क्या भारत में एक ऐसा संगठन भी है जो सरकार से बड़ा है? क्या देश में एक ऐसा ढांचा मौजूद है, जिससे जुड़े होने पर जवाबदेही के सारे नियम बदल जाते हैं? और क्या वजह है कि जिस देश में एक रेहड़ी-पटरी वाले को भी लाइसेंस, पंजीकरण और सरकारी नियमों का पालन करना पड़ता है, वहां लाखों कार्यकर्ताओं और हजारों संबद्ध संगठनों वाले आरएसएस की कानूनी स्थिति आज भी रहस्य और बहस का विषय बनी हुई है? कर्नाटक के गृह मंत्री प्रियंक खरगे ने यही सवाल उठाकर भारतीय राजनीति के सबसे संवेदनशील मुद्दों में से एक को फिर राष्ट्रीय बहस के केंद्र में ला दिया है।
खरगे ने पूछा है कि आखिर वह कौन सा कानून है जो आरएसएस को सरकार, संविधान और प्रशासनिक जवाबदेही से अलग दर्जा देता है? यदि ऐसा कोई कानून है तो देश को बताया जाए। यदि नहीं है, तो फिर बाकी संस्थाओं की तरह आरएसएस की संरचना, वित्तीय स्रोतों और संचालन व्यवस्था को भी सार्वजनिक जांच के दायरे में आना चाहिए। यह सवाल इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि आरएसएस कोई साधारण संगठन नहीं है। देश के राष्ट्रपति से लेकर प्रधानमंत्री, मुख्यमंत्री, मंत्री, सांसद और नौकरशाही तक अनेक प्रभावशाली पदों पर बैठे लोगों की वैचारिक पृष्ठभूमि किसी न किसी रूप में संघ से जुड़ी रही है।
शिक्षा, संस्कृति, श्रमिक संगठन, छात्र राजनीति, महिला संगठन, आदिवासी क्षेत्र, मीडिया और सामाजिक गतिविधियों तक फैले विशाल नेटवर्क के कारण आरएसएस को देश का सबसे प्रभावशाली गैर-सरकारी संगठन माना जाता है। लेकिन जितना बड़ा प्रभाव, उतने ही बड़े सवाल। आलोचकों का कहना है कि यदि केंद्र सरकार एफसीआरए के नाम पर मानवाधिकार संगठनों, सामाजिक संस्थाओं, धार्मिक संगठनों और विदेशी सहायता प्राप्त एनजीओ की जांच कर सकती है, उनके लाइसेंस रद्द कर सकती है, उनकी फंडिंग रोक सकती है, तो फिर वही कसौटी आरएसएस और उसके हजारों सहयोगी संगठनों पर क्यों नहीं लागू होती? यही वह प्रश्न है जिससे भाजपा और संघ परिवार असहज दिखाई देता है।
संघ का तर्क है कि वह “व्यक्तियों का समूह” है और उसकी स्थिति अदालतों तथा कर कानूनों के तहत पहले से स्पष्ट है। लेकिन विरोधियों का कहना है कि यदि लाखों लोगों वाला संगठन केवल “व्यक्तियों का समूह” है, तो फिर देश के अनेक अन्य संगठन भी स्वयं को इसी श्रेणी में रखकर जवाबदेही से बचने की मांग कर सकते हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
प्रियंक खरगे ने नरेंद्र मोदी के प्रचारक काल की विदेश यात्राओं का मुद्दा उठाकर विवाद को और गहरा कर दिया है। उन्होंने पूछा कि जब मोदी राजनीति में नहीं थे और संघ प्रचारक के रूप में विदेश यात्राएं कर रहे थे, तब उन यात्राओं का खर्च किसने उठाया? क्या उन फंडों का कोई सार्वजनिक रिकॉर्ड उपलब्ध है? इन सवालों का राजनीतिक महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि भाजपा स्वयं पारदर्शिता, राष्ट्रवाद और जवाबदेही की राजनीति का दावा करती है। ऐसे में विपक्ष पूछ रहा है कि क्या जवाबदेही केवल विरोधियों के लिए है या सत्ता के सबसे निकट माने जाने वाले संगठनों के लिए भी?
इतिहास भी इस बहस में महत्वपूर्ण है। महात्मा गांधी की हत्या के बाद संघ पर प्रतिबंध लगा। आपातकाल में प्रतिबंध लगा। बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी प्रतिबंध लगा। हर दौर में संघ और सत्ता के बीच टकराव हुआ। लेकिन आज पहली बार स्थिति उलट दिखाई देती है। अब संघ के आलोचक आरोप लगाते हैं कि संगठन केवल एक सामाजिक संस्था नहीं, बल्कि भारत की नीतियों और संस्थाओं पर गहरा प्रभाव रखने वाली शक्ति बन चुका है।
यही कारण है कि आरएसएस की कानूनी स्थिति, वित्तीय पारदर्शिता और सार्वजनिक जवाबदेही का प्रश्न केवल एक संगठन का प्रश्न नहीं रह गया है। यह लोकतंत्र में समानता के सिद्धांत का प्रश्न बन चुका है। लोकतंत्र की सबसे बुनियादी शर्त यह है कि कोई भी व्यक्ति, संगठन, दल या संस्था कानून से ऊपर नहीं हो सकती। यदि एक छोटे व्यापारी से लेकर एक एनजीओ तक सभी को अपने कामकाज का हिसाब देना पड़ता है, तो देश के सबसे प्रभावशाली संगठनों में से एक से वही सवाल पूछना अस्वाभाविक नहीं है।
प्रियंक खरगे का बयान शायद इसी वजह से इतना बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया है। क्योंकि यह बहस केवल आरएसएस की नहीं, बल्कि उस मूल प्रश्न की है जिस पर हर लोकतंत्र खड़ा होता है। क्या कानून सबके लिए बराबर है, या कुछ लोगों और कुछ संगठनों के लिए अलग नियम हैं? जब तक इस सवाल का स्पष्ट और पारदर्शी जवाब नहीं मिलता, तब तक यह विवाद खत्म होने वाला नहीं है।
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