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Home»भारत

झारखंड में हिंदुत्ववादी भीड़ का फ़ैसला और क़ानून की मौत

adminBy adminJanuary 11, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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झारखंड के गोड्डा ज़िले में पप्पू अंसारी की पीट-पीटकर हत्या कोई “अलग-थलग” घटना नहीं है, बल्कि यह उस ख़तरनाक प्रवृत्ति का हिस्सा है, जिसमें भीड़ खुद को अदालत, जज और जल्लाद, तीनों समझने लगी है। मवेशी चोरी के शक में एक व्यक्ति को रोकना, पूछताछ करना और फिर कुल्हाड़ी-फरसा-तीर से मार डालना—यह अपराध नहीं, एक सोची-समझी सामाजिक हिंसा है, जिसे अक्सर ‘शक’ और ‘आस्था’ का आवरण दे दिया जाता है।

शक से सज़ा तक क़ानून का उलंघन

एफ़आईआर के मुताबिक, हमलावरों ने पहले नाम पूछा। यही वह पल है जहाँ मामला सिर्फ़ चोरी के शक से आगे बढ़कर पहचान की राजनीति में बदलता दिखता है। अगर आरोप सही हैं कि नाम और धर्म जानने के बाद हमला हुआ, तो यह घटना सीधे-सीधे लिंचिंग की श्रेणी में आती है, जहाँ अपराध साबित होना नहीं, व्यक्ति की पहचान ही ‘अपराध’ बन जाती है। क़ानून में मवेशी चोरी का इलाज साफ़ है, पुलिस, जाँच, अदालत। लेकिन यहां क़ानून को रास्ते से हटाकर भीड़ ने हथियार उठा लिए। यह सवाल केवल पप्पू अंसारी की मौत का नहीं, बल्कि राज्य की संवैधानिक साख का है।

‘कानूनी काम’ बनाम ‘पुराना रिकॉर्ड’

परिजन कहते हैं कि पप्पू अंसारी वर्षों से कानूनी रूप से पशु परिवहन का काम कर रहे थे और उनके पास दस्तावेज़ थे। पुलिस यह भी जोड़ती है कि उनका आपराधिक रिकॉर्ड रहा है। लेकिन यह तथ्य—सच या असच भीड़ को हत्या का अधिकार नहीं देता। क़ानून का बुनियादी सिद्धांत है: पूर्व आरोप किसी नई घटना में बिना जाँच के सज़ा का आधार नहीं बन सकते। अक्सर ऐसी घटनाओं में “आपराधिक रिकॉर्ड” का ज़िक्र मौत के बाद किया जाता है, मानो यह हिंसा को नैतिक वैधता देने का तरीका हो।

धर्म, अफ़वाह और संगठित हिंसा

मवेशी चोरी के नाम पर होने वाली हिंसा का पैटर्न देश के कई हिस्सों में एक-सा है, अफ़वाह, भीड़, पहचान और फिर हत्या। यह स्वतःस्फूर्त ग़ुस्सा कम और सामाजिक-राजनीतिक माहौल का ज़्यादा नतीजा है।

जब राज्य समय पर, सख़्ती से और बिना भेदभाव कार्रवाई नहीं करता, तो संदेश साफ़ जाता है कि भीड़ का डर क़ानून से बड़ा है।

प्रशासन की परीक्षा

पुलिस का यह कहना कि “जांच के बाद ही कारण स्पष्ट होगा” प्रक्रियागत रूप से सही है, लेकिन नैतिक रूप से अपर्याप्त है। सवाल सिर्फ यह नहीं है कि एक सप्ताह में वजह मिलेगी या नहीं; सवाल यह है कि क्या दोषियों को उसी सख़्ती से पकड़ा जाएगा, जैसे किसी संगठित अपराध में किया जाता है? क्या इस हत्या को नाम देकर-लिंचिंग दर्ज किया जाएगा? क्या भीड़ को संरक्षण देने वाले नेटवर्क पर चोट होगी?

यह सिर्फ़ एक हत्या नहीं

पप्पू अंसारी की हत्या एक व्यक्ति की जान जाने की कहानी नहीं है; यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था की परीक्षा है, जहाँ क़ानून किताबों में है और फ़ैसले सड़क पर हो रहे हैं। अगर इस घटना को भी “शक”, “पुराना रिकॉर्ड” और “जाँच जारी है” की धुंध में छोड़ दिया गया, तो संदेश साफ़ होगा कि हिंदुत्ववादी भीड़ का न्याय सुरक्षित है, नागरिक असुरक्षित।

आज सवाल यह नहीं कि पप्पू अंसारी निर्दोष थे या दोषी। सवाल यह है कि क्या भारत में किसी भी हाल में भीड़ को मारने का अधिकार है?

अगर जवाब ‘नहीं’ है, तो उसे शब्दों में नहीं, कार्रवाई में दिखना चाहिए।

Also Read: पहले सज़ा फिर ज़मानत ?

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