पश्चिम बंगाल की राजनीति में एक ऐसा घटनाक्रम सामने आया है जिसने सिर्फ राज्य ही नहीं, बल्कि पूरे देश की राजनीति को चौंका दिया है। तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के करीब 20 सांसदों का अचानक नेशनलिस्ट सिटीज़न्स पार्टी ऑफ इंडिया (एनसीपीआई) एक ऐसी पार्टी में जाने का फैसला, जिसे देश के अधिकांश लोग जानते तक नहीं थे, कई गंभीर सवाल खड़े करता है। यह वही पार्टी है जिसने 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में महज़ तीन सीटों पर चुनाव लड़ा था, जिसे कुछ सौ वोट मिले थे और जिसके खाते में चुनाव के बाद सिर्फ 75 रुपये नकद बचे थे। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
जिस पार्टी का संगठनात्मक ढांचा लगभग न के बराबर था, वही अचानक लोकसभा की चौथी सबसे बड़ी पार्टी के अधिकांश सांसदों का नया ठिकाना बन जाती है। क्या यह सामान्य राजनीतिक घटना है या इसके पीछे कोई बड़ी राजनीतिक रणनीति काम कर रही है? सबसे बड़ा सवाल ये कि आख़िर टीएमसी के इतने “वफ़ादार” सांसद एक साथ क्यों चले गए? यही वे सांसद हैं जो कुछ महीने पहले तक ममता बनर्जी और तृणमूल कांग्रेस के सबसे भरोसेमंद चेहरे माने जाते थे। चुनाव प्रचार में उन्होंने भाजपा पर तीखे हमले किए, केंद्र सरकार पर लोकतंत्र को कमजोर करने के आरोप लगाए और बंगाल में भाजपा को रोकने के लिए जनता से वोट मांगे।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि वही सांसद एक ऐसी पार्टी में जाने को तैयार हो गए, जिसका न संगठन है, न जनाधार और न ही कोई राजनीतिक प्रभाव? उन्होंने जो कारण बताए-पार्टी में भ्रष्टाचार, आई-पैक का बढ़ता प्रभाव और अभिषेक बनर्जी का वर्चस्व, क्या वे वास्तव में इतने नए मुद्दे थे? क्या उन्हें ये सब बातें चुनाव से पहले दिखाई नहीं देती थीं? यह प्रश्न स्वाभाविक है कि यदि ये समस्याएं वर्षों से थीं, तो सांसदों ने जनता से वोट लेने से पहले पार्टी क्यों नहीं छोड़ी? चुनाव जीतने के बाद ही यह “अंतरात्मा” क्यों जागी?
क्या जांच एजेंसियों का दबाव भी एक कारण हो सकता है?
यह तथ्य सार्वजनिक रिकॉर्ड का हिस्सा है कि बागी सांसदों में से कई पहले से ही ईडी, सीबीआई या अन्य एजेंसियों की जांच का सामना कर रहे हैं। नारदा, शारदा और रोज वैली जैसे मामलों में कई नाम पहले से चर्चा में रहे हैं। यह कहना कि उन्होंने केवल जांच एजेंसियों के डर से पार्टी छोड़ी है, उपलब्ध तथ्यों के आधार पर सिद्ध नहीं किया जा सकता। लेकिन राजनीतिक विश्लेषकों और विपक्षी दलों ने लंबे समय से यह आरोप लगाया है कि केंद्रीय जांच एजेंसियों का इस्तेमाल विपक्षी नेताओं पर दबाव बनाने के लिए किया जाता है।
दूसरी ओर केंद्र सरकार लगातार इन आरोपों से इनकार करती रही है और कहती है कि एजेंसियां कानून के अनुसार स्वतंत्र रूप से काम करती हैं। फिर भी राजनीतिक घटनाक्रम एक दिलचस्प पैटर्न जरूर दिखाते हैं। जब कोई नेता विपक्ष में रहता है तो उस पर छापे पड़ते हैं, पूछताछ होती है, गिरफ्तारी की तलवार लटकती रहती है। लेकिन जैसे ही वही नेता भाजपा या उसके सहयोगी दलों के करीब पहुंचता है, कई मामलों में जांच की रफ्तार धीमी पड़ने या राजनीतिक विवाद कम होने की बातें सामने आती रही हैं। हर मामले में ऐसा हो, यह कहना सही नहीं होगा, लेकिन इस धारणा ने भारतीय राजनीति में गहरी जगह बना ली है।
अगर एजेंसियां स्वतंत्र हैं तो संदेह क्यों पैदा होता है?
