नीट-यूजी 2026 की दोबारा परीक्षा का दिन देश के लाखों छात्रों के लिए राहत का नहीं, बल्कि एक और मानसिक परीक्षा का दिन बन गया। कहीं भोपाल में सड़क हादसे के कारण कुछ मिनट देर से पहुंचे छात्रों को परीक्षा केंद्र के बाहर ही रोक दिया गया, तो कहीं अजमेर में एक छात्रा के बुर्का पहनने को लेकर विवाद खड़ा हो गया। बेंगलुरु और दिल्ली समेत कई शहरों से ऐसे दृश्य सामने आए, जहां छात्र-छात्राएं सेंटर के बाहर रोते, गिड़गिड़ाते और हाथ जोड़कर अंदर जाने की गुहार लगाते रहे, लेकिन नियमों की दीवार उनके भविष्य से भी ऊंची साबित हुई। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इन बच्चों का कसूर क्या था?
पेपर लीक सरकार की नाकामी थी, उसकी भरपाई छात्रों से क्यों? नीट की दोबारा परीक्षा इसलिए कराई गई क्योंकि पहले हुई परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठे और पेपर लीक की घटनाओं ने पूरे सिस्टम को कठघरे में खड़ा कर दिया। यह किसी छात्र की गलती नहीं थी, न किसी परीक्षा केंद्र पर बैठकर किसी ने नकल की थी। पेपर तो परीक्षा शुरू होने से पहले ही लीक हुआ था।
यानी पूरी समस्या परीक्षा प्रणाली और उसकी सुरक्षा में थी, न कि परीक्षा केंद्रों पर बैठे छात्रों में। लेकिन सरकार ने अपनी इस नाकामी को छिपाने और यह दिखाने के लिए कि अब व्यवस्था पूरी तरह “कड़ी” कर दी गई है, ऐसे नियम लागू किए जिनका पेपर लीक से कोई सीधा संबंध ही नहीं था।
सोचिए, अगर प्रश्नपत्र किसी केंद्र पर बैठकर चोरी हुआ होता, अगर किसी छात्र ने अंदर बैठकर नकल की होती, तब इतनी सख्ती का कोई औचित्य समझ में आता। लेकिन जब पेपर ऊपर के स्तर से लीक हुआ, तब सेंटर के गेट पर पांच-दस मिनट देर से पहुंचे छात्र को रोकने से कौन-सी सुरक्षा मजबूत हो गई? इससे पेपर लीक कैसे रुक गया? असलियत यह है कि पेपर लीक रोकने के बजाय पूरी ताकत छात्रों पर दिखाई गई।
कुछ मिनट की देरी क्या पूरे साल की मेहनत से बड़ी हो गई?
किसी भी परीक्षा में समय पर पहुंचना जरूरी है। इसमें दो राय नहीं हो सकती। लेकिन जीवन हमेशा घड़ी की सुइयों के हिसाब से नहीं चलता। कहीं सड़क दुर्घटना हो जाती है, कहीं एम्बुलेंस रास्ता रोक देती है, कहीं ट्रैफिक जाम लग जाता है, कहीं सार्वजनिक परिवहन जवाब दे देता है। ऐसे हालात किसी की योजना का हिस्सा नहीं होते।
भोपाल में जिस छात्र को इसलिए रोक दिया गया क्योंकि रास्ते में दुर्घटना हो गई थी और उसे प्राथमिक उपचार दिलाना पड़ा, क्या उसने जानबूझकर देर की थी? अगर वह घायल अवस्था में भी किसी तरह परीक्षा केंद्र तक पहुंचा, तो क्या उसकी यह कोशिश इस बात का सबूत नहीं थी कि वह परीक्षा देना चाहता था? ऐसे मामलों में क्या मानवीय संवेदना की कोई जगह नहीं होनी चाहिए?
