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Home»एलान विशेष

रिजिजू साहब! अगर सब कुछ ठीक है तो ये डर, ये हमले और ये बेदखली किसकी कहानी है?

adminBy adminJune 14, 2026 एलान विशेष No Comments8 Mins Read
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केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री किरेन रिजिजू ने भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न को विपक्ष का “प्रोपगैंडा” बताते हुए कहा कि कोई एक उदाहरण दिखा दिया जाए जहां किसी व्यक्ति ने अपनी धार्मिक पहचान के कारण असुरक्षित महसूस करते हुए भारत छोड़ा हो। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

लेकिन सवाल यह है कि क्या किसी लोकतंत्र में उत्पीड़न को केवल इस कसौटी पर मापा जाएगा कि कितने लोग देश छोड़कर गए? क्या अपने ही देश में डरकर जीना, अपनी पहचान छिपाना, कारोबार छोड़ना, धार्मिक कार्यक्रमों को सीमित करना और हर समय संदेह की निगाह से देखे जाने का एहसास उत्पीड़न नहीं कहलाता? रिजिजू के बयान और ज़मीनी हकीकत के बीच की दूरी को समझने के लिए पिछले एक दशक की घटनाओं पर नज़र डालना पर्याप्त है।

गोरक्षा के नाम पर हिंसा- कानून से ऊपर खड़ी भीड़

2014 के बाद देश में गोरक्षा के नाम पर हुई मॉब लिंचिंग की घटनाओं ने मुसलमानों और दलितों के बीच भय का माहौल पैदा किया। समस्या केवल हत्याएं नहीं थीं, बल्कि वह राजनीतिक और सामाजिक संरक्षण था जो कई मामलों में आरोपियों को मिलता दिखाई दिया। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो ने कभी भी “हेट क्राइम” या “गो-रक्षक हिंसा” की अलग श्रेणी नहीं बनाई, लेकिन स्वतंत्र अध्ययनों और दस्तावेज़ीकरण में दर्जनों घटनाएं सामने आईं।

इन घटनाओं का असर केवल पीड़ित परिवारों तक सीमित नहीं रहा। पशु व्यापार, चमड़ा उद्योग और पशु परिवहन से जुड़े हजारों मुस्लिम परिवारों की आजीविका प्रभावित हुई। कई इलाकों में लोगों ने कानूनी कारोबार तक छोड़ दिया क्योंकि उन्हें कानून से अधिक भीड़ का डर सताने लगा था।

नफरत की राजनीति का सामान्यीकरण

भारत में नफरती भाषण अब अपवाद नहीं बल्कि एक राजनीतिक उपकरण बनते जा रहे हैं। स्वतंत्र शोध संस्थाओं द्वारा दर्ज सैकड़ों घटनाएं बताती हैं कि मुसलमानों,दलितों,पिछड़ों आदिवासियों और ईसाइयों के खिलाफ सार्वजनिक मंचों से बहिष्कार, आर्थिक प्रतिबंध, सामाजिक अलगाव और हिंसा की भाषा का इस्तेमाल बढ़ा है। सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि ऐसे भाषण देने वालों में कई बार निर्वाचित प्रतिनिधि, विधायक, सांसद और सत्ताधारी दलों के नेता भी शामिल पाए गए। जब सत्ता से जुड़े लोगों के खिलाफ कार्रवाई नहीं होती, तब संदेश यह जाता है कि नफरत की राजनीति स्वीकार्य है।

बुलडोज़र-अदालत से पहले सज़ा

उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र और अन्य राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में बुलडोज़र प्रशासन की पहचान बन गया है। किसी सांप्रदायिक घटना, विरोध प्रदर्शन या आपराधिक आरोप के बाद बिना मुकदमे और बिना दोष सिद्ध हुए घरों को गिरा देना कानून के शासन की अवधारणा पर सवाल खड़े करता है। एमनेस्टी इंटरनेशनल द्वारा दर्ज मामलों में बड़ी संख्या मुसलमानों की थी।

सुप्रीम कोर्ट को हस्तक्षेप कर यह कहना पड़ा कि राज्य किसी को दंडित करने के लिए बुलडोज़र का इस्तेमाल नहीं कर सकता, लेकिन इसके बावजूद ऐसी घटनाएं पूरी तरह नहीं रुकीं। महाराष्ट्र के छत्रपति संभाजीनगर (औरंगाबाद) से लेकर उत्तर प्रदेश के कई शहरों तक बुलडोज़र कार्रवाई ने एक ऐसा संदेश दिया कि कानून की प्रक्रिया से पहले ही दंड दिया जा सकता है, और इसके सबसे बड़े शिकार अक्सर अल्पसंख्यक समुदाय के लोग बनते हैं।

धर्मांतरण विरोधी कानून-सुरक्षा या उत्पीड़न का औज़ार?

