दिल्ली की हिंदी अकादमी में जो हुआ, वह सिर्फ कुछ साहित्यिक पुरस्कारों के नाम बदलने की कहानी नहीं है। यह उस बड़े सवाल का हिस्सा है जो आज देश के करोड़ों लोगों के मन में उठ रहा है कि क्या भारत की संस्थाएं अब जनता की हैं या किसी एक विचारधारा की? दिल्ली सरकार ने हिंदी अकादमी के कई प्रतिष्ठित सम्मानों का नाम बदलकर वीर सावरकर, पंडित दीनदयाल उपाध्याय, अटल बिहारी वाजपेयी, विजय कुमार मल्होत्रा, मृदुला सिन्हा और अन्य व्यक्तित्वों के नाम पर रख दिया है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
समर्थक इसे राष्ट्रवाद और सांस्कृतिक पुनर्स्थापना बता रहे हैं, लेकिन आलोचकों की नजर में यह सांस्कृतिक संस्थाओं के राजनीतिककरण का एक और उदाहरण है। सवाल यह नहीं है कि इन व्यक्तित्वों का इतिहास में योगदान क्या है। सवाल यह है कि आखिर देश की हर संस्था, हर पुरस्कार, हर सड़क, हर पाठ्यपुस्तक और हर सांस्कृतिक मंच को एक ही वैचारिक चश्मे से क्यों देखा जाने लगा है? आज स्थिति यह है कि इतिहास बदला जा रहा है, नाम बदले जा रहे हैं, स्मृतियां बदली जा रही हैं और धीरे-धीरे समाज की सामूहिक चेतना को भी एक नए ढांचे में ढालने की कोशिश दिखाई दे रही है।
महिला साहित्यकारों के लिए स्थापित संतोष कोली सम्मान का नाम बदलना भी केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं है। संतोष कोली भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन का एक महत्वपूर्ण चेहरा थीं। उनके नाम को हटाना आलोचकों के अनुसार केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि राजनीतिक स्मृति परिवर्तन का प्रयास है। लेकिन यह कहानी सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में विपक्ष लगातार आरोप लगाता रहा है कि लोकतांत्रिक संस्थाओं की निष्पक्षता कमजोर हो रही है। चुनावी प्रक्रियाओं से लेकर जांच एजेंसियों तक, विश्वविद्यालयों से लेकर सांस्कृतिक संस्थाओं तक, हर जगह एक ही सवाल सुनाई देता है कि क्या संस्थाएं स्वतंत्र हैं?
हाल ही में राजस्थान में कांग्रेस उम्मीदवार के नामांकन को लेकर पैदा हुए विवाद ने भी बहस को हवा दी। विपक्ष ने इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर हमला बताया, जबकि सरकार और चुनावी अधिकारियों ने अपने कदम को नियमों के अनुरूप बताया। बाद में अदालतों में भी इस मामले को चुनौती दी गई, लेकिन न्यायिक प्रक्रिया ने तत्काल राहत नहीं दी। ऐसे मामलों ने राजनीतिक अविश्वास को और गहरा किया है। लोकतंत्र केवल चुनाव जीतने का नाम नहीं है।
लोकतंत्र का मतलब है निष्पक्ष संस्थाएं, मजबूत विपक्ष, स्वतंत्र मीडिया और असहमति की सुरक्षा। लेकिन जब सत्ता के आलोचक यह महसूस करने लगें कि संस्थाएं धीरे-धीरे सत्ता के प्रभाव में आ रही हैं, तब चिंता पैदा होना स्वाभाविक है। सबसे बड़ी विडंबना यह है कि साहित्य जैसी स्वतंत्र और आलोचनात्मक परंपरा भी अब राजनीतिक संघर्ष का मैदान बनती जा रही है। साहित्य का काम सत्ता के लिए तालियां बजाना नहीं, बल्कि सत्ता से सवाल पूछना है।
लेकिन यदि साहित्यिक पुरस्कारों तक को राजनीतिक पहचान का माध्यम बना दिया जाए, तो यह संस्कृति के लोकतंत्रीकरण नहीं बल्कि उसके वैचारिक केंद्रीकरण की दिशा में कदम माना जाएगा। भारत का लोकतंत्र अभी भी जीवित है, उसके संवैधानिक ढांचे और लोकतांत्रिक संस्थाएं काम कर रही हैं। लेकिन लोकतंत्र की असली ताकत केवल संविधान की किताब में नहीं, बल्कि जनता के विश्वास में होती है। और जब लोगों का एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगे कि संस्थाएं निष्पक्ष नहीं रहीं, तब लोकतंत्र के भविष्य को लेकर चिंता बढ़ना स्वाभाविक है।
यही वजह है कि आज यह सवाल पहले से ज्यादा महत्वपूर्ण हो गया है कि क्या हम एक ऐसे भारत की ओर बढ़ रहे हैं जहां संस्थाएं विचारधारा से ऊपर होंगी, या फिर एक ऐसे भारत की ओर जहां हर संस्था को सत्ता के रंग में रंग दिया जाएगा? फैसला इतिहास करेगा, लेकिन सवाल पूछना आज भी लोकतंत्र का सबसे बड़ा अधिकार है।
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