मध्य प्रदेश के नर्मदापुरम जिले की अदालत द्वारा 2022 के सिवनी मालवा मॉब लिंचिंग मामले में 14 दोषियों को उम्रकैद की सजा सुनाए जाने के बाद कुछ तथाकथित गौ-रक्षक संगठनों और हिंदुत्ववादी सोशल मीडिया समूहों ने जिस तरह का अभियान शुरू किया है, उसने एक बार फिर यह साबित कर दिया है कि उनके लिए कानून से अधिक महत्वपूर्ण भीड़ की हिंसा को वैध ठहराना है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अदालत ने किसी व्यक्ति को “गाय बचाने” के लिए नहीं, बल्कि एक इंसान की पीट-पीटकर हत्या, हत्या के प्रयास, दंगा और गैरकानूनी भीड़ का हिस्सा बनने जैसे अपराधों के लिए दोषी ठहराया है। अभियोजन के साक्ष्यों और गवाहों के आधार पर अदालत ने पाया कि आरोपियों ने कानून अपने हाथ में लिया और एक व्यक्ति की जान ले ली। इसलिए उन्हें उम्रकैद की सजा दी गई। लेकिन फैसले के बाद सोशल मीडिया पर सवाल पूछा जा रहा है-“क्या गौ-रक्षा करना अपराध है?” इसका सीधा उत्तर है-नहीं। गौ-रक्षा अपराध नहीं है, लेकिन हत्या अपराध है।
मॉब लिंचिंग अपराध है। किसी व्यक्ति को शक के आधार पर पीट-पीटकर मार देना अपराध है। यदि वास्तव में किसी को पशु तस्करी या गोवंश संबंधी कानून के उल्लंघन का संदेह हो तो उसका अधिकार केवल पुलिस को सूचना देना है। किसी नागरिक या संगठन को अदालत, पुलिस और जल्लाद-तीनों बनने का अधिकार भारतीय कानून नहीं देता।
आज जो लोग 14 दोषियों के परिवारों के आंसू दिखाकर सहानुभूति बटोर रहे हैं, उनसे एक सवाल पूछा जाना चाहिए कि क्या नज़ीर अहमद का परिवार परिवार नहीं था? क्या उस व्यक्ति के बच्चे, पत्नी और बूढ़े माता-पिता इंसान नहीं थे? क्या उन सैकड़ों लोगों के घर नहीं उजड़े जो पिछले वर्षों में गौ-रक्षा के नाम पर भीड़ की हिंसा का शिकार हुए?
ह्यूमन राइट्स वॉच द्वारा सिर्फ तीन साल में 2015 से 2018 के बीच के आंकड़ों पर जारी की गई रिपोर्ट में बताया गया था कि इस अवधि में 100 से अधिक हमलों में कम से कम 44 लोग मारे गए थे। सरकारी और स्वतंत्र डेटा-इंडियास्पेंड के एक विश्लेषण के अनुसार गाय से जुड़ी हिंसा में मारे गए लोगों में 86 प्रतिशत मुसलमान थे। ऐसे कई मामले सामने आए हैं जहां स्वयंभू ‘गौ रक्षकों’ ने गोहत्या या बीफ ले जाने के संदेह में लोगों, विशेषकर दलितों और अल्पसंख्यकों पर हिंसक हमले किए।
इन मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ऑफ़ इंडिया ने काफी चिंता जताई और सभी राज्य सरकारों को मॉब लिंचिंग और इस तरह की हिंसा को रोकने तथा दोषियों पर सख्त कार्रवाई करने के निर्देश दिए हैं। केंद्र सरकार ने संसद में अक्सर स्पष्ट किया है कि कानून को हाथ में लेने वाले किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाता और ऐसे मामलों में राज्य सरकारें कानून के अनुसार कार्रवाई करती हैं।
लेकिन विडंबना देखिए कि जब किसी व्यक्ति को केवल गोमांस रखने के शक में, गाय ले जाने के शक में या गो-तस्करी के शक में पीट-पीटकर मार दिया जाता है, तब यही लोग अक्सर चुप रहते हैं या भीड़ का बचाव करते हैं। लेकिन जब अदालत सबूतों के आधार पर दोषियों को सजा देती है, तब उन्हें कानून याद आने लगता है। और इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि कुछ लोग न्यायाधीश के धर्म और पहचान को मुद्दा बनाकर लोगों को भड़काने की कोशिश कर रहे हैं।
अगर किसी फैसले से असहमति है तो उसके लिए अपील की व्यवस्था मौजूद है। उच्च न्यायालय और सर्वोच्च न्यायालय के दरवाजे खुले हैं। लेकिन किसी जज को केवल उसके नाम, धर्म या जाति के कारण निशाना बनाना न्यायपालिका पर हमला है। यदि आज किसी मुस्लिम जज के खिलाफ धर्म के आधार पर नफरत फैलाई जाएगी, तो कल किसी हिंदू, सिख, ईसाई या दलित जज के खिलाफ भी यही तरीका अपनाया जाएगा। इससे सबसे बड़ा नुकसान न्याय व्यवस्था का होगा।
ध्यान देने वाली बात यह भी है कि गौ-रक्षा के नाम पर हुई हिंसा का शिकार केवल मुसलमान ही नहीं रहे हैं। विभिन्न मामलों में हिंदू, दलित और अन्य समुदायों के लोग भी भीड़ का निशाना बने हैं। इसका अर्थ है कि भीड़ का उन्माद अंततः किसी धर्म का नहीं होता, बल्कि कानून के शासन का दुश्मन होता है। आज यदि अदालत ने 14 लोगों को सजा दी है तो यह किसी धर्म की हार नहीं, बल्कि भीड़तंत्र पर कानून की जीत है।
देश संविधान से चलेगा या भीड़ से?
यदि हर व्यक्ति केवल शक के आधार पर किसी की जान लेने लगे तो फिर पुलिस, अदालत और न्यायपालिका की आवश्यकता ही क्या रह जाएगी? जो लोग आज पूछ रहे हैं कि “क्या गौ-रक्षा करना अपराध है?”, उनसे भी एक सवाल पूछा जाना चाहिए-क्या इंसान की हत्या करना धर्म है? क्या किसी को बिना मुकदमे, बिना सबूत, बिना अदालत के फैसला सुनाकर मार देना धार्मिक कर्तव्य है? यदि उत्तर “नहीं” है, तो अदालत का फैसला कानून के अनुरूप है।
गौ-रक्षा के नाम पर हिंसा का समर्थन करना न गाय की रक्षा है और न धर्म की। इससे केवल कानून का राज कमजोर होता है, समाज में नफरत बढ़ती है और निर्दोष लोगों की जान जाती है। आज जरूरत उन 14 दोषियों के लिए सहानुभूति जुटाने से अधिक इस बात की है कि भविष्य में किसी भी व्यक्ति-चाहे वह हिंदू हो, मुसलमान हो, दलित हो या किसी भी समुदाय का हो-को केवल अफवाह, शक या भीड़ के उन्माद के आधार पर अपनी जान न गंवानी पड़े। यही संविधान की भावना है, यही न्याय का सिद्धांत है और यही एक सभ्य लोकतंत्र की पहचान भी।
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