एक दर्जन से अधिक राज्यों में लागू धर्मांतरण विरोधी कानूनों को जबरन धर्म परिवर्तन रोकने के नाम पर पेश किया गया। लेकिन ईसाई संगठनों और मानवाधिकार समूहों का आरोप है कि इनका इस्तेमाल चर्चों, प्रार्थना सभाओं और पादरियों को निशाना बनाने के लिए किया जा रहा है। सैकड़ों ईसाइयों की गिरफ्तारी और अनेक मामलों में अदालतों द्वारा पुलिस कार्रवाई पर सवाल उठाना इस बहस को और गंभीर बनाता है। उत्तर प्रदेश में कई मामलों को सुप्रीम कोर्ट ने कानूनी रूप से त्रुटिपूर्ण मानते हुए खारिज किया। इसी तरह “लव जिहाद” की राजनीति ने अंतरधार्मिक विवाहों को भी संदेह के घेरे में ला दिया। संविधान द्वारा प्रदत्त व्यक्तिगत स्वतंत्रता और धार्मिक स्वतंत्रता पर इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ा है।

“बांग्लादेशी” का राजनीतिक लेबल

पिछले कुछ वर्षों में “अवैध बांग्लादेशी” शब्द भारतीय राजनीति का सबसे शक्तिशाली चुनावी हथियार बन गया है। समस्या यह है कि इसका प्रभाव केवल चुनावी भाषणों तक सीमित नहीं रहता। देश के विभिन्न हिस्सों में बंगाली भाषी मुसलमानों को संदेह की निगाह से देखा गया, उन्हें हिरासत में लिया गया, रोजगार से वंचित किया गया और कई बार अपने घर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा। असम का एनआरसी हो या विभिन्न राज्यों में चलाए गए सत्यापन अभियान, नागरिकता का सवाल एक पूरे समुदाय के लिए भय का कारण बन गया।

एसआइआर-मताधिकार पर नया संकट

बिहार और पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) को भाजपा ने अवैध मतदाताओं की पहचान का अभियान बताया, जबकि विपक्ष ने इसे “पिछले दरवाज़े से एनआरसी” कहा। लोकतंत्र में वोट केवल एक अधिकार नहीं बल्कि नागरिकता की सबसे महत्वपूर्ण अभिव्यक्ति है। ऐसे में लाखों लोगों का मतदाता सूची से बाहर होना स्वाभाविक रूप से चिंता पैदा करता है। आलोचकों का कहना है कि इसका सबसे अधिक असर गरीबों, प्रवासी मजदूरों, दलितों और मुसलमानों पर पड़ा।

संसद और सत्ता से गायब होती आवाज़ें

मोदी सरकार की तीसरी कैबिनेट में एक भी मुस्लिम मंत्री नहीं है। लोकसभा में मुस्लिम प्रतिनिधित्व स्वतंत्र भारत के इतिहास के सबसे निचले स्तरों में पहुंच चुका है। करीब 20 करोड़ आबादी वाले समुदाय का संसद में लगभग 4 प्रतिशत प्रतिनिधित्व केवल एक सांख्यिकीय तथ्य नहीं है, बल्कि यह उस राजनीतिक दूरी का संकेत भी है जो समय के साथ बढ़ती दिखाई दे रही है।

ईसाई समुदाय की पीड़ा-क्या यह भी “प्रोपगैंडा” है?

