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Home»भारत

भारत, पाकिस्तान की तरह “दलाल” तो नहीं है लेकिन…..

adminBy adminMarch 29, 2026 भारत No Comments4 Mins Read
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पश्चिम एशिया में जारी तनाव के बीच बुलाई गई सर्वदलीय बैठक ने जितने सवालों के जवाब देने का दावा किया, उससे कहीं अधिक नए सवाल खड़े कर दिए। कागज़ पर यह एक “राष्ट्रीय एकजुटता” की कवायद थी, लेकिन हकीकत में यह सरकार और विपक्ष के बीच भरोसे की खाई को और उजागर करती दिखी। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

बैठक की अगुवाई राजनाथ सिंघ ने की और इसमें अमित शाह और एस. जयशंकर जैसे शीर्ष मंत्री मौजूद रहे। सरकार का दावा था कि उसने हर सवाल का जवाब दिया और विपक्ष ने “समर्थन” जताया। लेकिन विपक्षी नेताओं जैसे संजय सिंघ और तारिक़ अनवर के बयान इस दावे से मेल नहीं खाते। उनका कहना साफ था: जवाब अधूरे हैं, और सबसे अहम मुद्दों पर चुप्पी बरकरार है।……

असली विवाद

सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब ईरान पर अमेरिका और इज़रायल की कार्रवाई जैसी गंभीर घटना हुई, तब भारत सरकार ने स्पष्ट रुख क्यों नहीं लिया? और अगर लिया, तो उसे संसद में रखने से परहेज़ क्यों? संसद लोकतंत्र का सबसे बड़ा मंच है। ऐसे में “बंद कमरे” में सर्वदलीय बैठक बुलाना और संसद में चर्चा से बचना यह केवल प्रक्रिया का मुद्दा नहीं, बल्कि पारदर्शिता का सवाल है। विपक्ष का यह कहना कि चर्चा सदन में होनी चाहिए थी, एक लोकतांत्रिक मांग है, न कि राजनीतिक जिद।

“दलाल” टिप्पणी और कूटनीति का सवाल

सरकार ने यह कहकर अपनी स्थिति मजबूत करने की कोशिश की कि भारत, पाकिस्तान की तरह “दलाल” देश नहीं है। यह बात सिद्धांत रूप में बिल्कुल सही है भारत की विदेश नीति ऐतिहासिक रूप से स्वतंत्र और संतुलित रही है। लेकिन असली सवाल यहीं से शुरू होता है कि क्या वही संतुलन आज भी कायम है?

एक तरफ भारत इसराइल के साथ खुले तौर पर नजदीकी दिखाता है, दूसरी ओर अमरीका के साथ रणनीतिक साझेदारी लगातार गहरी होती जा रही है। ऐसे में अगर सरकार यह कहती है कि वह सभी पक्षों से समान दूरी बनाए हुए है, तो यह दावा जांच के दायरे में आता है।

कूटनीति या झुकाव?

विपक्ष का आरोप सीधा है कि भारत की छवि एक “तटस्थ” शक्ति की बजाय एक “झुकाव वाली” शक्ति के रूप में उभर रही है। नरेंद्र मोदी की इज़रायल यात्रा, वह भी हमले से ठीक पहले, इस बहस को और हवा देती है। यहाँ यह स्पष्ट करना जरूरी है कि अंतरराष्ट्रीय संबंध केवल प्रतीकों से नहीं चलते, लेकिन प्रतीकों का असर गहरा होता है। अगर एक देश किसी संकट के ठीक पहले किसी एक पक्ष के साथ अत्यधिक निकटता दिखाता है, तो स्वाभाविक रूप से उसकी तटस्थता पर सवाल उठेंगे।

असली चिंता ऊर्जा संकट

राजनीतिक बहस से अलग, सबसे बड़ा व्यावहारिक मुद्दा ऊर्जा सुरक्षा का है। सरकार ने दावा किया कि भारत अब 41 देशों से तेल-गैस खरीद रहा है और आपूर्ति सुरक्षित है। लेकिन ज़मीनी रिपोर्ट में एलपीजी की कतारें, बढ़ती कीमतें एक अलग तस्वीर पेश करती हैं।

होर्मुज जलडमरूमध्य से जहाजों की सुरक्षित आवाजाही का आश्वासन महत्वपूर्ण है, लेकिन यह केवल अस्थायी राहत है। अगर युद्ध लंबा खिंचता है, तो क्या भारत के पास दीर्घकालिक रणनीति है? यही वह सवाल है, जिसका स्पष्ट जवाब बैठक में सामने नहीं आया।

सवाल अभी बाकी हैं

सरकार का यह कहना सही है कि भारत “दलाल” देश नहीं है। लेकिन एक मजबूत और स्वतंत्र राष्ट्र होने का अर्थ केवल यह कहना नहीं, बल्कि उसे अपने हर कदम से साबित करना भी है। आज स्थिति यह है कि एक ओर सरकार खुद को सभी पक्षों का “दोस्त” बताती है, तो दूसरी ओर उसके कदम और बयान उसे एक खास धुरी के करीब दिखाते हैं। यही विरोधाभास इस पूरे विवाद की जड़ है।

लोकतंत्र में सबसे बड़ी ताकत सवाल पूछने की होती है। और जब सवाल संसद के भीतर पूछे जाने की बजाय बंद कमरों में सीमित कर दिए जाएं, तो यह केवल विपक्ष की नहीं, बल्कि पूरे लोकतंत्र की चिंता बन जाती है। पश्चिम एशिया का संकट केवल भू-राजनीति नहीं, बल्कि भारत की विदेश नीति की परीक्षा भी है और इस परीक्षा में पारदर्शिता, संतुलन और स्पष्टता ही असली कसौटी होंगी।

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