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Home»एलान विशेष

क्या बंगाल चुनाव लोकतंत्र के खात्मे की आख़िरी चेतावनी है?

adminBy adminMay 7, 2026 एलान विशेष No Comments5 Mins Read
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क्या भारत का लोकतंत्र सिर्फ ‘खतरे में’ है या अब अपनी आख़िरी साँसें गिन रहा है? पश्चिम बंगाल के चुनाव सिर्फ एक राज्य का चुनाव नहीं बल्कि पूरे देश के लोकतंत्र का आईना बन गए हैं। चुनाव नतीजे आए अभी 24 घंटे भी नहीं गुज़रे कि सड़कों पर हिंसा, तोड़फोड़ और आरोपों की आग भड़क उठी।15 साल से जो ब्राह्मण औरत बंगाल की मुख्यमंत्री है उन्होंने आरोप लगाया कि काउंटिंग सेंटर पे उन्हें मारा गया, उनके दफ्तरों को तोडा और जलाया जा रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सवाल ये है कि क्या ये लोकतंत्र है या सत्ता की जंग? एक तरफ जब TMC कार्यकर्ता हंगामा करते हैं तो सख्ती दिखाई जा रही है लेकिन जब बीजेपी कार्यकर्ता सड़क पर उतरते हैं तो रवैया बदल जाता है? क्या कानून सबके लिए बराबर है या सत्ता के हिसाब से बदलता है? 5 मुद्दे मैं आपके सामने रखूंगा जिसके बाद आप फैसला करें कि भारत में लोकतंत्र किस स्थिति में है। 

मुद्दा नंबर 1

EVM-(इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन) जब से भाजपा सत्ता में आयी है तब से EVM पर विपक्ष सवाल उठाता रहा है। आप गौर कीजिए अब तक जितने भी राज्यों में चुनाव हुए हैं तमिल नाडु और केरला को छोड़ कर (क्यों की इन राज्यों में ज़्यादा लोग सुशिक्षित हैं इसलिए वहां भाजपा जैसी कट्ठर और जातीयवादी पार्टियां पनप नहीं पाती)

क्या जब से भाजपा या मोदी – शाह केंद्र की सत्ता में आये हैं यूपी, एमपी, गुजरात, हरियाणा, राजिस्थान, बिहार, दिल्ली, महाराष्ट्र और अब बंगाल किस राज्य में भाजपा पर चुनावों के दौरान EVM में छेड़ -छाड़ और धांदलियों के आरोप नहीं लगे? या चुनाव आयोग पर आरोप नहीं लगे? अब तक जितने चुनाव हुए क्या वो निष्पक्ष हैं? अगर भाजपा पर लगे आरोप गलत हैं तो भाजपा बैलेट पेपर से चुनाव क्यों नहीं करवाती?

मुद्दा नंबर 2

एजेंसियों का इस्तेमाल- सीबीआई (Central Bureau of Investigation) और ईडी(Enforcement Directorate) क्या ये कानून का पालन कर रही हैं या राजनीति का हथियार बन चुकी हैं? क्यों रेड सिर्फ विपक्ष के नेताओं पर होती है और पार्टी बदलते ही सारे केस ‘गायब’ हो जाते हैं? इसी तरह क्या भारत का चुनाव आयोग ये संस्था आज भी उतनी ही स्वतंत्र है जितनी होनी चाहिए? अगर चुनाव आयोग बीजेपी का मोहरा नहीं है तो लोकसभा और राज्य सभा में विपक्षी दलों ने मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने का नोटिस संसद के दोनों सदनों में सौंप दिया था.

इस नोटिस पर लोकसभा के 130 और राज्यसभा के 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे. नियमों के मुताबिक लोकसभा में नोटिस के लिए कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के समर्थन की जरूरत होती है. हालांकि विपक्ष ने अब तक कुल 193 हस्ताक्षर जुटाकर यह जरूरी आंकड़ा आसानी से पार कर लिया है. फिर भी चुनाव आयोग को क्यों नहीं हटाया जा रहा।  फिर भी भाजपा कोई कार्रवाई क्यों नहीं करती? आखिर भाजपा को ज्ञानेश कुमार से ही इतनी मोहब्बत क्यों है?

मुद्दा नंबर 3

ध्रुवीकरण की राजनीति-आलोचकों का आरोप है कि नरेंद्र मोदी और अमित शाह की राजनीति ‘80 बनाम 15 प्रतिशत’ के फॉर्मूले पर चलती है। सिर्फ 15 प्रतिशत मुस्लिमों से 80 प्रतिशत हिन्दुओं को डराया और मुर्ख बनाया जा रहा है, उसमें से भी एसआइआर के बहाने लाखों मुसलमानों के नाम काटे गए और काटे जा रहे हैं। क्या भाजपा चुनाव विकास पर नहीं बल्कि पहचान और डर पर नहीं लड़ रही है? राजनीतिक बयानबाज़ी भी संदेह को हवा देती है। चुनाव से पहले हिमंत बिस्वा सरमा और अमित शाह द्वारा भाजपा की बड़ी जीत के दावे, और कुछ मीडिया संस्थानों के एग्ज़िट पोल, आलोचकों को “पूर्व-नियोजित नैरेटिव” का हिस्सा लगते हैं।

मुद्दा नंबर 4

न्यायपालिका की भूमिका पर उठते सवाल भी इस पूरे विमर्श को और जटिल बनाते हैं। यदि बड़ी संख्या में मतदाता वास्तव में अपने अधिकार से वंचित हुए हैं, तो इस पर स्पष्ट और पारदर्शी न्यायिक हस्तक्षेप की अपेक्षा स्वाभाविक है। 27 लाख ऐसे मतदाताओं के नाम काटे गए जो पहले वोट दे चुके हैं जिनके पास पुरे दस्तावेज़ हैं। इसी वजह से पश्चिम बंगाल चुनाव लोकतंत्र के अंत का प्रमाण साबित हो रहे हैं।

मुद्दा नंबर 5

सुरक्षा बलों की भूमिका-2.5 लाख केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) के जवान तैनात लेकिन सवाल – क्या वो पूरी तरह निष्पक्ष थे? अगर मतदाता सूची से लाखों नाम गायब हो जाएं, अगर संस्थाओं पर भरोसा डगमगाने लगे, अगर एजेंसियां सवालों के घेरे में आ जाएं, तो फिर लोकतंत्र बचता कहाँ है? लोकतंत्र सिर्फ चुनाव जीतने का नाम नहीं है, यह भरोसे, निष्पक्षता और समानता का नाम है। और अगर ये तीनों ही कमजोर पड़ जाएं, तो खतरा सिर्फ एक राज्य को नहीं पूरे देश को होता है।

बंगाल का चुनाव एक चेतावनी है अब भी नहीं संभले तो इतिहास गवाह होगा कि लोकतंत्र धीरे-धीरे नहीं बल्कि हमारी आँखों के सामने खत्म हुआ। आप क्या सोचते हैं? क्या लोकतंत्र सच में खतरे में है, या आखरी सांसें गिन रहा है? जय हिंद -जय लोकतंत्र!

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