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इज़रायल-ईरान टकराव ने फिर खड़ा किया पश्चिम एशिया को बारूद के ढेर पर

adminBy adminJune 16, 2026 विदेश No Comments6 Mins Read
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दो महीने पहले जब इज़रायल-ईरान युद्धविराम की घोषणा हुई थी, तब उम्मीद जताई जा रही थी कि पश्चिम एशिया में लगातार फैलते युद्ध के दायरे को सीमित किया जा सकेगा। लेकिन ताज़ा घटनाक्रम बता रहा है कि युद्धविराम केवल एक अस्थायी विराम था, स्थायी समाधान नहीं। अब एक बार फिर इज़रायल और ईरान सीधे सैन्य टकराव की स्थिति में दिखाई दे रहे हैं और पूरा क्षेत्र अनिश्चितता, भय और संभावित युद्ध के साये में खड़ा है।

इस बार चिंता केवल मिसाइलों और हवाई हमलों की नहीं है। चिंता इस बात की है कि दोनों देश अब प्रत्यक्ष रूप से एक-दूसरे को निशाना बना रहे हैं। पहले जहां संघर्ष अक्सर प्रॉक्सी समूहों, सीमित सैन्य अभियानों या परोक्ष टकराव के रूप में सामने आता था, वहीं अब दोनों पक्ष खुलकर जवाबी कार्रवाई कर रहे हैं। यही स्थिति पूरे संकट को कहीं अधिक खतरनाक बना देती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

युद्धविराम क्यों टूटता दिखाई दे रहा है?

ताज़ा घटनाओं की श्रृंखला बताती है कि युद्धविराम की बुनियाद शुरू से ही कमजोर थी। लेबनान में हमले, सीरिया और क्षेत्र के अन्य हिस्सों में जारी सैन्य गतिविधियां, ईरान समर्थित समूहों और इज़रायल के बीच लगातार तनाव तथा परमाणु कार्यक्रम को लेकर बढ़ते अविश्वास ने कभी भी स्थायी शांति की स्थिति बनने नहीं दी। बेरूत के दाहियेह इलाके पर इज़रायली हमले के बाद ईरान द्वारा मिसाइल दागना और फिर उसके जवाब में ईरानी प्रतिष्ठानों पर हमले इस बात का संकेत हैं कि दोनों पक्ष अब “निरोध” (Deterrence) की नीति से आगे बढ़कर प्रत्यक्ष दबाव की रणनीति अपना रहे हैं। समस्या यह है कि ऐसी स्थिति में हर हमला अगले हमले की वजह बन जाता है।

यह सिर्फ दो देशों का संघर्ष नहीं

बहुत से लोग इसे केवल इज़रायल और ईरान के बीच की लड़ाई समझते हैं, लेकिन वास्तविकता इससे कहीं अधिक जटिल है। इस संघर्ष में लेबनान, सीरिया, इराक, यमन और खाड़ी क्षेत्र की सुरक्षा भी जुड़ी हुई है। किसी भी बड़े सैन्य टकराव का असर पूरे पश्चिम एशिया पर पड़ सकता है। तेल आपूर्ति, समुद्री व्यापार मार्ग, ऊर्जा बाजार और अंतरराष्ट्रीय अर्थव्यवस्था तक इसके प्रभाव पहुंच सकते हैं। यही कारण है कि दुनिया की बड़ी शक्तियां इस संघर्ष को केवल क्षेत्रीय विवाद नहीं बल्कि वैश्विक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा मानती हैं।

अमेरिका की सीमित होती भूमिका?

ताज़ा घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू अमेरिका की स्थिति भी है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप सार्वजनिक रूप से दोनों पक्षों को संयम बरतने की सलाह दे रहे हैं, लेकिन सवाल यह उठ रहा है कि क्या वाशिंगटन के पास अब पहले जैसी प्रभावशाली मध्यस्थता क्षमता बची है? जब एक ओर अमेरिका बातचीत की बात करता है और दूसरी ओर क्षेत्र में उसके सबसे महत्वपूर्ण सहयोगी इज़रायल सैन्य कार्रवाई जारी रखते हैं, तो उसके संदेश की प्रभावशीलता कमजोर पड़ती दिखाई देती है। अमेरिकी राजनीति के भीतर भी यह बहस तेज हो रही है कि क्या लगातार सैन्य तनाव वास्तव में शांति प्रक्रिया को आगे बढ़ा सकता है या फिर स्थिति को और विस्फोटक बना रहा है।

ईरान का संदेश क्या है?

