जिन राज्यों में भाजपा की सरकारें हैं वहां अल्पसंख्यंकों दलितों, आदिवासियों, पिछड़ों, और
विशेष कर मुसलमानों पर अत्याचार करने की हर मुम्किन कोशिश जारी है मध्य प्रदेश, उत्तर
प्रदेश और राजस्थान के अलावा अन्य राज्यों में मुसलमानों के घरों पर बुलडोजर चला कर
उन्हें बेघर करके उन पर अत्याचार किया जा रहा है, देश की सर्वोच्च अदालत द्वारा हाल ही
में ‘बुलडोजर जस्टिस’ सवाल खड़े करने और राष्ट्रीय स्तर पर इसके लिए दिशानिर्देश तैयार
करने की टिप्पणी के कुछ दिनों बाद उत्तर प्रदेश के वरिष्ठ मंत्री और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के
पूर्व भरोसेमंद नौकरशाह एके शर्मा ने गुरुवार (5 सितंबर) को कहा कि राज्य में बुलडोजर
का इस्तेमाल जारी रहेगा। हरियाणा जैसे कई राज्यों में कथित गौरक्षक (हिंदुत्ववादी गुंडों) के
जरिए मुसलमानों की हत्याएं हो रही हैं और हाल ही में तो इन गुंडों ने एक हिंदू की भी
मुसलमान समझ कर हत्या करदी। यूपीए के अमरोहा जिले के एक स्कूल के सात वर्षीय छात्र
को गुरुवार को टिफिन में कथित तौर पर मांसाहारी भोजन- बिरयानी लाने पर स्कूल से
निकाल दिया गया। उत्तराखंड में पिछले कुछ सालों में कई जगहों पर सांप्रदायिक तनाव देखने
को मिला है. अब मुसलमानों को निशाना बनाने का नया मामला सामने आया है. रुद्रप्रयाग
जिले के कई गांवों के बाहर साइनबोर्ड लगाकर मुस्लिमों के प्रवेश को वर्जित किया जा रहा
है। दक्षिणपंथी संगठनों द्वारा यह बात फैलाई जा रही है कि बांग्लादेशी मुसलमान ज़मीन
हासिल करने के लिए आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं. इस संबंध में अनुसूचित
जनजाति आयोग की सदस्य व भाजपा नेता आशा लकड़ा ने 28 जुलाई को प्रेस वार्ता कर एक
सूची जारी की थी, जिसमें संथाल परगना क्षेत्र की 10 आदिवासी महिला जन प्रतिनिधियों और
उनके मुसलमान पति के नाम थे. उन्होंने कहा था कि रोहिंग्या मुसलमान व बांग्लादेशी
घुसपैठिये आदिवासी महिलाओं को फंसा रहे हैं। हालांकि इस मामले में फैक्ट फाइंडिंग समिति
के प्रतिनिधिमंडल का दावा है कि वे ऐसी कई महिलाओं से मिले. ऐसा एक भी मामला नहीं
मिला जिसमें बांग्लादेशी घुसपैठिये से शादी हुई हो. स्थानीय ग्रामीणों को भी ऐसे किसी
मामले की जानकारी नहीं है. ‘हाल के दिनों में भाजपा लगातार प्रचार कर रही है कि
संथाल परगना में बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिये आ रहे हैं जो आदिवासियों की ज़मीन
हथिया रहे हैं, आदिवासी महिलाओं से शादी कर रहे हैं और आदिवासियों की जनसंख्या कम
हो रही है. क्षेत्र में हाल की कई हिंसा की घटनाओं को जोड़ते हुए इन दावों पर सामाजिक
व राजनैतिक माहौल बनाया जा रहा है. ज़मीनी सच्चाई समझने के लिए झारखंड जनाधिकार
महासभा व लोकतंत्र बचाओ अभियान के एक प्रतिनिधिमंडल ने संथाल परगना जाकर हर
संबंधित मामले के तथ्यों की जांच की.’
प्रतिनिधिमंडल ने कई गांवों का दौरा किया और वहां के स्थानीय लोगों, छात्रों, जन
प्रतिनिधियों आदि से पूछा कि क्या किसी को आज तक एक भी बांग्लादेशी घुसपैठिये की
जानकारी है. सबने बोला कि नहीं है. जब पूछा गया कि उन्होंने घुसपैठ की बात कहां सुनी,
तो सबने कहा कि सोशल मीडिया से मालूम चला लेकिन आज तक देखे नहीं है.
