न्यूज़ ब्रॉडकास्टिंग एंड डिजिटल स्टैंडर्ड्स अथॉरिटी (एनबीडीएसए) द्वारा आज तक के एक कार्यक्रम को लेकर की गई टिप्पणी सिर्फ़ एक टीवी शो की आलोचना नहीं है, बल्कि भारतीय मीडिया के एक बड़े संकट की ओर इशारा करती है। ताजमहल को कथित तौर पर मंदिर बताए जाने वाले दावों को बिना पर्याप्त तथ्यात्मक संतुलन के प्रसारित करने पर मीडिया नियामक संस्था ने साफ़ कहा है कि कार्यक्रम निष्पक्षता और तटस्थता के मानकों पर खरा नहीं उतरा। सवाल यह है कि क्या यह सिर्फ़ एक गलती थी, या फिर पिछले एक दशक में टीवी न्यूज़ का एक स्थापित पैटर्न बन चुका है? एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
टीआरपी का हथियार
पिछले कुछ वर्षों में देश के कई बड़े टीवी चैनलों ने इतिहास, धर्म और पहचान से जुड़े विवादों को अपने प्राइम टाइम का प्रमुख विषय बना दिया है। ज्ञानवापी मस्जिद, मथुरा की शाही ईदगाह, संभल की जामा मस्जिद, भोजशाला, अजमेर दरगाह, ताजमहल और अब दारुल उलूम देवबंद जैसे संस्थानों को भी विवादों में घसीटने की कोशिशें सामने आई हैं।
हाल के वर्षों में कुछ संगठनों और व्यक्तियों द्वारा यह दावा भी किया गया कि दारुल उलूम देवबंद की ज़मीन पर कभी कोई मंदिर था। हालांकि ऐसे दावों के समर्थन में अब तक कोई निर्णायक ऐतिहासिक या पुरातात्विक प्रमाण सार्वजनिक रूप से स्थापित नहीं हो सके हैं, फिर भी इन दावों को कई टीवी बहसों और सोशल मीडिया अभियानों में प्रमुखता से जगह दी गई। सवाल यह है कि जब किसी दावे के समर्थन में ठोस सबूत नहीं हैं, तब उसे बार-बार राष्ट्रीय बहस का विषय क्यों बनाया जाता है?
अदालतों से पहले टीवी स्टूडियो में मुकदमे
भारतीय लोकतंत्र में किसी ऐतिहासिक या धार्मिक विवाद का फैसला अदालतों और साक्ष्यों के आधार पर होना चाहिए। लेकिन हाल के वर्षों में टीवी स्टूडियो ही अदालत बनते दिखाई दिए हैं। एंकर कभी अभियोजक की भूमिका में दिखते हैं, कभी जज की और कभी फैसले सुनाने वाले की। कई मामलों में अदालतों में याचिका दाखिल होने से पहले ही टीवी चैनलों पर “इतिहास का सबसे बड़ा खुलासा”, “मंदिर के ऊपर बनी मस्जिद?” या “सदियों का सच सामने आया” जैसे कार्यक्रम चलने लगते हैं। इससे जनमत प्रभावित होता है और समाज में अविश्वास तथा ध्रुवीकरण बढ़ता है।
एक पैटर्न जो लगातार दिखाई दे रहा है
ताजमहल के नीचे मंदिर, ज्ञानवापी के नीचे मंदिर, शाही ईदगाह के नीचे मंदिर, अजमेर दरगाह के नीचे मंदिर, संभल की जामा मस्जिद के नीचे मंदिर और अब दारुल उलूम देवबंद की ज़मीन से जुड़े दावे—इन सभी विवादों में एक समानता दिखाई देती है।
हर बार मुस्लिम पहचान से जुड़े किसी ऐतिहासिक स्थल या संस्थान को विवाद के केंद्र में लाया जाता है और फिर महीनों तक टीवी बहसों में उसे जीवित रखा जाता है। यदि हर ऐतिहासिक इमारत, मस्जिद, दरगाह या मुस्लिम शैक्षणिक संस्थान के नीचे मंदिर खोजने की राजनीति शुरू हो जाए, तो यह देश को इतिहास के अंतहीन संघर्षों में धकेल देगा। संविधान और कानून का उद्देश्य अतीत की लड़ाइयों को वर्तमान में दोहराना नहीं, बल्कि वर्तमान और भविष्य को सुरक्षित बनाना है।
