देश के अलग-अलग हिस्सों से जहां भाजपा की सरकारें हैं वहां से लगातार ऐसी खबरें सामने आ रही हैं जिनमें मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों पर बुलडोजर कार्रवाई या उन्हें अतिक्रमण बताकर हटाने की घटनाएं चर्चा में हैं। प्रशासन हर बार यही कहता है कि कार्रवाई केवल अवैध निर्माणों के खिलाफ है और इसका किसी धर्म से कोई संबंध नहीं है। दूसरी ओर मुस्लिम संगठन और मानवाधिकार समूह आरोप लगाते हैं कि इन कार्रवाइयों का निशाना मुख्यतः मुस्लिम धार्मिक स्थल बन रहे हैं। क्या दशकों पुराणी मस्जिदें अवैध हो सकती हैं? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इसी पृष्ठभूमि में ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने देशव्यापी आंदोलन का ऐलान किया है। जमीयत उलमा-ए-हिंद, जमात-ए-इस्लामी हिंद और अन्य मुस्लिम संगठनों ने भी इन कार्रवाइयों पर विरोध दर्ज कराया है। लेकिन सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या यह विरोध बहुत देर से शुरू हुआ है?
सवाल केवल सरकार से नहीं, मुस्लिम नेतृत्व से भी है
सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना लोकतंत्र का हिस्सा है। यदि किसी कार्रवाई में कानून का उल्लंघन हुआ है तो अदालतें उसका फैसला करेंगी। लेकिन क्या मुस्लिम समाज की धार्मिक और सामाजिक रहनुमाई करने वाले संगठन स्वयं किसी आत्ममंथन के लिए तैयार हैं? आज जब वे देशव्यापी आंदोलन की बात कर रहे हैं तो यह सवाल भी उठता है कि आखिर इतने वर्षों तक उनकी रणनीति क्या थी? क्या उन्होंने केवल बयान देने को ही अपनी जिम्मेदारी समझ लिया था?
क्या बाबरी फैसला एक निर्णायक मोड़ था?
बहुत से लोगों का मानना है कि 2019 में बाबरी मस्जिद विवाद पर आए सर्वोच्च न्यायालय के फैसले के बाद परिस्थितियों में बड़ा बदलाव आया। यह भी एक मत है कि उस समय यदि मुस्लिम नेतृत्व ने उपलब्ध कानूनी विकल्पों जैसे समीक्षा याचिका, अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार मंचों पर अपील (जहाँ अधिकार-क्षेत्र और स्वीकार्यता लागू हो) या वैश्विक स्तर पर कानूनी विमर्श पर अधिक सक्रियता दिखाई होती, तो शायद बाद के विवादों का स्वरूप अलग होता।
दूसरी ओर यह भी सच है कि भारत की न्यायिक व्यवस्था सर्वोच्च है और अंतरराष्ट्रीय न्यायालयों का अधिकार-क्षेत्र सीमित तथा राज्यों की सहमति पर निर्भर करता है। इसलिए यह कहना कि किसी अंतरराष्ट्रीय अदालत में जाने से निश्चित रूप से ये घटनाएँ रुक जातीं, एक अनुमान है, स्थापित तथ्य नहीं। फिर भी यह प्रश्न बना रहता है कि क्या उस समय उपलब्ध सभी संवैधानिक और कानूनी विकल्पों का पूरा उपयोग किया गया?
