ भारत इज़रायल की रक्षा जरूरतों से जुड़ी आपूर्ति श्रृंखला में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है और दूसरी तरफ ईरान के साथ तनाव बढ़ रहा है, तो यह सिर्फ विदेश नीति का बदलाव नहीं है। यह भारत की पश्चिम एशिया नीति की दिशा बदलने का संकेत हो सकता है।
क्या दोस्त बदल गए और सिद्धांत भी?
भारत के लिए सवाल यह नहीं होना चाहिए कि अमेरिका क्या चाहता है, इज़रायल क्या चाहता है या ईरान क्या चाहता है। सवाल होना चाहिए कि भारत क्या चाहता है? भारत को अपने राष्ट्रीय हित देखने चाहिए, लेकिन राष्ट्रीय हित का मतलब सिर्फ हथियारों का कारोबार और रणनीतिक साझेदारी नहीं होता। भारत के हित में खाड़ी क्षेत्र में शांति भी है। ईरान के साथ स्थिर संबंध भी हैं। अरब देशों के साथ मजबूत रिश्ते भी हैं। और सबसे बढ़कर-एक ऐसी विदेश नीति भी है जिस पर दुनिया भारत को भरोसेमंद और स्वतंत्र शक्ति के रूप में देखे।
क्या भारत ने बहुत बड़ी कीमत तो नहीं लगा दी?
गाज़ा में आम नागरिकों की मौत पर भारत ने कई बार चिंता व्यक्त की है। लेकिन अगर उसी समय भारत से इज़रायल की सैन्य आपूर्ति श्रृंखला को सामग्री मिल रही हो, तो सरकार को यह विरोधाभास दूर करना होगा। एक हाथ से इंसानों की मौत पर चिंता और दूसरे हाथ से युद्ध सामग्री की आपूर्ति-क्या दोनों बातें एक साथ चल सकती हैं? और अगर इसी दौर में ईरान के साथ भी संबंध बिगड़ते हैं तो सवाल और गंभीर हो जाता है। क्या भारत ने रणनीतिक फायदे के लिए अपने पुराने दोस्त और अपनी पुरानी विदेश नीति दोनों को दांव पर लगा दिया है? भारत को इज़रायल से दोस्ती रखने का अधिकार है।
ईरान से संबंध रखने का भी अधिकार है। लेकिन भारत को यह भी तय करना होगा कि उसकी विदेश नीति किसी महाशक्ति की लाइन पर चलेगी या अपने स्वतंत्र राष्ट्रीय हित और मानवता के सिद्धांतों पर। आखिर दुनिया भारत से सिर्फ यह नहीं पूछेगी कि उसने किसके साथ दोस्ती की। दुनिया यह भी पूछेगी कि जब निर्दोष लोग मारे जा रहे थे, तब भारत किस तरफ खड़ा था? और यही सवाल आज सबसे ज्यादा परेशान करने वाला है।
Read Next :