राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) प्रमुख मोहन भागवत के ‘एकता, स्थिरता और भेदभाव-मुक्त समाज’ वाले बयान ने एक बार फिर भारतीय राजनीति की उस बुनियादी विडंबना को उजागर कर दिया है, जिसमें कथन और आचरण के बीच गहरी खाई साफ़ दिखाई देती है। कांग्रेस नेता शमा मोहम्मद की प्रतिक्रिया इसी खाई की ओर सीधा इशारा करती है।
सवाल संघ के विचारों पर नहीं, बल्कि उनके कथित अनुयायियों के व्यवहार पर है। मोहन भागवत ने रायपुर में हिंदू सम्मेलन के मंच से जिस तरह ‘भारत सभी का है’ और ‘भेदभाव खत्म करने’ की बात की, वह अपने आप में एक उदार और समावेशी संदेश है। देहरादून में छात्र एंजल चकमा की हत्या का ज़िक्र कर उन्होंने संकेत दिया कि हिंसा और नफ़रत किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए।
लेकिन राजनीति केवल मंचीय भाषणों से नहीं चलती, वह ज़मीनी हकीकत से परखी जाती है। यही वह बिंदु है जहां शमा मोहम्मद का सवाल तीखा हो जाता है। उनका कहना है कि अगर संघ प्रमुख वाकई एकता चाहते हैं, तो फिर संघ-परिवार से जुड़े नेता रोज़मर्रा की राजनीति में इसके उलट भाषा और व्यवहार क्यों अपनाते हैं?
ज़मीनी हकीकत और बयानबाज़ी में अंतर
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ, असम के मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा शर्मा या भाजपा सांसद गिरिराज सिंह – इन सभी पर समय-समय पर अल्पसंख्यकों के ख़िलाफ़ तीखी और विभाजनकारी बयानबाज़ी के आरोप लगते रहे हैं। यही नहीं, विश्व हिंदू परिषद जैसे संगठनों पर ईसाई समुदाय के ख़िलाफ़ हिंसा और डर के माहौल को बढ़ावा देने के आरोप भी सार्वजनिक बहस का हिस्सा रहे हैं।
इसी तरह इस वक़्त हिंदुत्ववादी गुंडों द्वारा ईसाईयों और मुसलमानों पर हो रहे हमले और हथियार बाँटने पर न कोई रोक है न उन पर कोई करवाई।
असली सवाल: प्रभाव का अभाव?
यहां असली सवाल यह नहीं है कि मोहन भागवत क्या कहते हैं, बल्कि यह है कि उनकी बातों का संघ-परिवार की राजनीति पर कितना प्रभाव पड़ता है। कांग्रेस का आरोप सीधा है—”आरएसएस ही बीजेपी है और बीजेपी ही आरएसएस है।” अगर यह दावा सही माना जाए, तो फिर संघ प्रमुख के उदार संदेश और भाजपा नेताओं के आक्रामक बयान एक ही वैचारिक ढांचे के भीतर कैसे सह-अस्तित्व में रह सकते हैं?
दोहरे चरित्र की राजनीति
दरअसल, यह टकराव भारतीय राजनीति के दोहरे चरित्र को दिखाता है। एक तरफ़ वैचारिक मंचों पर एकता, सांस्कृतिक सौहार्द और ‘सबका भारत’ की बातें होती हैं, वहीं दूसरी ओर चुनावी राजनीति में ध्रुवीकरण, पहचान की राजनीति और नफ़रत की भाषा बार-बार उभर आती है।
आलोचकों का कहना है कि संघ की ‘नैतिक सलाह’ तब तक खोखली लगती है, जब तक वह अपने प्रभावशाली राजनीतिक चेहरों को सार्वजनिक रूप से नियंत्रित या अनुशासित नहीं करता। शमा मोहम्मद की मांग इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
संदेश बनाम कार्यान्वयन
अगर संघ प्रमुख सचमुच एकता के पक्षधर हैं, तो उन्हें सबसे पहले अपने संगठन और उससे जुड़े राजनीतिक नेताओं को यह समझाना चाहिए कि नफ़रत और भेदभाव की राजनीति उनके ही घोषित मूल्यों के ख़िलाफ़ है। वरना ‘एकता’ का संदेश केवल भाषणों तक सीमित रह जाएगा और ज़मीनी राजनीति में उसका कोई असर नहीं दिखेगा।
अंततः, यह बहस कांग्रेस बनाम संघ की नहीं, बल्कि भारत के लोकतांत्रिक और बहुलतावादी चरित्र की है। सवाल यही है कि क्या देश की राजनीति सच में भेदभाव से मुक्त एकता की ओर बढ़ेगी, या फिर यह ‘एकता’ केवल भाषणों की सजावट बनकर रह जाएगी? या हिन्दुत्ववादियों को मिली ये छूट गृह युद्ध में बदल जाएगी?
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