लोकतंत्र में पुलिस की वर्दी किसी सरकार की नहीं, संविधान की होती है। पुलिस अधिकारी किसी मुख्यमंत्री, मंत्री या राजनीतिक दल के सेवक नहीं बल्कि कानून के रक्षक होते हैं। लेकिन जब एक संवैधानिक अदालत को यह कहना पड़े कि “अधिकारियों की वफ़ादारी संविधान के प्रति नहीं, बल्कि सत्ताधारी सरकार के प्रति नज़र आ रही है”, तो यह केवल उत्तर प्रदेश पुलिस पर टिप्पणी नहीं रह जाती, बल्कि भारतीय लोकतंत्र की संस्थाओं के सामने खड़े एक गंभीर संकट की ओर संकेत बन जाती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इलाहाबाद हाईकोर्ट की यह टिप्पणी किसी राजनीतिक भाषण, विपक्षी आरोप या मानवाधिकार संगठन की रिपोर्ट का हिस्सा नहीं है। यह देश की एक संवैधानिक अदालत की वह चिंता है जो एक ऐसे मामले की सुनवाई के दौरान सामने आई, जिसमें गाजियाबाद के एक परिवार पर उत्तर प्रदेश गैंगस्टर एक्ट जैसा कठोर कानून लगा दिया गया था।
अदालत ने पाया कि मामला मूल रूप से दीवानी प्रकृति का था, लेकिन पुलिस ने उसे संगठित अपराध का रूप देकर गैंगस्टर एक्ट के तहत कार्रवाई की। यह मामला केवल एक परिवार के साथ हुए अन्याय का नहीं है। यह उस सोच का उदाहरण है जिसमें कानून को न्याय का साधन नहीं बल्कि सत्ता के औजार के रूप में इस्तेमाल किया जाने लगा है। ईडी और सीबीआई का भी यही मामला है।
कानून का राज या सत्ता का राज?
हाईकोर्ट ने जिस “सामंती मानसिकता” का उल्लेख किया है, वह भारत की प्रशासनिक व्यवस्था के सबसे पुराने रोगों में से एक है। अंग्रेजों के समय पुलिस का उद्देश्य जनता की सुरक्षा नहीं बल्कि सत्ता की रक्षा था। स्वतंत्रता के 75 वर्ष बाद भी यदि पुलिस व्यवस्था उसी मानसिकता से संचालित हो रही है तो यह बेहद चिंताजनक है। अदालत ने साफ कहा कि अधिकारियों के तबादले, पोस्टिंग और प्रमोशन अक्सर योग्यता के आधार पर नहीं बल्कि राजनीतिक वफादारी के आधार पर तय होते हैं।
जो अधिकारी सत्ता के प्रति निष्ठा दिखाते हैं उन्हें मलाईदार पद मिलते हैं, जबकि स्वतंत्र सोच रखने वाले अधिकारियों को हाशिए पर धकेल दिया जाता है। ऐसी व्यवस्था में कानून का शासन कमजोर और राजनीतिक संरक्षण मजबूत होता जाता है। गैंगस्टर एक्ट अपराधियों के खिलाफ हथियार या विरोधियों पर दबाव का साधन?:- उत्तर प्रदेश में गैंगस्टर एक्ट का इस्तेमाल लंबे समय से विवादों में रहा है। मूल रूप से यह कानून संगठित अपराध और माफिया नेटवर्क पर कार्रवाई के लिए बनाया गया था।
लेकिन अदालत की टिप्पणी बताती है कि कई मामलों में इसका इस्तेमाल ऐसे लोगों के खिलाफ भी किया जा रहा है जिन पर संगठित अपराध का कोई ठोस आरोप नहीं होता। जब किसी व्यक्ति को बिना पर्याप्त साक्ष्य के गैंगस्टर घोषित कर दिया जाता है, उसकी संपत्ति जब्त हो जाती है, प्रतिष्ठा नष्ट हो जाती है और महीनों जेल में रहना पड़ता है, तब बाद में अदालत द्वारा मामला रद्द कर देने से भी उसका नुकसान पूरी तरह पूरा नहीं हो सकता। यही कारण है कि कानून के दुरुपयोग को अदालत ने गंभीर चिंता का विषय माना।
“एनकाउंटर न्याय” और चुनिंदा कार्रवाई
हाईकोर्ट ने अपनी टिप्पणी में एनकाउंटर हत्याओं, चुनिंदा कार्रवाई और गैंगस्टर एक्ट के इस्तेमाल का भी उल्लेख किया। यह महत्वपूर्ण है क्योंकि पिछले कुछ वर्षों में उत्तर प्रदेश में “बुलडोजर न्याय” और “एनकाउंटर मॉडल” को राजनीतिक उपलब्धि के रूप में प्रचारित किया गया है। लेकिन किसी भी लोकतंत्र में अपराधी को सजा देने का अधिकार अदालत का होता है, पुलिस का नहीं। यदि पुलिस जांचकर्ता, अभियोजक और न्यायाधीश तीनों की भूमिका निभाने लगे तो संविधान में निहित न्यायिक प्रक्रिया का महत्व समाप्त हो जाएगा। यही कारण है कि अदालत बार-बार “ड्यू प्रोसेस ऑफ लॉ” यानी कानून द्वारा निर्धारित प्रक्रिया के पालन पर जोर देती है।
गिरफ्तारी पहले, सबूत बाद में?