लोकतंत्र में केवल न्याय होना ही पर्याप्त नहीं होता, न्याय होता हुआ दिखाई भी देना चाहिए। जब विपक्ष के नेताओं पर लगातार कार्रवाई होती है और सत्ता पक्ष में शामिल होने के बाद वही नेता राजनीतिक रूप से सुरक्षित दिखाई देते हैं, तब जनता के मन में सवाल उठना स्वाभाविक है। यही कारण है कि विपक्ष लगातार मांग करता रहा है कि जांच एजेंसियों की स्वतंत्रता और जवाबदेही सुनिश्चित की जाए ताकि किसी भी कार्रवाई पर राजनीतिक पक्षपात का आरोप न लगे। सबसे बड़ा विरोधाभास-जिस एनसीपीआई ने अपने पहले चुनाव में पोस्टर लगाकर जनता से अपील की थी कि “राजनीतिक दल बदलने वालों को नकारिए।”
आज वही पार्टी सबसे बड़े राजनीतिक दल-बदल की मेजबानी करने जा रही है। यह केवल राजनीतिक विडंबना नहीं बल्कि भारतीय राजनीति की बदलती संस्कृति का प्रतीक भी है। और इससे भी दिलचस्प बात यह है कि पार्टी के संगठन सचिव शांतनु डे स्वयं इस फैसले का विरोध कर रहे हैं। उनका कहना है कि उनसे बिना पूछे यह निर्णय लिया गया और वे भ्रष्टाचार के आरोप झेल रहे नेताओं को पार्टी में शामिल करने के पक्ष में नहीं हैं। यानी जिस पार्टी में सांसद जा रहे हैं, उसके अपने पदाधिकारी ही इस विलय से खुश नहीं हैं।
क्या यह दल-बदल विरोधी कानून से बचने का रास्ता है?
कई संवैधानिक विशेषज्ञों का मानना है कि किसी दूसरी पार्टी में समूह के रूप में शामिल होने की रणनीति का इस्तेमाल दल-बदल विरोधी कानून की जटिलताओं से बचने के प्रयास के रूप में देखा जा सकता है। हालांकि अंतिम निर्णय लोकसभा अध्यक्ष और आवश्यक होने पर न्यायपालिका के स्तर पर होगा।
क्या यह दल-बदल विरोधी कानून से बचने का रास्ता है?
लोकतंत्र में सरकार बदलना समस्या नहीं है। समस्या तब पैदा होती है जब जनता जिस विचारधारा और पार्टी के नाम पर वोट देती है, उसके प्रतिनिधि चुनाव जीतने के बाद बिना जनता से राय लिए दूसरी राजनीतिक दिशा में चले जाते हैं। इससे मतदाता का विश्वास कमजोर होता है और यह सवाल उठता है कि वोट पार्टी को मिला था या व्यक्ति को।
आखिर कब तक चलता रहेगा यह राजनीतिक खेल?
यदि वास्तव में विपक्षी दलों के नेताओं पर केवल इसलिए दबाव बनाया जाता है कि वे सत्ता पक्ष का साथ दें, तो यह लोकतांत्रिक संस्थाओं के लिए गंभीर चिंता का विषय होगा। वहीं यदि जांच एजेंसियां निष्पक्ष और साक्ष्यों के आधार पर कार्रवाई कर रही हैं, तो यह भी आवश्यक है कि उनकी प्रक्रिया इतनी पारदर्शी हो कि राजनीतिक बदले की धारणा पैदा न हो। भारतीय लोकतंत्र की मजबूती इसी में है कि जांच एजेंसियों पर जनता का भरोसा बना रहे और राजनीतिक दल-बदल केवल सत्ता परिवर्तन का माध्यम न बन जाए।
आज सवाल केवल टीएमसी या एनसीपीआई का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत की राजनीति अब विचारधारा से चलेगी या सत्ता के समीकरणों से? क्या सांसद जनता के जनादेश का सम्मान करेंगे या राजनीतिक सुविधानुसार दल बदलते रहेंगे? इन प्रश्नों का उत्तर केवल अदालतें या राजनीतिक दल नहीं देंगे। अंततः इसका निर्णय देश की जनता अपने वोट से करेगी। लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत भी वही है और उसकी अंतिम संरक्षक भी।
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