ईरान की प्रतिक्रिया केवल सैन्य जवाब नहीं बल्कि राजनीतिक संदेश भी है। तेहरान यह दिखाना चाहता है कि वह अब केवल चेतावनियों तक सीमित नहीं रहेगा और यदि उसके रणनीतिक हितों या सहयोगियों को निशाना बनाया गया तो वह प्रत्यक्ष जवाब देने की क्षमता रखता है। ईरानी नेतृत्व यह भी संकेत दे रहा है कि वह अभी अपनी प्रतिक्रिया को सीमित दायरे में रख रहा है, लेकिन यदि हमले जारी रहे तो संघर्ष का दायरा बढ़ सकता है। यानी वर्तमान हमलों को अंतिम चरण नहीं बल्कि संभावित बड़े टकराव की प्रस्तावना के रूप में भी देखा जा रहा है।

सबसे बड़ा खतरा-गलत आकलन

इतिहास बताता है कि कई बड़े युद्ध किसी एक बड़े फैसले से नहीं बल्कि छोटे-छोटे जवाबी हमलों की श्रृंखला से शुरू हुए हैं। आज सबसे बड़ा खतरा यही है कि दोनों पक्ष एक-दूसरे की मंशा या क्षमता का गलत आकलन कर बैठें। यदि किसी मिसाइल हमले में बड़े पैमाने पर जनहानि होती है, किसी महत्वपूर्ण सैन्य अड्डे को भारी नुकसान पहुंचता है या किसी वरिष्ठ सैन्य अधिकारी की मौत होती है, तो हालात तेजी से नियंत्रण से बाहर जा सकते हैं। ऐसी स्थिति में युद्धविराम की बची-खुची संभावनाएं भी समाप्त हो सकती हैं।

कूटनीति की आखिरी खिड़की

कतर और अन्य क्षेत्रीय देशों की मध्यस्थता कोशिशें इस समय बेहद महत्वपूर्ण हैं। यदि बातचीत के रास्ते पूरी तरह बंद हो गए तो पश्चिम एशिया एक ऐसे संघर्ष की ओर बढ़ सकता है जिसका असर केवल क्षेत्र तक सीमित नहीं रहेगा। दुनिया पहले ही यूक्रेन, आर्थिक अनिश्चितता और ऊर्जा संकट जैसी चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे समय में इज़रायल-ईरान का खुला युद्ध वैश्विक अस्थिरता को कई गुना बढ़ा सकता है। दो महीने पहले घोषित युद्धविराम आज लगभग कागज़ी दस्तावेज़ बनता दिखाई दे रहा है। मिसाइलों, हवाई हमलों और आक्रामक बयानबाज़ी ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पश्चिम एशिया में शांति अभी भी बेहद नाजुक है।

सबसे चिंताजनक बात यह है कि दोनों पक्ष फिलहाल पीछे हटने के बजाय अपनी-अपनी सैन्य और राजनीतिक स्थिति मजबूत करने में लगे दिखाई दे रहे हैं। ऐसे में हर नया हमला केवल एक सैन्य कार्रवाई नहीं, बल्कि उस आग में डाला गया नया ईंधन है जो पूरे क्षेत्र को अपनी चपेट में ले सकती है। आज सवाल यह नहीं है कि अगला हमला कौन करेगा। असली सवाल यह है कि क्या अभी भी ऐसा कोई कूटनीतिक रास्ता बचा है जो पश्चिम एशिया को एक और विनाशकारी युद्ध से बचा सके।

गाज़ा से हिमाचल तक-युद्ध अपराधों का सवाल भारत के दरवाज़े पर

इज़रायल-फ़िलिस्तीन संघर्ष अब केवल पश्चिम एशिया की सीमाओं तक सीमित नहीं रह गया है। इसका एक नया पहलू तब सामने आया जब बेल्जियम स्थित हिंद रजब फाउंडेशन ने भारत सरकार से हिमाचल प्रदेश में छुट्टियां मना रहे इज़रायली रिज़र्व सैनिक ईतान गिलबोआ को गिरफ्तार करने की मांग की। फाउंडेशन का आरोप है कि गिलबोआ गाज़ा के खान यूनिस, रफ़ा और अन्य इलाकों में आवासीय बस्तियों को ध्वस्त करने वाली सैन्य कार्रवाइयों में शामिल रहे हैं।

संस्था का दावा है कि उसके पास ऐसे वीडियो मौजूद हैं जिनमें कथित तौर पर गिलबोआ रिहायशी इलाकों को नष्ट करने की कार्रवाई में भाग लेते और उसका जश्न मनाते दिखाई देते हैं। इस शिकायत ने एक महत्वपूर्ण कानूनी और नैतिक बहस को जन्म दिया है। सवाल केवल एक सैनिक का नहीं, बल्कि यह है कि क्या अंतरराष्ट्रीय मानवीय कानूनों के कथित उल्लंघन के आरोपों का सामना कर रहे व्यक्तियों के खिलाफ दुनिया के दूसरे देशों को भी कार्रवाई करनी चाहिए? हिंद रजब फाउंडेशन का तर्क है कि जिनेवा कन्वेंशनों के तहत भारत जैसे हस्ताक्षरकर्ता देशों की भी कुछ जिम्मेदारियां बनती हैं।

हालांकि भारतीय अधिकारियों की ओर से अभी तक कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया नहीं आई है, लेकिन यह मामला इस बात की याद दिलाता है कि गाज़ा युद्ध के प्रभाव अब केवल बमबारी और मिसाइल हमलों तक सीमित नहीं हैं। युद्ध के साथ-साथ जवाबदेही, मानवाधिकार और कथित युद्ध अपराधों के प्रश्न भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति और न्याय व्यवस्था के केंद्र में आते जा रहे हैं। और शायद यही इस पूरे विवाद का सबसे महत्वपूर्ण पहलू है-युद्ध केवल मोर्चों पर नहीं लड़ा जाता, उसकी गूंज अदालतों, कूटनीति और दुनिया के दूसरे देशों तक भी पहुंचती है।

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