छत्तीसगढ़ की भाजपा सरकार ने सरकारी और निजी स्कूलों में दिन में तीन बार राष्ट्रगान, वंदे मातरम्, सरस्वती वंदना, दीप मंत्र, गुरु मंत्र, भजन और गायत्री मंत्र का सामूहिक पाठ अनिवार्य कर दिया है। सरकार का कहना है कि इससे बच्चों में अनुशासन, नैतिकता, देशभक्ति और भारतीय संस्कृति के प्रति सम्मान विकसित होगा। लेकिन इस फैसले ने एक ऐसा सवाल खड़ा कर दिया है, जिसका जवाब केवल छत्तीसगढ़ ही नहीं, पूरे देश को देना होगा कि क्या भारत का सरकारी स्कूल संविधान से चलेगा या किसी एक धार्मिक परंपरा से? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
शिक्षा का समय या धार्मिक अनुष्ठानों का समय?
सरकार ने दिन में तीन अलग-अलग समय प्रार्थना और धार्मिक पाठ के लिए निर्धारित किए हैं। सुबह राष्ट्रगान, वंदे मातरम्, दीप मंत्र, सरस्वती वंदना, गुरु मंत्र और महापुरुषों पर पाठ; दोपहर में भजन; और छुट्टी से पहले फिर राष्ट्रगीत तथा गायत्री मंत्र। सवाल यह है कि यदि दिन में तीन-तीन बार सामूहिक प्रार्थना और धार्मिक गतिविधियां होंगी, तो पढ़ाई कब होगी?
देश पहले ही शिक्षा की गुणवत्ता, शिक्षकों की कमी, स्कूलों के बुनियादी ढांचे, गिरते सीखने के स्तर और बेरोजगारी जैसी गंभीर चुनौतियों से जूझ रहा है। ऐसे समय में क्या सरकार की प्राथमिकता गणित, विज्ञान, भाषा और तकनीकी शिक्षा होनी चाहिए या धार्मिक अनुष्ठानों का विस्तार? अगर सरकार का मानना है कि शिक्षा का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा धार्मिक मंत्रों का सामूहिक पाठ है, तो फिर स्पष्ट रूप से यह भी बता देना चाहिए कि सरकारी स्कूल आधुनिक शिक्षा संस्थान हैं या धार्मिक शिक्षण केंद्र?
क्या संविधान यही कहता है?
भारत का संविधान देश को एक धर्मनिरपेक्ष गणराज्य घोषित करता है। इसका अर्थ धर्म-विरोध नहीं, बल्कि राज्य द्वारा सभी धर्मों के प्रति समान दूरी और समान सम्मान रखना है। जब किसी सरकारी स्कूल में एक विशेष धार्मिक परंपरा से जुड़े मंत्र, वंदनाएं और भजन सभी छात्रों के लिए अनिवार्य किए जाते हैं, तो स्वाभाविक रूप से यह प्रश्न उठता है कि दूसरे धर्मों के छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता और अंतरात्मा की स्वतंत्रता का क्या होगा? यही कारण है कि नागरिक अधिकार संगठनों और विपक्षी दलों ने इस आदेश पर आपत्ति जताई है। उनका तर्क है कि सांस्कृतिक शिक्षा और धार्मिक अनुष्ठान अलग-अलग चीजें हैं, और राज्य को दोनों के बीच की संवैधानिक सीमा का सम्मान करना चाहिए।
संस्कृति और धर्म में अंतर समझना होगा
भारतीय संस्कृति केवल संस्कृत मंत्रों या किसी एक धार्मिक परंपरा तक सीमित नहीं है। भारत की संस्कृति में कबीर हैं, गुरु नानक हैं, बसवेश्वर हैं, बुद्ध हैं, महावीर हैं, सूफी संत हैं, आदिवासी परंपराएं हैं, संविधान निर्माता डॉ. भीमराव आंबेडकर हैं, मौलाना आज़ाद हैं और असंख्य भाषाएं, लोक परंपराएं और विविध धार्मिक मान्यताएं हैं। यदि सरकार वास्तव में भारतीय संस्कृति सिखाना चाहती है, तो उसे संविधान, वैज्ञानिक सोच, सहिष्णुता, विविधता, समानता और नागरिक कर्तव्यों पर भी समान बल देना चाहिए।
क्या यही नई शिक्षा नीति है?
