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Home»विदेश

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री ख़ालिदा ज़िया का निधन, भारत समेत राजनीतिक दलों ने जताया शोक

adminBy adminDecember 30, 2025 विदेश No Comments4 Mins Read
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बेगम खालिदा जिया का निधन
image : x.com
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बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री और बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) की प्रमुख नेता ख़ालिदा ज़िया का निधन हो गया है। वह 80 वर्ष की थीं। बीएनपी के अनुसार, डॉक्टरों ने उन्हें मंगलवार सुबह लगभग छह बजे ढाका में मृत घोषित किया। वह लंबे समय से उम्र से जुड़ी गंभीर बीमारियों से पीड़ित थीं और पिछले कई हफ्तों से अस्पताल में भर्ती थीं।

लंबे समय से चल रहा था इलाज

ख़ालिदा ज़िया का 23 नवंबर से ढाका स्थित एवरकेयर अस्पताल में इलाज चल रहा था। चिकित्सकों के अनुसार, उन्हें लिवर का एडवांस सिरोसिस, मधुमेह, गठिया के साथ-साथ हृदय और श्वसन संबंधी समस्याएं थीं।
11 दिसंबर को तबीयत अधिक बिगड़ने के बाद उन्हें वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा गया था। इलाज कर रहे डॉक्टरों ने उनकी हालत को बेहद नाजुक बताया था। बेहतर उपचार के लिए उन्हें विदेश ले जाने की योजना भी बनाई गई थी, लेकिन मेडिकल बोर्ड की अनुमति न मिलने के कारण ऐसा संभव नहीं हो सका।

विवादों और संघर्षों से जुड़ा राजनीतिक सफर

ख़ालिदा ज़िया का राजनीतिक जीवन बांग्लादेश की राजनीति के कई अहम मोड़ों से जुड़ा रहा। वह देश की प्रमुख राजनीतिक हस्तियों में से एक रहीं और लंबे समय तक सत्ता और विपक्ष—दोनों भूमिकाओं में सक्रिय रहीं।
उनकी राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता अवामी लीग की नेता शेख हसीना के साथ रही, जिसे बांग्लादेश की राजनीति की सबसे तीखी और लंबी प्रतिद्वंद्विताओं में गिना जाता है।

उनके कार्यकाल में आर्थिक सुधारों, निजीकरण और बुनियादी ढांचे के विकास पर जोर दिया गया। हालांकि, इसी दौरान उनकी सरकार पर भ्रष्टाचार, उग्रवाद और अल्पसंख्यकों की सुरक्षा को लेकर भी आरोप लगे। बाद के वर्षों में भ्रष्टाचार के एक मामले में उन्हें सजा सुनाई गई, जिसे बीएनपी ने राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताया था।

2018 से जेल और अस्थायी रिहाई

8 फरवरी 2018 को ख़ालिदा ज़िया को भ्रष्टाचार के एक मामले में जेल की सजा सुनाई गई थी। इसके बाद उनकी पार्टी और परिवार ने कई बार सरकार से उन्हें बेहतर इलाज के लिए विदेश भेजने की अनुमति देने की मांग की, लेकिन यह स्वीकार नहीं की गई।
कोरोना महामारी के दौरान 25 मार्च 2020 को उन्हें कुछ शर्तों के साथ अस्थायी रिहाई दी गई। इसके बाद भी उनकी सेहत में सुधार नहीं हो सका और उन्हें बार-बार अस्पताल में भर्ती कराना पड़ा।

जमात-ए-इस्लामी ने जताया गहरा शोक

ख़ालिदा ज़िया के निधन पर बांग्लादेश जमात-ए-इस्लामी ने गहरा शोक व्यक्त किया है। पार्टी के अमीर डॉक्टर शफ़ीक़ुर रहमान ने जारी बयान में कहा कि ख़ालिदा ज़िया का बांग्लादेश के लोकतांत्रिक आंदोलन में महत्वपूर्ण योगदान रहा।

उन्होंने कहा कि बहुदलीय लोकतंत्र की बहाली, जनता के मतदान अधिकार और एकतंत्र के खिलाफ संघर्ष में उनकी भूमिका उल्लेखनीय रही। उनके अनुसार, अपने स्पष्ट राजनीतिक दृष्टिकोण और मज़बूत नेतृत्व के कारण उन्होंने देश की राजनीति में अलग पहचान बनाई।

डॉक्टर शफ़ीक़ुर रहमान ने दिवंगत नेता के लिए प्रार्थना करते हुए कहा कि ईश्वर उनकी भूल-चूक को क्षमा करे और इस कठिन समय में उनके परिवार, रिश्तेदारों और समर्थकों को धैर्य प्रदान करे।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी व्यक्त की संवेदना

modi with khalida jia

भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी ख़ालिदा ज़िया के निधन पर दुख व्यक्त किया है। उन्होंने कहा कि बीएनपी प्रमुख के निधन की खबर से उन्हें गहरा शोक पहुंचा है और इस कठिन समय में उनकी संवेदनाएं ख़ालिदा ज़िया के परिवार और बांग्लादेश की जनता के साथ हैं।

प्रधानमंत्री मोदी ने अपने संदेश में कहा कि बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री के रूप में ख़ालिदा ज़िया ने देश के विकास और भारत-बांग्लादेश द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करने में अहम भूमिका निभाई।
उन्होंने वर्ष 2015 में ढाका में हुई अपनी मुलाक़ात को याद करते हुए कहा कि उन्हें उम्मीद है कि ख़ालिदा ज़िया का दृष्टिकोण और राजनीतिक विरासत दोनों देशों के बीच साझा संबंधों को आगे भी दिशा देती रहेगी।

प्रारंभिक जीवन और परिवार

ख़ालिदा ज़िया का जन्म वर्ष 1945 में दीनाजपुर जिले में हुआ था। उन्होंने प्रारंभिक शिक्षा दीनाजपुर मिशनरी स्कूल से प्राप्त की और वर्ष 1960 में दीनाजपुर गर्ल्स स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण की।
उनके परिवार में उनके बड़े बेटे तारिक रहमान हैं, जो लंबे समय तक विदेश में रहने के बाद हाल ही में बांग्लादेश लौटे थे। उनके छोटे बेटे अराफात रहमान कोको का कुछ वर्ष पहले निधन हो चुका था।

बांग्लादेश की राजनीति में एक युग का अंत

ख़ालिदा ज़िया का निधन बांग्लादेश की राजनीति में एक महत्वपूर्ण युग के अंत के रूप में देखा जा रहा है। समर्थक उन्हें लोकतांत्रिक संघर्ष की प्रमुख आवाज़ के रूप में याद कर रहे हैं, जबकि राजनीतिक विश्लेषक उनकी भूमिका और विरासत पर चर्चा कर रहे हैं।

Also read: भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है’: भागवत का बयान लोकतंत्र के लिए चेतावनी है

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  • khalida jia: X.com
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