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Home»भारत

पहले सज़ा फिर ज़मानत ?

adminBy adminJanuary 8, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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उमर ख़ालिद, शरजील इमाम मामला
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पहले सज़ा फिर ज़मानत: उमर ख़ालिद, शरजील इमाम मामला और न्यायपालिका के सामने खड़ा लोकतंत्र का सवाल
सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिल्ली दंगों की कथित “साज़िश” के मामले में उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत
याचिका ख़ारिज करना केवल एक कानूनी फ़ैसला नहीं है बल्कि यह भारतीय लोकतंत्र की आत्मा, संविधान की
व्याख्या और असहमति के अधिकार पर सीधा सवाल बन चुका है। चार साल से ज़्यादा समय से बिना ट्रायल के जेल
में बंद दो युवा, एक छात्र नेता, दूसरा शोधार्थी जिस पर अदालत का यह कहना कि उन्हें अभी भी ज़मानत नहीं मिल
सकती, इस बहस को और तेज़ कर देता है कि क्या भारत में “ज़मानत नियम और जेल अपवाद है” अब केवल किताबों
की पंक्ति बनकर रह गया है?


सीपीआई (एम) का विरोध

राजनीतिक बयान या संवैधानिक चेतावनी?:- सीपीआई (एम) का बयान महज़ एक
विपक्षी प्रतिक्रिया नहीं है, बल्कि न्याय की प्रक्रिया पर उठाया गया गंभीर संवैधानिक प्रश्न है। पार्टी का यह कहना कि
सुप्रीम कोर्ट का फ़ैसला “प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों के ख़िलाफ़” है, उस गहरे असंतोष को दर्शाता है जो लंबे समय
से नागरिक अधिकार संगठनों, क़ानूनविदों और बुद्धिजीवियों में पनप रहा है। चार वर्षों से ज़्यादा समय तक मुक़दमे
से पहले जेल और वो भी यूएपीए जैसे कठोर क़ानून के तहत, इस आशंका को मज़बूत करता है कि क़ानून अब सज़ा
देने का औज़ार बनता जा रहा है, न कि न्याय तक पहुंचने का माध्यम।


यूएपीए सुरक्षा क़ानून या असहमति कुचलने का हथियार?

सीपीआई (एम) का आरोप है कि यूएपीए का इस्तेमाल
असहमति की आवाज़ों को दबाने के लिए किया जा रहा है। पिछले वर्षों में जिस तरह छात्र, पत्रकार, सामाजिक
कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी इस क़ानून के तहत गिरफ़्तार हुए हैं, उसने यह सवाल पैदा कर दिया है कि क्या सरकार
और जाँच एजेंसियाँ अदालत से पहले ही “दोषी” तय कर चुकी हैं?
अगर अदालतें ट्रायल से पहले ही वर्षों तक जेल में रखने को जायज़ ठहराने लगें, तो न्याय की गति नहीं, उसकी मंशा
संदिग्ध हो जाती है।


न्याय की दो धाराएँ?

दिलचस्प और चिंताजनक तथ्य यह है कि इसी मामले में पाँच अन्य अभियुक्तों- गुलफ़िशा
फ़ातिमा, मीरान हैदर, शिफ़ा उर रहमान, मोहम्मद सलीम ख़ान और शादाब अहमद को ज़मानत दे दी गई, लेकिन
उमर ख़ालिद और शरजील इमाम को नहीं। यह अंतर केवल कानूनी नहीं, बल्कि राजनीतिक प्रतीकात्मकता से भी
जुड़ा दिखता है। दोनों नाम सरकार-विरोधी विमर्श में मुखर रहे हैं। ऐसे में यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्या
अदालतें भी अनजाने में “पहचान” और “विचार” के आधार पर न्याय देने लगी हैं?


लोकतंत्र की असली परीक्षा

लोकतंत्र की असली परीक्षा लोकप्रिय फ़ैसलों से नहीं, बल्कि अलोकप्रिय लेकिन
न्यायपूर्ण फ़ैसलों से होती है। असहमति, विरोध और सवाल उठाने वालों की आज़ादी ही किसी भी लोकतांत्रिक
व्यवस्था की रीढ़ होती है।
अगर जेल में वर्षों तक बंद रखना ही सज़ा बन जाए और ट्रायल केवल औपचारिकता, तो यह संविधान के अनुच्छेद
21- व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार का खुला क्षरण है।


अदालत के कटघरे में है अब सवाल

उमर ख़ालिद और शरजील इमाम की ज़मानत याचिका ख़ारिज होने के साथ ही
कटघरे में केवल आरोपी नहीं, बल्कि न्याय की पूरी प्रक्रिया खड़ी है। सवाल यह नहीं कि ये दोषी हैं या निर्दोष बल्कि
सवाल यह है कि
क्या भारत में आज भी क़ानून नागरिक की रक्षा करता है, या सत्ता की सुविधा बन चुका है? जब तक इस सवाल का
जवाब ईमानदारी से नहीं दिया जाता, तब तक हर ऐसी गिरफ़्तारी लोकतंत्र पर एक नया दाग़ छोड़ती रहेगी।

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