1991 का कानून और बढ़ते विवाद
संसद ने 1991 में Places of Worship (Special Provisions) Act, 1991 बनाया था, यह कानून संसद द्वारा १९९१ में लागू किया गया था। यह भारत का एक महत्वपूर्ण कानून है। इस कानून का मुख्य उद्देश्य देश में धार्मिक शांति बनाए रखना है। यह कानून कहता है कि 15 अगस्त 1947 (आजादी के दिन) को जो भी धार्मिक स्थल (मंदिर, मस्जिद, चर्च, गुरुद्वारा आदि) जिस रूप में था, उसका धार्मिक स्वरूप वैसा ही बना रहेगा। किसी भी पूजा स्थल को दूसरे धर्म के पूजा स्थल में बदला नहीं जा सकता है।
इसे कानूनी रूप से बदलने की कोई भी कोशिश अपराध मानी जाती है। अगर कोई व्यक्ति किसी धार्मिक स्थल को बदलने की कोशिश करता है, तो उसे ३ साल तक की जेल और जुर्माना हो सकता है। जब यह कानून बना था, तो सिर्फ अयोध्या के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद विवाद को इससे अलग रखा गया था। इसके बावजूद हाल के वर्षों में कई ऐतिहासिक धार्मिक स्थलों को लेकर नए दावे और मुकदमे सामने आए हैं।
समर्थकों का कहना है कि वे ऐतिहासिक तथ्यों और कानूनी अधिकारों की जांच चाहते हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि इससे कानून की मूल भावना कमजोर होती है। यहाँ तक के मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित कमाल मौला मस्जिद को भी छीन लिया गया। यही वह परिस्थिति है जिसने मुस्लिम समाज में असुरक्षा की भावना को बढ़ाया है।
अब केवल प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं, ठोस कानूनी रणनीति चाहिए
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड, जमीयत उलमा-ए-हिंद और जमात-ए-इस्लामी हिंद वर्षों से मुस्लिम समाज की धार्मिक और कई मामलों में सामाजिक-राजनीतिक आवाज़ होने का दावा करते रहे हैं।
तो फिर सवाल यह भी बनता है कि क्या उन्होंने राष्ट्रीय स्तर पर स्थायी कानूनी सहायता तंत्र बनाया? क्या प्रत्येक विवादित मामले की व्यवस्थित कानूनी पैरवी की गई? क्या अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं के समक्ष दस्तावेज़ीकरण और तथ्य-आधारित प्रस्तुति की कोई दीर्घकालिक योजना बनाई गई? क्या मुस्लिम समाज को केवल भावनात्मक भाषणों से आगे बढ़कर संवैधानिक अधिकारों और कानूनी प्रक्रियाओं के प्रति संगठित किया गया? यदि इन सवालों का जवाब “नहीं” है, तो जिम्मेदारी केवल सरकारों पर डालकर नेतृत्व अपनी जवाबदेही से मुक्त नहीं हो सकता।
अंतरराष्ट्रीय मंच का सवाल
यदि किसी समुदाय को यह महसूस होता है कि उसे घरेलू स्तर पर न्याय नहीं मिल रहा, तो अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संस्थाओं का ध्यान आकर्षित करने की मांग उठना असामान्य नहीं है। हालांकि यह भी समझना आवश्यक है कि अंतरराष्ट्रीय मंचों की भूमिका सीमित होती है और वे किसी देश की न्यायपालिका का स्थान नहीं ले सकते। इसलिए किसी भी अंतरराष्ट्रीय पहल का आधार तथ्य, दस्तावेज़, कानूनी प्रक्रिया और मानवाधिकार मानकों पर आधारित होना चाहिए, न कि केवल राजनीतिक नारों पर।
मुस्लिम समाज को भी आत्ममंथन करना होगा
हर संकट में केवल सरकार को दोष देना पर्याप्त नहीं होता। समाज को यह भी पूछना चाहिए कि उसके प्रतिनिधि संगठनों ने पिछले तीन दशकों में कौन-सी दीर्घकालिक रणनीति बनाई? क्या वे केवल विरोध प्रदर्शन करते रहे?या उन्होंने ऐसी संस्थागत व्यवस्था विकसित की जो भविष्य में समुदाय के संवैधानिक अधिकारों की प्रभावी रक्षा कर सके? यदि नहीं, तो आज का आंदोलन केवल प्रतिक्रिया बनकर रह जाएगा। आज आवश्यकता केवल भावनात्मक भाषणों की नहीं, बल्कि दूरदर्शी नेतृत्व की है।
यदि वास्तव में मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों से जुड़े विवादों का सिलसिला रुकना है, तो उसके लिए मजबूत कानूनी तैयारी, संवैधानिक प्रक्रिया, तथ्य-आधारित दस्तावेज़ीकरण और शांतिपूर्ण लोकतांत्रिक संघर्ष आवश्यक होगा। साथ ही, मुस्लिम नेतृत्व को भी यह स्वीकार करना होगा कि समाज उनसे केवल बयान नहीं, बल्कि परिणाम चाहता है। इतिहास में ऐसे क्षण आते हैं जब नेतृत्व की परीक्षा केवल विरोध करने से नहीं, बल्कि दूरदृष्टि, तैयारी और जवाबदेही से होती है। आज शायद वही क्षण है।
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