देश के लाखों सरकारी स्कूलों में आज भी शिक्षकों के पद खाली हैं। हजारों स्कूलों में प्रयोगशालाएं नहीं हैं। अनेक बच्चों के पास पुस्तकें, डिजिटल संसाधन और गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का अभाव है। लेकिन इन मूल समस्याओं पर गंभीर पहल करने के बजाय यदि सरकार धार्मिक अनुष्ठानों को अनिवार्य बनाने में अधिक सक्रिय दिखाई दे, तो यह आलोचना स्वाभाविक है कि उसकी प्राथमिकताएं शिक्षा सुधार से अधिक वैचारिक एजेंडे की ओर झुकी हुई हैं।
क्या हर भाजपा शासित राज्य में यही प्रयोग होगा?
यह भी एक बड़ा राजनीतिक प्रश्न है। पिछले कुछ वर्षों में विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में पाठ्यक्रम, इतिहास, प्रार्थनाओं और सांस्कृतिक गतिविधियों से जुड़े कई फैसलों पर बहस हुई है। समर्थकों का कहना है कि यह भारतीय परंपराओं का पुनर्जागरण है, जबकि आलोचकों का आरोप है कि इससे राज्य और धर्म के बीच की संवैधानिक दूरी कमज़ोर होती है। यह बहस केवल छत्तीसगढ़ की नहीं, बल्कि पूरे भारतीय लोकतंत्र की दिशा से जुड़ा प्रश्न बनती जा रही है।
राष्ट्रभक्ति का प्रमाण मंत्रों से नहीं, संविधान के सम्मान से मिलता है। देशभक्ति किसी मंत्र के उच्चारण से नहीं मापी जा सकती। एक अच्छा नागरिक वह है जो संविधान का सम्मान करे, कानून का पालन करे, दूसरे धर्मों का आदर करे, वैज्ञानिक सोच रखे और समाज के प्रति जिम्मेदार बने। यदि शिक्षा व्यवस्था बच्चों को इन मूल्यों की जगह धार्मिक पहचान के आधार पर विभाजित करने लगेगी, तो यह भविष्य के भारत के लिए चिंता का विषय होगा।
सरकार से पूछे जाने वाले कुछ सीधे सवाल
क्या सरकारी स्कूलों में किसी एक धर्म से जुड़े मंत्रों को अनिवार्य करना संविधान की धर्मनिरपेक्ष भावना के अनुरूप है? १. यदि कोई छात्र या उसके अभिभावक धार्मिक आधार पर इन गतिविधियों में भाग नहीं लेना चाहते, तो क्या उन्हें छूट मिलेगी?
२. तीन बार प्रार्थना और धार्मिक पाठ के बाद वास्तविक शिक्षण के लिए कितना समय बचेगा?
३.क्या गणित, विज्ञान, अंग्रेज़ी और तकनीकी शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने के लिए भी सरकार ने इतनी ही विस्तृत योजना बनाई है?
४.क्या राज्य का दायित्व आधुनिक और समावेशी शिक्षा देना है या किसी विशेष धार्मिक परंपरा का अनिवार्य पालन कराना?
भारतीय संस्कृति का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन संविधान की सीमाओं के भीतर। सरकारी स्कूलों का उद्देश्य सभी धर्मों, सभी वर्गों और सभी समुदायों के बच्चों को समान अवसर देना है। यदि कोई नीति इस संतुलन पर सवाल खड़े करती है, तो उसका लोकतांत्रिक और संवैधानिक परीक्षण होना स्वाभाविक है। लोकतंत्र में सरकारें फैसले लेती हैं, लेकिन उन फैसलों पर सवाल पूछना भी लोकतंत्र का उतना ही महत्वपूर्ण हिस्सा है। शिक्षा का उद्देश्य बच्चों को बेहतर नागरिक बनाना है, और बेहतर नागरिक वही बन सकता है जिसे संविधान, समानता, वैज्ञानिक दृष्टिकोण और विविधता का सम्मान करना सिखाया जाए।
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