बता दें कि झारखंड के भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने पिछले महीने संसद में बांग्लादेशी
घुसपैठियों का मुद्दा उठाया था. उन्होंने दावा किया था कि संथाल परगना में आदिवासियों की
संख्या कम होती जा रही है क्योंकि बड़ी संख्या में बांग्लादेशी घुसपैठिये आकर बस रहे हैं।
उत्तराखंड के चमोली जिले के नंदानगर इलाके में रविवार (1 सितंबर) को नाबालिग से
छेड़छाड़ का आरोप लगा कर हिंदुत्ववादी गुंडों की भीड़ ने लगभग आधा दर्जन मुसलमानों
द्वारा संचालित दुकानों में तोड़-फोड़ की।
हिमाचल प्रदेश की राजधानी शिमला के संजौली क्षेत्र में एक चार मंज़िला मस्जिद को गिराने
की मांग को लेकर रविवार को हिंदुत्व समूहों के नेतृत्व में सैकड़ों लोगों ने विरोध प्रदर्शन
किया।
प्रदर्शनकारियों ने मस्जिद को गिराने और हिंदुओं की एकता का आह्वान करते हुए नारे लगाए
और मस्जिद के पास भजन गाए।
रिपोर्टों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों ने लोगों को मुसलमानों को अपनी संपत्तियां न बेचने या
किराए पर न देने की सलाह भी दी। रिपोर्ट में कहा गया कि ऐसा करने पर उनके बहिष्कार
की धमकी दी गई।
शहर के विभिन्न हिस्सों से लगभग 500 लोगों ने इस प्रदर्शन में भाग लिया। उन्होंने शिमला में
अल्पसंख्यक समुदाय से संबंधित प्रवासियों की बढ़ती संख्या पर आपत्ति जताई और इन
प्रवासियों के पुलिस सत्यापन और पंजीकरण की भी मांग की।
मुसलमानों और मस्जिद के खिलाफ यह अभियान शहर के मलयाना इलाके में एक व्यापारी
और कुछ अन्य व्यापारियों तथा मुस्लिम समुदाय के सदस्यों के बीच विवाद के बाद शुरू हुआ।
शुक्रवार रात व्यापारी पर हमला किया गया और पुलिस ने मामले में प्राथमिकी दर्ज की।
मस्जिद के पास विरोध प्रदर्शन जारी रहने के कारण जिला प्रशासन के वरिष्ठ अधिकारी भीड़
को शांत करने के लिए मौके पर पहुंचे। अधिकारियों ने कहा कि वक्फ बोर्ड की जमीन पर
बनी मस्जिद की ऊपरी मंजिल को लेकर कुछ समस्या थी और मामला विचाराधीन था। इस
मामले की सुनवाई शनिवार को नगर निगम अदालत में होगी।
हेट डिटेक्टर ने अधिकारी के हवाले से सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर पोस्ट करते हुए लिखा,
“मामला संवेदनशील है और समुदायों की धार्मिक भावनाएं जुड़ी हुई हैं।”
अब बात करते हैं आसाम की, आसाम के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा मुसलमानों के खिलाफ
ज़हर उगलने और उन पर अत्यचार करने में योगी महाराज से भी आगे निकलने की कोशिश
कर रहे हैं, 24 अगस्त 2024 को चराईदेव जिले में मुस्लिम समुदाय के मज़दूरों के एक समूह
पर उनके कार्यस्थल पर हमला किया गया। असमिया मूलनिवासी समूहों द्वारा बंगाली
मुसलमानों को पूर्वी असम के जिलों से बाहर जाने के आह्वान किया गया। यह घटना असम
के मुख्यमंत्री हिमंत बिस्वा सरमा द्वारा 21 अगस्त को फेसबुक लाइव वीडियो स्ट्रीम करते
समय की गई हालिया टिप्पणियों के परिणामस्वरूप हुई है, जिसमें उन्होंने मई 2024 से
महिलाओं और कुछ अन्य समुदायों के खिलाफ अपराधों को गिनाया था। इसमें उन्होंने “मिया
मुसलमानों” पर अपराधी होने का आरोप लगाया था।
इतना ही नहीं असम विधानसभा ने शुक्रवार को कार्यवाही के दौरान ब्रिटिश काल से चली आ
रही उस प्रथा को खत्म कर दिया, जिसके तहत मुस्लिम नेता नमाज अदा कर सकते थे.
हिंदुस्तान टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, विधानसभा ने कार्यवाही के दौरान प्रक्रिया और
आचरण के नियमों के नियम 11 में संशोधन किया, जो सदन की बैठकों से संबंधित है. नियम
के अनुसार, शुक्रवार और शनिवार को छोड़कर सभी कार्यदिवसों पर सुबह 9:30 बजे से दोपहर
2 बजे तक बैठकें होती थीं.
