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Home»एलान विशेष

सिनेमा पर पहरा: ‘संवेदनशीलता’ के नाम पर सच से डरती सत्ता

adminBy adminMarch 30, 2026 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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 ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ पर कथित “मौखिक रोक” कोई साधारण प्रशासनिक निर्णय नहीं है बल्कि यह उस दौर का संकेत है जहां सत्ता यह तय करना चाहती है कि जनता क्या देखे, क्या सोचे और किस दर्द को महसूस करे। केंद्रीय फिल्म प्रमाणन बोर्ड (सीबीएफसी) का काम फिल्मों का प्रमाणन है, न कि सत्ता की असहजताओं को ढंकना। लेकिन जब “मौखिक निर्देश” जैसे शब्द सामने आते हैं, तो साफ़ हो जाता है कि मामला कानून से ज्यादा “इशारों” पर चल रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

डर किससे है: एक फिल्म से या उसकी सच्चाई से?

यह फिल्म गाजा में एक मासूम बच्ची की मौत की कहानी कहती है कि एक ऐसा सच, जिसे दुनिया ने देखा, महसूस किया और जिस पर बहस की। तो फिर भारत में इस पर खामोशी क्यों? अगर कारण “भारत-इज़रायल संबंध” हैं, तो सवाल और गहरा हो जाता है कि क्या हमारी विदेश नीति इतनी कमजोर है कि एक फिल्म उसे हिला दे? या फिर समस्या उस असुविधाजनक मानवीय सच्चाई से है, जो सत्ता के तय नैरेटिव में फिट नहीं बैठती?

‘मौखिक रोक’: सेंसरशिप का नया, खतरनाक हथियार

Cinematograph Act, 1952 एक स्पष्ट प्रक्रिया देता है मंजूरी, कट या लिखित अस्वीकृति। लेकिन “मौखिक रोक” क्या है? न कोई आदेश। न कोई जिम्मेदारी। न कोई जवाबदेही। यह सेंसरशिप का सबसे खतरनाक रूप है जहां सरकार कुछ कहती नहीं, लेकिन सब समझ जाते हैं।

चयनात्मक सख्ती: कौन-सी फिल्म ‘राष्ट्रहित’ और कौन ‘संवेदनशील’?

यहीं से असली बहस शुरू होती है चयनात्मकता की। भारत में हाल के वर्षों में हमने एक स्पष्ट पैटर्न देखा है: The Kerala Story जैसी फिल्मों को कई राज्यों में टैक्स छूट मिली, शीर्ष राजनीतिक नेतृत्व द्वारा सार्वजनिक रूप से सराहा गया और बड़े पैमाने पर प्रमोट किया गया।

वहीं, “Kerala Story 2” जैसे प्रोजेक्ट्स जिन पर तथ्यात्मकता और अतिरंजना को लेकर पहले से सवाल उठते रहे उन्हें भी एक खास वैचारिक माहौल में जगह मिलती रही लेकिन दूसरी तरफ: ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ जैसी फिल्म जिसे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सराहना मिली, जो एक वास्तविक मानवीय त्रासदी पर आधारित है। उसे “संवेदनशील” बताकर रोक दिया जाता है। यानी, जो कथा सत्ता के अनुकूल है वह ‘राष्ट्रवादी’ बन जाती है, और जो असहज सवाल उठाए वह ‘संवेदनशील’ या ‘खतरनाक’ करार दी जाती है।

अभिव्यक्ति की आज़ादी या नियंत्रित नैरेटिव?

भारतीय संविधान का Article 19(1)(a) सिर्फ़ सहमति की आज़ादी नहीं देता बल्कि यह असहमति की भी रक्षा करता है। लेकिन जब: फिल्मों को अनौपचारिक रूप से रोका जाए, कुछ खास तरह की फिल्मों को बढ़ावा दिया जाए और दर्शकों के विकल्प सीमित कर दिए जाएं, तो यह साफ़ हो जाता है कि यह लड़ाई अब सिर्फ़ कंटेंट की नहीं, बल्कि नैरेटिव पर नियंत्रण की है। सत्ता की असली असहजता: सवाल पूछने वाले समाज से।

सिनेमा हमेशा से सत्ता के लिए असहज रहा है, क्योंकि: यह भावनाओं को झकझोरता है। यह आधिकारिक बयान से अलग सच्चाई दिखाता है और यह दर्शक को सोचने पर मजबूर करता है। ‘द वॉइस ऑफ हिंद रजब’ भी वही कर रही है, एक ऐसी कहानी दिखाकर, जिससे आंखें चुराना आसान है, लेकिन सामना करना मुश्किल।

जब फिल्में नहीं, सवाल सेंसर होते हैं

यह मामला हमें एक खतरनाक सच्चाई की तरफ ले जाता है। आज सेंसरशिप सिर्फ़ फिल्मों पर नहीं, बल्कि विचारों की दिशा पर लग रही है। “संवेदनशीलता” एक बहाना बन चुकी है। “मौखिक निर्देश” एक तरीका और “राष्ट्रहित” एक ढाल। असल डर फिल्म से नहीं है बल्कि डर उस सोच से है, जो फिल्म देखने के बाद पैदा हो सकती है। और यही किसी भी लोकतंत्र के लिए सबसे बड़ा खतरा है।

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