उत्तर प्रदेश के शामली में आयुष मलिक उर्फ मोहम्मद अली का मामला केवल एक व्यक्ति के धर्म परिवर्तन का मामला नहीं रह गया है। यह मामला अब भारतीय संविधान, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, धर्म की स्वतंत्रता और राज्य की भूमिका पर एक बड़ी बहस बन चुका है। मामले की शुरुआत तब हुई जब आयुष मलिक के पिता ने आरोप लगाया कि उनके बेटे को “निकाह ट्रैप” के जरिए इस्लाम कबूल करवाया गया और उसकी शादी चांदनी कुरैशी से कराई गई। शिकायत के आधार पर पुलिस ने चांदनी कुरैशी, उनके पिता इस्लाम कुरैशी सहित कई लोगों के खिलाफ मामला दर्ज किया और गिरफ्तारियां भी कीं।
लेकिन इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण पक्ष वह है जिसे अक्सर टीवी डिबेट और सांप्रदायिक शोर में दबा दिया जाता है। खुद आयुष मलिक, जो अब मोहम्मद अली के नाम से जाने जाते हैं, कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उन्होंने अपनी इच्छा से इस्लाम स्वीकार किया। उनका दावा है कि वे लगभग 12 साल पहले ही इस्लाम कबूल कर चुके थे और चार साल पहले चांदनी से निकाह किया था। उन्होंने यह भी कहा कि उन पर हिंदू धर्म में वापसी का दबाव बनाया जा रहा है और चांदनी की गिरफ्तारी गलत है। यहीं सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अगर एक 30-31 साल का वयस्क व्यक्ति बार-बार कैमरे के सामने आकर कह रहा है कि उसने अपनी मर्जी से धर्म बदला, किसी ने उसे मजबूर नहीं किया, तो फिर उसे “बहकाया गया”, “फुसलाया गया” या “ब्रेनवॉश किया गया” कैसे मान लिया गया? क्या आयुष कोई नाबालिग बच्चा है? क्या वह मानसिक रूप से निर्णय लेने में अक्षम है? क्या भारत का कानून यह मानता है कि एक वयस्क व्यक्ति अपने धर्म, विचार और जीवनसाथी के बारे में खुद फैसला नहीं कर सकता? यदि नहीं, तो फिर उसके बयान को महत्व क्यों नहीं दिया जा रहा?
भारतीय संविधान का अनुच्छेद 25 प्रत्येक नागरिक को अपनी अंतरात्मा की स्वतंत्रता और किसी भी धर्म को मानने, उसका पालन करने तथा प्रचार करने का अधिकार देता है। इसी तरह अनुच्छेद 21 व्यक्ति को अपनी पसंद का जीवन जीने और अपना जीवनसाथी चुनने का अधिकार देता है। सर्वोच्च न्यायालय भी कई मामलों में बालिग व्यक्तियों के वैवाहिक और व्यक्तिगत निर्णयों की रक्षा कर चुका है। लेकिन आज ऐसा लगता है कि जब धर्म परिवर्तन इस्लाम की ओर होता है, तब अचानक वयस्क व्यक्ति की स्वतंत्र इच्छा पर ही संदेह खड़ा कर दिया जाता है।
इस देश में ऐसे अनेक उदाहरण हैं जहां मुस्लिम युवतियों या युवकों ने हिंदू धर्म अपनाया, मंदिरों में विवाह किए और उन्हें “घर वापसी” कहकर स्वागत किया गया। उन मामलों में शायद ही कभी यह सवाल पूछा गया कि कहीं उन्हें बहकाया तो नहीं गया? कहीं उन पर दबाव तो नहीं था? कहीं उन्हें लालच तो नहीं दिया गया? लेकिन जब कोई व्यक्ति इस्लाम स्वीकार करता है तो अचानक पूरा प्रशासन, पुलिस, मीडिया और कई संगठन सक्रिय हो जाते हैं। यही दोहरा मापदंड लोगों को परेशान करता है। यदि धर्म परिवर्तन गलत है तो हर दिशा में गलत होना चाहिए।
यदि धर्म परिवर्तन व्यक्तिगत अधिकार है तो हर दिशा में अधिकार होना चाहिए। संविधान किसी धर्म विशेष के लिए अलग नियम नहीं बनाता। आयुष मामले में एक और दिलचस्प विरोधाभास दिखाई देता है। कुछ वर्ष पहले एक मुस्लिम नाबालिग लड़की के हिंदू युवक से विवाह के मामले में अदालत ने मुस्लिम पर्सनल लॉ का हवाला देते हुए उसे विवाह के लिए सक्षम माना था। उस समय व्यक्तिगत कानूनों और धार्मिक स्वतंत्रता की व्याख्या अलग थी। लेकिन आज एक 30 वर्षीय व्यक्ति, जो स्वयं अपने निर्णय की पुष्टि कर रहा है, उसके मामले में ऐसा व्यवहार हो रहा है मानो उसकी अपनी कोई इच्छा ही न हो।
यही कारण है कि देश में न्यायिक और प्रशासनिक फैसलों को लेकर भी बहस तेज होती जा रही है। लोग पूछ रहे हैं कि क्या कानून का उपयोग निष्पक्ष रूप से हो रहा है या फिर सामाजिक और राजनीतिक दबावों के अनुसार? हालांकि यह भी सच है कि किसी भी मामले में यदि धोखाधड़ी, जालसाजी, दबाव, धमकी या अवैध गतिविधियों के ठोस सबूत हों तो उनकी निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन जांच का आधार सबूत होना चाहिए, केवल धर्म परिवर्तन नहीं। यदि कथित पीड़ित स्वयं कह रहा है कि वह पीड़ित नहीं है, तो उसकी बात को भी गंभीरता से सुना जाना चाहिए।
आखिरकार सवाल केवल आयुष मलिक का नहीं है। सवाल यह है कि क्या भारत का नागरिक अपने धर्म का चुनाव स्वयं कर सकता है? क्या वह अपनी पसंद का जीवनसाथी चुन सकता है? क्या संविधान में लिखी धार्मिक स्वतंत्रता व्यवहार में भी मौजूद है? या फिर यह स्वतंत्रता केवल तब तक स्वीकार्य है जब तक व्यक्ति बहुसंख्यक समाज की अपेक्षाओं के अनुसार निर्णय ले रहा हो? शामली का यह मामला आने वाले समय में केवल एक धर्मांतरण विवाद के रूप में नहीं, बल्कि व्यक्तिगत स्वतंत्रता बनाम सामाजिक-राजनीतिक नियंत्रण की बहस के रूप में याद किया जा सकता है।
क्योंकि यदि एक 30 वर्षीय व्यक्ति के स्पष्ट बयान के बावजूद यह तय करने का अधिकार दूसरों के हाथ में चला जाए कि उसे कौन सा धर्म मानना चाहिए और किससे विवाह करना चाहिए, तो फिर यह बहस केवल आयुष की नहीं, हर भारतीय नागरिक की स्वतंत्रता की बहस बन जाती है।
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