अगर किरेन रिजिजू का दावा सही है कि भारत में अल्पसंख्यकों के उत्पीड़न की बातें केवल “प्रोपगैंडा” हैं, तो फिर 1 जून 2026 को नई दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में आयोजित “पीपुल्स ट्रिब्यूनल ऑन वायलेंस अगेंस्ट क्रिश्चियंस” में देश के अलग-अलग राज्यों से आए पीड़ितों की गवाहियों को क्या कहा जाएगा? कारवां-ए-मोहब्बत और जागरूक नागरिकों के समूह द्वारा आयोजित इस जन-सुनवाई में उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, गुजरात और ओडिशा से आए लोगों ने प्रार्थना सभाओं पर हमले, पादरियों की गिरफ्तारी, पूजा स्थलों को बंद कराने, सामाजिक और आर्थिक बहिष्कार, गांवों से निष्कासन, जबरन विस्थापन और यहां तक कि मृतकों को दफनाने के अधिकार से वंचित किए जाने जैसी घटनाओं की भी जानकारी दी।

न्यायाधिकरण के सदस्यों ने अप्रैल में छत्तीसगढ़ और मई में ओडिशा के दौरे के दौरान सैकड़ों प्रभावित परिवारों से मुलाकात की। उनके अनुसार विशेष रूप से आदिवासी और दलित ईसाई समुदायों को हिंसा, सामाजिक बहिष्कार और संवैधानिक अधिकारों से वंचित किए जाने का सामना भी करना पड़ रहा है।

वरिष्ठ पत्रकार जॉन दयाल ने ग्राहम स्टेन्स और उनके दो बच्चों की हत्या, कंधमाल हिंसा और गुजरात में ईसाइयों पर हुए हमलों का उल्लेख करते हुए चेतावनी दी कि अंतरात्मा की स्वतंत्रता और समान नागरिकता की संवैधानिक गारंटियां लगातार कमजोर होती जा रही हैं। सुनवाई में यह आरोप भी सामने आया कि धर्मांतरण विरोधी कानूनों का इस्तेमाल कई बार ईसाई समुदाय को परेशान करने के लिए किया जा रहा है। प्रार्थना सभाओं को बाधित करना, झूठे आरोपों में गिरफ्तारियां और धार्मिक गतिविधियों को संदेह की नजर से देखना अब कई इलाकों में सामान्य बात बनती जा रही है।

सबसे दर्दनाक गवाहियों में उन परिवारों की कहानियां थीं जिन्हें अपने मृत परिजनों को दफनाने तक की अनुमति नहीं दी गई। सामाजिक बहिष्कार, सार्वजनिक संसाधनों तक पहुंच रोकना और गांव छोड़ने के लिए मजबूर करना ऐसी घटनाएं हैं जो किसी भी लोकतांत्रिक समाज के लिए गंभीर चिंता का विषय होनी चाहिए।

अगर मुसलमानों के खिलाफ मॉब लिंचिंग, बुलडोजर कार्रवाई और नागरिकता संबंधी संदेहों को एक तरफ रख भी दिया जाए, तो ईसाई समुदाय के बारे में सामने आ रही ये गवाहियां बताती हैं कि भारत में धार्मिक अल्पसंख्यकों की सुरक्षा और समान अधिकारों का सवाल केवल राजनीतिक बहस नहीं बल्कि एक वास्तविक सामाजिक और संवैधानिक चुनौती बन चुका है।

असली सवाल

रिजिजू साहब का सवाल था कि कौन अपनी धार्मिक पहचान की वजह से भारत छोड़कर गया? लेकिन शायद इससे बड़ा सवाल यह है कि कितने लोग अपनी पहचान की वजह से चुप हो गए, कितनों ने अपना कारोबार बदल लिया, कितनों ने अपने बच्चों को धार्मिक पहचान छिपाने की सलाह दी, कितनों ने भीड़ के डर से अपने अधिकारों का इस्तेमाल करना छोड़ दिया और कितने लोग हर दिन यह महसूस करते हैं कि संविधान में लिखी समानता और ज़मीनी हकीकत के बीच की दूरी बढ़ती जा रही है।

लोकतंत्र में समस्या का समाधान उसे “प्रोपगैंडा” कह देने से नहीं होता। समाधान तब शुरू होता है जब सत्ता यह स्वीकार करे कि समस्या मौजूद है। क्योंकि किसी भी राष्ट्र की महानता बहुसंख्यकों की ताकत से नहीं, बल्कि अल्पसंख्यकों के विश्वास और सुरक्षा से मापी जाती है।

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