शुक्रवार को सदन सुबह 9:30 बजे से 11:30 बजे तक और दोपहर 3 बजे से शाम 5 बजे तक
बैठता था. इस दौरान दो घंटे का ब्रेक मिलता था. हालांकि, नियमों में यह स्पष्ट नहीं किया
गया था कि शुक्रवार को यह ब्रेक नमाज अदा करने के लिए है, लेकिन मुस्लिम विधायक
दशकों से इसका इस्तेमाल कार्यवाही में शामिल होने से पहले नमाज अदा करने के लिए करते
आ रहे हैं।
इस संबंध में, ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) के एक मुस्लिम विधायक
ने कहा कि यह नियम कई दशकों से चला आ रहा है. उन्होंने इसे बदलने की आवश्यकता
पर सवाल उठाया.
उन्होंने कहा, ‘मौजूदा परंपरा को बदलने की क्या आवश्यकता थी? असम में हिमंता बिस्वा शर्मा
के नेतृत्व वाली मौजूदा भाजपा (भारतीय जनता पार्टी) सरकार 2026 के विधानसभा चुनावों
को ध्यान में रखते हुए मुस्लिम समुदाय को निशाना बना रही है.’
वहीं, बिहार के पूर्व उपमुख्यमंत्री और राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता तेजस्वी यादव ने
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा पर ‘सस्ती लोकप्रियता’ हासिल करने का आरोप
लगाया।
इसके आलावा सोमवार, 2 सितंबर 2024 को असम के बरपेटा ज़िले में 28 व्यक्तियों को उनके
घरों से हटा दिया गया, उनके परिवारों से अलग कर दिया गया और उन्हें “घोषित विदेशी”
करार दिया गया। हिरासत में लिए गए लोगों में 19 पुरुष और 9 महिलाएं शामिल हैं। उनके
परिवारों द्वारा महसूस की गई पीड़ा एक ऐसी दिल दहला देने वाली वास्तविकता को बयां
करती है जिसमें वे अपने क़रीबियों से जबरन दूर किए गए और बिना किसी निश्चितता के
फिर से मिलने का दर्द सह रहे हैं।
असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा के खिलाफ कई विपक्षी नेताओं ने पुलिस में शिकायत
दर्ज कराई है. यह शिकायत शर्मा के उस बयान के बाद दर्ज कराई गई है जिसमें उन्होंने
कहा था कि वह ‘एक पक्ष लेगें’ और ‘मिया मुसलमानों को पूरे असम पर कब्ज़ा नहीं करने
देंगे’. शिकायत में उन पर ‘धर्म और नस्ल के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच द्वेष फैलाने
का’ प्रयास करने का आरोप लगाया गया है.
शिकायत में कहा गया है, ‘सार्वजनिक रूप से इस तरह की लगातार टिप्पणियों से विभिन्न
समुदायों के बीच वैमनस्य पैदा होने की संभावना है… अगर ऐसे व्यक्ति को तुरंत गिरफ्तार
नहीं किया गया और उस पर लगाम नहीं लगाई गई, तो वह राजनीतिक लाभ लेने के लिए
राज्य में दंगे जैसी स्थिति पैदा कर सकता है.’
बता दें कि मुख्यमंत्री शर्मा लगातार मुसलमानों के खिलाफ सांप्रदायिक बयानबाजी देते रहे हैं
और सरकार के प्रमुख के तौर पर समुदाय विशेष के खिलाफ फैसले लेते रहे हैं।
लोकसभा चुनावों के बाद हाल ही में उन्होंने कहा था कि बांग्लादेशी मूल के अल्पसंख्यकों ने
भाजपा के खिलाफ वोट दिया था।
इससे पहले उन्होंने मुसलमानों में बाल विवाह, बहुविवाह और शिक्षा को लेकर निशाना साधा
था। राज्य में मदरसों के खिलाफ भी वह लगातार मुखर रहे थे। वर्ष 2022 में सांप्रदायिक
टिप्पणी मामले में अदालत उनके खिलाफ एफआईआर दर्ज करने तक को कह चुकी है। राज्य
में इमामों के रजिस्ट्रेशन से लेकर मिया संग्रहालय तक को सील करने के फैसले वह ले चुके
हैं। यहां तक कि असम में महंगाई के लिए वह मिया मुसलमानों को जिम्मेदार ठहरा चुके हैं.
वहीं, बीते वर्ष उन्होंने कहा था कि उन्हें अगले 10 सालों तक मिया वोटों की जरूरत नहीं
होगी। उक्त मामलों के मद्दे नज़र ये सवाल हर अल्पसंख्यांक के दिल में पैदा हो रहा है कि
क्या देश में अल्पसंख्यंकों पर हो रहे अत्याचार कब और कैसे रुकेंगे ?