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Home»भारत

‘भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र है’: भागवत का बयान लोकतंत्र के लिए चेतावनी है

adminBy adminDecember 29, 2025 भारत No Comments5 Mins Read
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mohan bhagwat
KOLKATA, INDIA APRIL 1: RSS chief Mohan Bhagwat at Hedgewar Praja Samman in Kalamandir on April 1, 2015 in Kolkata, India. (Photo by Indranil Bhoumik/Mint via Getty Images)
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एक ऐलान जो संवैधानिक मूल्यों को सीधे चुनौती देता है

मोहन भागवत का यह कहना कि “भारत पहले से ही एक हिंदू राष्ट्र है” किसी सांस्कृतिक बहस की शुरुआत नहीं करता बल्कि यह उस परियोजना का सार्वजनिक ऐलान है, जो भारतीय लोकतंत्र को भीतर से खोखला करने में वर्षों से लगा हुआ है। यह बयान सीधे-सीधे संविधान की वैधता को चुनौती देता है और यह साफ़ करता है कि संघ की नज़र में संविधान एक बाधा है, न कि सहमति का आधार। यह कोई चूक नहीं है। यह एक घोषणा-पत्र है।


संविधान को दरकिनार करने की खुली मंशा

जब भागवत कहते हैं कि संविधान में ‘हिंदू राष्ट्र’ शब्द जोड़ा जाए या न जोड़ा जाए उन्हें कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता तो वो यह साफ़ कर रहे हैं कि सत्ता का असली स्रोत संसद नहीं, जनता नहीं, बल्कि एक वैचारिक संगठन है जो खुद को ऐतिहासिक सत्य का संरक्षक मानता है। संविधान को “अनावश्यक अनुमति” बताने का यह तर्क लोकतंत्र के मूल विचार को उलट देता है। लोकतंत्र में सत्य तय नहीं किया जाता बल्कि वो सहमति से बनाया जाता है। संघ का दृष्टिकोण ठीक इसके उलट है कि सत्य पहले से मौजूद है, संविधान बाद में आया है, और इसलिए संविधान को झुकना होगा। यह सोच लोकतांत्रिक नहीं, थियोक्रेटिक है।


‘हिंदू राष्ट्र’: एक राजनीतिक हथियार

‘हिंदू राष्ट्र’ कोई सांस्कृतिक अवधारणा नहीं है। यह एक बहिष्करणकारी राजनीतिक औज़ार है। इसका सीधा अर्थ है जो इस पहचान में पूरी तरह फिट नहीं बैठता, वह दूसरे दर्जे का नागरिक है। भारत में 25 प्रतिशत आबादी धार्मिक अल्पसंख्यकों की है। उन्हें बार-बार यह याद दिलाना कि यह देश “मूल रूप से” उनका नहीं है, एक मनोवैज्ञानिक युद्ध है। यह युद्ध कानून से नहीं, भाषा से लड़ा जाता है और मोहन भागवत की भाषा उसी युद्ध का घोषणापत्र है।


डर कोई कल्पना नहीं है, वह एक नीति है

संघ समर्थक अक्सर कहते हैं कि “डर फैलाया जा रहा है।” लेकिन अल्पसंख्यकों का डर किसी अफ़वाह से नहीं पैदा हुआ है बल्कि वह अनुभव से निकला हुआ है। ईसाइयों पर हमलों में अभूतपूर्व वृद्धि, मस्जिदों और चर्चों पर हमले, धार्मिक सभाओं को “अवैध” बताकर तोड़ना, यह सब बिना राजनीतिक संरक्षण के संभव नहीं है। जब हमले बढ़ते हैं और सज़ा नहीं मिलती, तो संदेश साफ़ होता है: राज्य देख रहा है, और सहमत है।


राज्य अब रेफरी नहीं, खिलाड़ी है

लोकतंत्र में राज्य का काम नागरिकों की रक्षा करना होता है। लेकिन आज भारत में राज्य खुद एक पक्ष बन चुका है। पुलिस, नगर निगम, प्रशासन ये सब अब कानून लागू करने वाली संस्थाएं नहीं, बल्कि वैचारिक हथियार बनती जा रही हैं। बुलडोज़र न्याय का प्रतीक नहीं, बल्कि सामूहिक सज़ा का औज़ार है। और संयोग से उसका रुख़ एक ही दिशा में जाता है। यह सब बिना शीर्ष नेतृत्व की सहमति के नहीं हो सकता।


नफ़रत: अपवाद नहीं चुनावी रणनीति है

प्रधानमंत्री के चुनावी भाषणों में धार्मिक अल्पसंख्यकों को बार-बार खतरे के रूप में पेश करना आकस्मिक नहीं, यह रणनीतिक ध्रुवीकरण है। जब मुसलमानों को ‘घुसपैठिया’, ‘जनसंख्या बम’ या ‘साज़िशकर्ता’ कहा जाता है, तो उन्हें नागरिक नहीं, समस्या के रूप में पेश किया जाता है। और जब कोई समुदाय “समस्या” बन जाता है, तो उसके अधिकार भी “वैकल्पिक” हो जाते हैं। यही फासीवादी राजनीति का पहला चरण होता है।


संविधान बदले बिना संविधान को ख़त्म करने की परियोजना

संघ और उसकी राजनीतिक शाखा की सबसे बड़ी चाल यही है कि वे संविधान को औपचारिक रूप से नहीं बदलते बल्कि वे उसे अप्रासंगिक बना देते हैं। काग़ज़ पर अधिकार रहेंगे, ज़मीन पर नहीं। कानून मौजूद रहेगा, लेकिन उसका इस्तेमाल चयनात्मक होगा। संस्थाएं रहेंगी, लेकिन उनकी आत्मा नहीं। यही वजह है कि आज भारत “संवैधानिक रूप से लोकतंत्र” है, लेकिन व्यवहार में तेज़ी से बहुसंख्यक तानाशाही की ओर बढ़ रहा है।


अंतरराष्ट्रीय पाखंड और नैतिक दिवालियापन

भारत पड़ोसी देशों में अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की बात करता है, लेकिन अपने घर में वही अधिकार कुचले जा रहे हैं। ‘दीमक’, ‘घुसपैठिया’, ‘विदेशी’ यह भाषा केवल नफ़रत नहीं, अमानवीकरण है। और अमानवीकरण के बाद हिंसा को ठहराना आसान हो जाता है।


आरएसएस छाया नहीं, असली सरकार

यह भ्रम पालना खतरनाक है कि आरएसएस सत्ता के बाहर है। वह सत्ता का वैचारिक मुख्यालय है। प्रधानमंत्री, मंत्री, मुख्यमंत्री सभी इसी वैचारिक अनुशासन से निकले हैं। इसलिए भागवत का बयान राय नहीं, नीति का संकेत है।


यह बहस धर्म की नहीं, नागरिकता की है

यह लड़ाई हिंदू बनाम मुस्लिम की नहीं है। यह संविधान बनाम विचारधारा की लड़ाई है। अगर ‘हिंदू राष्ट्र’ की अवधारणा को चुनौती नहीं दी गई, तो कल किसी को भी “कम भारतीय” घोषित किया जा सकता है। आज अल्पसंख्यक, कल असहमत नागरिक। लोकतंत्र तख्तापलट से नहीं मरता। वह तालियों के बीच, नारों के शोर में, धीरे-धीरे दम तोड़ता है। मोहन भागवत का बयान उसी मौत की सार्वजनिक सूचना है।


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