देश के विश्वविद्यालयों में इन दिनों एक नई होड़ दिखाई दे रही है। कहीं डिग्रियों पर “इंडिया” की जगह “भारत” लिखा जा रहा है, कहीं लेटरहेड और साइनबोर्ड बदले जा रहे हैं, तो कहीं आधिकारिक पत्राचार में “भारत” को अनिवार्य बनाया जा रहा है। पहली नज़र में यह एक भाषाई या सांस्कृतिक बदलाव लग सकता है, लेकिन जब इसकी परतें खुलती हैं तो सवाल केवल शब्दों का नहीं, बल्कि संविधान, शिक्षा की स्वायत्तता और वैचारिक हस्तक्षेप का बन जाता है। मध्य प्रदेश के रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय ने दीक्षांत समारोह की डिग्रियों पर “भारत” लिखने का फैसला किया। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
कुलपति ने इसे देश के “असली नाम” की वापसी बताया। लेकिन सवाल यह है कि क्या यह निर्णय विश्वविद्यालय की स्वतंत्र अकादमिक सोच का परिणाम है, या फिर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से जुड़ी संस्था “शिक्षा संस्कृति उत्थान न्यास” के लंबे समय से चल रहे अभियान का असर? रिपोर्टें बताती हैं कि यही न्यास वर्षों से “इंडिया नहीं, भारत” अभियान चला रहा है और प्रयागराज के ज्ञान महाकुंभ जैसे आयोजनों के माध्यम से विश्वविद्यालयों को इस दिशा में प्रोत्साहित भी कर रहा है। यही नहीं, अब कई केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालय भी एक-दूसरे से आगे निकलने की होड़ में दिखाई दे रहे हैं।
यह दृश्य स्वाभाविक कम और संगठित अधिक प्रतीत होता है। लेकिन असली प्रश्न यह नहीं है कि “भारत” कहा जाए या “इंडिया”। संविधान ने स्वयं अनुच्छेद 1 में स्पष्ट लिखा है— “India, that is Bharat” अर्थात “इंडिया अर्थात भारत”। दोनों नाम संवैधानिक रूप से समान रूप से वैध हैं। सर्वोच्च न्यायालय भी 2016 में यह स्पष्ट कर चुका है कि यदि कोई भारत कहना चाहता है तो कहे, यदि कोई इंडिया कहना चाहता है तो उसे भी पूरी स्वतंत्रता है। फिर यह प्रतिस्पर्धा क्यों? आखिर किसे साबित करना है कि एक नाम अधिक राष्ट्रवादी है और दूसरा कम?
यह वही दौर है जब सत्ता के हर संस्थान में प्रतीकों की राजनीति अपने चरम पर दिखाई देती है। इतिहास की किताबों से लेकर विश्वविद्यालयों तक और सरकारी निमंत्रण पत्रों से लेकर सार्वजनिक संस्थानों तक, हर जगह एक विशेष वैचारिक पहचान स्थापित करने की कोशिश दिखाई देती है। सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि यह केवल स्वैच्छिक सांस्कृतिक बदलाव है, तो इसके पीछे लगातार एक ही वैचारिक संगठन और उससे जुड़े मंच क्यों दिखाई देते हैं?
यहीं कर्नाटक के मंत्री प्रियंक खरगे का वह सवाल बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है जो उन्होंने हाल ही में आरएसएस को लेकर उठाया था। उन्होंने पूछा था कि “जिस देश में एक ठेले वाले को भी पंजीकरण कराना पड़ता है, वहां आरएसएस को किस कानून के तहत सरकार के प्रति जवाबदेह होने से छूट मिली हुई है?” यह सवाल केवल आरएसएस के पंजीकरण का नहीं है, बल्कि लोकतांत्रिक जवाबदेही का है। यदि कोई संगठन शिक्षा नीति, विश्वविद्यालयों के निर्णय, पाठ्यक्रम, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और सरकारी संस्थानों की कार्यशैली को प्रभावित कर रहा है, तो क्या उसे भी सार्वजनिक जवाबदेही के दायरे में नहीं होना चाहिए?
प्रियंक खरगे ने यह भी पूछा था कि आरएसएस किस कानून के अंतर्गत कार्य करता है, उसकी निर्णय प्रक्रिया क्या है, उसके वित्तीय स्रोत क्या हैं और यदि उसका प्रभाव सरकारी नीतियों तक दिखाई देता है तो उसकी पारदर्शिता सुनिश्चित क्यों नहीं की जाती? ये सवाल किसी वैचारिक विरोध के नहीं, बल्कि लोकतंत्र के मूल सिद्धांत Accountability (जवाबदेही) के हैं।
विडंबना यह है कि विश्वविद्यालय, जिनका काम वैज्ञानिक सोच, आलोचनात्मक चिंतन और स्वतंत्र बौद्धिक विमर्श को बढ़ावा देना है, वे अब वैचारिक प्रतिस्पर्धा का मंच बनते दिखाई दे रहे हैं। किसी विश्वविद्यालय की पहचान उसकी शोध गुणवत्ता, प्रयोगशालाओं, शिक्षकों और विद्यार्थियों से होनी चाहिए, न कि इस बात से कि उसने “इंडिया” हटाकर “भारत” पहले लिखा या बाद में। क्या देश की उच्च शिक्षा के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही रह गई है?
आज लाखों छात्र बेरोजगारी, शोध के अभाव, घटते बजट, फैकल्टी की कमी, छात्रवृत्तियों में कटौती और वैश्विक रैंकिंग में गिरावट जैसी समस्याओं से जूझ रहे हैं। लेकिन विश्वविद्यालयों की ऊर्जा नाम बदलने की होड़ में खर्च हो रही है। इस पूरे विवाद में एक और दिलचस्प पहलू है। यदि संविधान दोनों नामों को समान मान्यता देता है, सर्वोच्च न्यायालय दोनों के प्रयोग की स्वतंत्रता देता है और देश की जनता दशकों से दोनों शब्दों का सहज उपयोग करती आई है, तो फिर इस बहस को इतना राजनीतिक क्यों बनाया जा रहा है?
कहीं ऐसा तो नहीं कि वास्तविक मुद्दों से ध्यान हटाने के लिए प्रतीकों की राजनीति को आगे बढ़ाया जा रहा है? देश का नाम “भारत” हो या “इंडिया” उससे राष्ट्र की आत्मा नहीं बदलती। लेकिन यदि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता खत्म होने लगे, यदि शिक्षा संस्थान वैचारिक दबाव में फैसले लेने लगें और यदि लोकतांत्रिक संस्थाओं पर गैर-सरकारी वैचारिक संगठनों का प्रभाव बढ़ता जाए, तो यह निश्चित रूप से चिंता का विषय है। राष्ट्रवाद का प्रमाण किसी शब्द से नहीं, बल्कि संविधान के सम्मान, लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वतंत्रता और नागरिकों की समानता से मिलता है। भारत और इंडिया- दोनों हमारे संविधान के हैं। लेकिन विश्वविद्यालय किसी विचारधारा के नहीं, पूरे राष्ट्र के होने चाहिए।
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