मुस्लिम पहचान को विवाद के केंद्र में रखने की प्रवृत्ति
आलोचकों का कहना है कि मुख्यधारा के कुछ टीवी चैनलों ने लगभग हर बड़े धार्मिक विवाद को मुस्लिम समुदाय से जोड़कर प्रस्तुत किया है। “मुगलों ने मंदिर तोड़े”, “मस्जिद के नीचे मंदिर”, “हिंदू विरासत पर कब्ज़ा” जैसी बहसें लगातार दिखाई जाती हैं, जबकि बेरोज़गारी, महंगाई, शिक्षा, स्वास्थ्य, किसानों की समस्याएं और आर्थिक असमानता जैसे मुद्दे अपेक्षाकृत कम जगह पाते हैं।
इस तरह की रिपोर्टिंग से यह धारणा मजबूत होती है कि देश की अधिकांश समस्याओं की जड़ किसी एक समुदाय या ऐतिहासिक काल में छिपी हुई है। इससे लोकतांत्रिक विमर्श कमजोर होता है और सामाजिक दूरी बढ़ती है।
पहले भी उठ चुके हैं सवाल
यह पहली बार नहीं है जब टीवी न्यूज़ की भूमिका पर सवाल उठे हैं। कोविड महामारी के दौरान तबलीगी जमात की कवरेज को लेकर कई मीडिया संस्थानों की आलोचना हुई थी। विभिन्न अदालतों ने भी कुछ मामलों में मीडिया ट्रायल और सांप्रदायिक रंग देने वाली रिपोर्टिंग पर चिंता जताई थी। कई समाचार चैनलों के कार्यक्रमों को लेकर एनबीडीएसए और अन्य नियामक संस्थाओं के समक्ष शिकायतें दर्ज होती रही हैं। कई बार चैनलों को माफ़ी मांगनी पड़ी, वीडियो हटाने पड़े या प्रसारण में संशोधन करना पड़ा।
मीडिया का काम इतिहास बदलना नहीं, तथ्य बताना है। पत्रकारिता का मूल उद्देश्य सत्ता से सवाल पूछना, तथ्यों की जांच करना और जनता को संतुलित जानकारी देना है। लेकिन जब मीडिया स्वयं किसी वैचारिक अभियान का हिस्सा दिखाई देने लगे, तब उसकी विश्वसनीयता प्रभावित होती है। ताजमहल पर एनबीडीएसए का फैसला इसी बात की याद दिलाता है कि किसी भी दावे को प्रसारित करने से पहले उसके समर्थन और विरोध दोनों पक्षों के तथ्य दर्शाना मीडिया की जिम्मेदारी है।
यदि आधिकारिक रिकॉर्ड किसी दावे का खंडन करते हैं, तो उन्हें छिपाकर केवल सनसनीखेज दावे दिखाना पत्रकारिता नहीं, बल्कि चाटुकारी और जनमत को प्रभावित करने का प्रयास माना जाएगा। देश का सामाजिक माहौल केवल राजनीतिक दलों की बयानबाज़ी से नहीं बनता, बल्कि मीडिया भी उसे आकार देता है। जब समाचार चैनल लगातार धार्मिक ध्रुवीकरण वाले विषयों को प्रमुखता देते हैं और तथ्यात्मक संतुलन की अनदेखी करते हैं, तो उसका असर समाज में अविश्वास, तनाव और सांप्रदायिक विभाजन के रूप में दिखाई देता है।
ताजमहल से लेकर दारुल उलूम देवबंद तक फैले विवाद यह सवाल खड़ा करते हैं कि क्या मीडिया का उद्देश्य इतिहास की निष्पक्ष पड़ताल है, या फिर ऐसे मुद्दों को बार-बार उछालकर दर्शकों की भावनाओं को भड़काना? एनबीडीएसए का आदेश इस बात की याद दिलाता है कि पत्रकारिता की असली ताकत तथ्यों, निष्पक्षता और जवाबदेही में है, न कि सनसनी और ध्रुवीकरण में।
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