नियम व्यवस्था के लिए होते हैं, अन्याय के लिए नहीं
सरकार और परीक्षा एजेंसियां अक्सर यह तर्क देती हैं कि एक बार परीक्षा शुरू होने के बाद किसी को प्रवेश नहीं दिया जा सकता क्योंकि इससे गोपनीयता प्रभावित हो सकती है। लेकिन इसका समाधान मौजूद है। अगर कोई छात्र पांच या दस मिनट देर से पहुंचता है, तो उसे अतिरिक्त समय मत दीजिए। उसके उत्तर लिखने का समय उतना ही रहने दीजिए जितना बाकी छात्रों का है। अगर आवश्यकता हो तो उसे अलग कमरे में बैठाकर परीक्षा कराइए। लेकिन उसे पूरे तीन घंटे की परीक्षा से ही वंचित कर देना किस न्याय का हिस्सा है? नियमों का उद्देश्य व्यवस्था बनाए रखना होता है, लोगों को बर्बाद करना नहीं।
सेंटर के बाहर रोते बच्चे किसी भी सभ्य समाज के लिए शर्म की बात हैं
कल्पना कीजिए उस छात्र की जिसने पूरे एक साल तक दिन-रात मेहनत की हो। परिवार ने कोचिंग की फीस भरने के लिए कर्ज लिया हो। मां-बाप ने अपनी जरूरतें छोड़कर बच्चे के सपनों में पैसा लगाया हो। और फिर परीक्षा वाले दिन, वह सिर्फ कुछ मिनट की देरी के कारण सेंटर के बाहर खड़ा रह जाए।
अंदर से घंटी बज जाए, गेट बंद हो जाए और उसका पूरा साल उसकी आंखों के सामने बिखर जाए। उस वक्त उस बच्चे पर क्या गुजरती होगी? वह सिर्फ एक परीक्षा नहीं हारता, बल्कि उसका आत्मविश्वास टूटता है, उसका मनोबल टूटता है और कई बार वह अवसाद तक का शिकार हो जाता है। जो लोग एयर कंडीशन दफ्तरों में बैठकर नियम बनाते हैं, शायद उन्हें यह दर्द महसूस नहीं होता।
बुर्का विवाद ने भी खड़े किए गंभीर सवाल
अजमेर में एक छात्रा को उसके बुर्का पहनने को लेकर जिस तरह रोका गया, उसने भी कई सवाल खड़े किए हैं। अगर परीक्षा की आधिकारिक गाइडलाइन किसी विशेष प्रकार के पहनावे की अनुमति देती है और पहचान की जांच का भी निर्धारित तरीका मौजूद है, तो अलग-अलग केंद्रों पर अलग-अलग नियम क्यों लागू किए जा रहे हैं? सबसे बड़ी समस्या यही है कि एक ही परीक्षा के लिए हर केंद्र अपनी-अपनी व्याख्या करने लगता है। इसका खामियाजा छात्रों को भुगतना पड़ता है। देश में नियम एक होने चाहिए और उनका पालन भी एक जैसा होना चाहिए।
सख्ती का दिखावा नहीं, व्यवस्था की ईमानदारी चाहिए
हर बार जब कोई घोटाला सामने आता है, तो सरकार असली दोषियों तक पहुंचने के बजाय आम लोगों पर सख्ती बढ़ा देती है। पेपर लीक हुआ तो छात्रों की तलाशी और कड़ी कर दी गई। सिस्टम फेल हुआ तो छात्रों पर नियम और कठोर कर दिए गए। प्रशासन की नाकामी की कीमत फिर उसी छात्र ने चुकाई जिसने कोई गलती ही नहीं की। यह न्याय नहीं है।
बच्चों को अपराधी नहीं, परीक्षार्थी समझिए
नीट जैसी परीक्षा में शामिल होने वाला हर छात्र डॉक्टर बनने का सपना लेकर आता है। वह अपराधी नहीं होता कि उसके साथ अपराधियों जैसा व्यवहार किया जाए। सुरक्षा जरूरी है, लेकिन संवेदनशीलता उससे भी ज्यादा जरूरी है। अगर कोई छात्र जानबूझकर देर से आता है, तो उस पर नियम लागू कीजिए। लेकिन अगर दुर्घटना, ट्रैफिक, सार्वजनिक परिवहन की विफलता या किसी अन्य वास्तविक मजबूरी के कारण कुछ मिनट की देरी होती है, तो उसे परीक्षा देने से रोक देना केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि उसके पूरे भविष्य पर प्रहार है।
सरकार को जवाब देना होगा
सरकार पहले अपनी नाकामी के कारण लाखों छात्रों से दोबारा परीक्षा दिलवाती है। फिर उसी परीक्षा में ऐसी सख्ती लागू करती है जिसका पेपर लीक से कोई वास्तविक संबंध नहीं होता। और अंत में वही छात्र परीक्षा केंद्रों के बाहर रोते-बिलखते नजर आते हैं। यह किसी सफल परीक्षा प्रणाली की तस्वीर नहीं, बल्कि एक असंवेदनशील व्यवस्था की तस्वीर है।
अगर नियम किसी मेहनती छात्र के सपनों को कुचलने लगें, अगर दुर्घटना का शिकार बच्चा भी परीक्षा देने के अधिकार से वंचित कर दिया जाए, अगर सेंटर के बाहर रोते हुए बच्चों की आवाज़ भी प्रशासन को न सुनाई दे, तो ऐसे नियमों पर पुनर्विचार होना ही चाहिए। सुरक्षा के नाम पर कठोरता दिखाई जा सकती है, लेकिन कठोरता कभी भी न्याय का विकल्प नहीं बन सकती। पेपर लीक रोकने में नाकाम व्यवस्था अपनी कमजोरी छिपाने के लिए छात्रों को बलि का बकरा नहीं बना सकती। देश को ऐसी परीक्षा प्रणाली चाहिए जो ईमानदार भी हो, सुरक्षित भी और सबसे बढ़कर मानवीय भी। यही किसी लोकतांत्रिक और संवेदनशील समाज की पहचान है।
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