जस्टिस विनोद दिवाकर की टिप्पणी का सबसे चिंताजनक हिस्सा वह है जिसमें उन्होंने कहा कि बिना उचित प्रक्रिया के गिरफ्तारियां की जाती हैं, गलत इरादों से एफआईआर दर्ज या दबा दी जाती हैं और कानूनी सुरक्षा उपायों की अनदेखी की जाती है। यदि यह स्थिति सच है तो समस्या केवल कुछ भ्रष्ट अधिकारियों की नहीं बल्कि पूरी संस्थागत संस्कृति की है। कानून का शासन इस सिद्धांत पर आधारित है कि सौ अपराधी बच जाएं, लेकिन एक निर्दोष को सजा नहीं मिलनी चाहिए। लेकिन यदि गिरफ्तारी ही सजा बन जाए तो न्याय की पूरी अवधारणा उलट जाती है।
विकास दुबे प्रकरण और जवाबदेही का सवाल
अदालत ने कानपुर के बिकरू कांड का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि इतनी बड़ी प्रशासनिक विफलता के बावजूद जिम्मेदार अधिकारियों को केवल औपचारिक चेतावनी देकर क्यों छोड़ दिया गया। आठ पुलिसकर्मियों की मौत जैसी गंभीर घटना के बाद भी यदि संस्थागत जवाबदेही तय नहीं होती तो यह संदेश जाता है कि व्यवस्था के भीतर प्रभावशाली लोगों के लिए अलग नियम हैं और आम नागरिकों के लिए अलग। यही “दंडमुक्ति की संस्कृति” लोकतांत्रिक संस्थाओं को भीतर से कमजोर करती है।
असली सवाल-पुलिस किसकी है?
इस पूरे मामले का सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यही है। क्या पुलिस संविधान की है या सरकार की? सरकारें चुनाव से आती हैं और पांच साल में बदल जाती हैं। लेकिन संविधान स्थायी है। पुलिस की शपथ किसी मुख्यमंत्री या राजनीतिक दल के प्रति नहीं बल्कि संविधान और कानून के प्रति होती है। यदि पुलिस की प्राथमिक निष्ठा सत्ता के प्रति हो जाए तो लोकतंत्र धीरे-धीरे प्रशासनिक राज्य में बदलने लगता है, जहां कानून का इस्तेमाल नागरिकों की सुरक्षा के लिए नहीं बल्कि राजनीतिक नियंत्रण के लिए किया जाता है।
अदालत की चेतावनी को गंभीरता से लेने की ज़रूरत
इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी को किसी एक सरकार या एक राज्य तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। यह पूरे देश की प्रशासनिक और पुलिस व्यवस्था के लिए चेतावनी है। लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। वह स्वतंत्र न्यायपालिका, निष्पक्ष पुलिस, जवाबदेह प्रशासन और कानून के समान अनुपालन पर टिका होता है। जब अदालत को यह कहना पड़े कि अधिकारियों की वफादारी संविधान के बजाय सत्ताधारियों के प्रति अधिक है, तो यह केवल न्यायपालिका की टिप्पणी नहीं बल्कि लोकतंत्र के लिए बजाई गई खतरे की घंटी है। सवाल यह नहीं है कि अदालत ने क्या कहा। सवाल यह है कि क्या शासन व्यवस्था इस चेतावनी को सुनेगी भी, या फिर इसे भी बाकी आलोचनाओं की तरह नजरअंदाज कर दिया जाएगा।
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