भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलकर “मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय” करने का प्रस्ताव केवल एक प्रशासनिक निर्णय नहीं है। यह उस बड़े सवाल से जुड़ा हुआ है कि भारत अपने इतिहास को किस तरह याद रखना चाहता है और किन लोगों को अपनी सामूहिक स्मृति में जगह देना चाहता है। किसी विश्वविद्यालय का नाम केवल एक बोर्ड पर लिखा हुआ शब्द नहीं होता। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
वह इतिहास, विचार, संघर्ष और उन व्यक्तित्वों की विरासत का प्रतीक होता है जिनके नाम पर संस्थान खड़े किए जाते हैं। इसलिए जब किसी स्वतंत्रता सेनानी के नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलने की प्रक्रिया शुरू होती है तो सवाल केवल नाम का नहीं, बल्कि स्मृति और पहचान का बन जाता है। भोपाल में उठे विवाद का केंद्र भी यही है। राजा भोज बनाम मौलाना बरकतउल्लाह नहीं, बल्कि इतिहास की दो विरासतों का सवाल है। इस पूरे विवाद को कुछ लोग जानबूझकर राजा भोज और मौलाना बरकतउल्लाह के बीच टकराव के रूप में पेश करने की कोशिश कर रहे हैं। जबकि वास्तविकता यह है कि दोनों ही भारतीय इतिहास के महत्वपूर्ण लेकिन अलग -अलग व्यक्तित्व हैं।
राजा भोज भारतीय इतिहास के महानतम शासकों में गिने जाते हैं। जिनका संबंध इतिहास से है लेकिन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन से नहीं क्योंकि राजा भोज 11वीं सदी (लगभग 1010–1055 ई.) में मध्य भारत के मालवा क्षेत्र में शासन करने वाले परमार राजवंश के एक महान और प्रतापी राजा थे। वे एक दूरदर्शी शासक, अद्वितीय योद्धा और कला, साहित्य व विज्ञान के महान संरक्षक थे। साहित्य, संस्कृति, शिक्षा और स्थापत्य कला में उनका योगदान असाधारण है। उनके सम्मान में बड़े से बड़ा संस्थान बनाया जाए, इस पर शायद ही किसी को आपत्ति हो।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या राजा भोज को सम्मान देने का एकमात्र तरीका मौलाना बरकतउल्लाह का नाम हटाना है? क्या इतिहास में नए नाम जोड़ने के लिए पुराने नाम मिटाना आवश्यक है? यही वह प्रश्न है जिसका उत्तर सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन अब तक नहीं दे पाए हैं।
आखिर कौन थे मौलाना बरकतउल्लाह?
आज की पीढ़ी का बड़ा हिस्सा शायद उनके बारे में बहुत कम जानता हो, लेकिन मौलाना मोहम्मद बरकतउल्लाह भोपाली भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के उन महान क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने अंग्रेजी साम्राज्यवाद के खिलाफ वैश्विक स्तर पर लड़ाई लड़ी। 1915 में अफगानिस्तान में बनी भारत की पहली निर्वासित सरकार में वे प्रधानमंत्री थे, जबकि राजा महेंद्र प्रताप राष्ट्रपति थे।
आज राजा महेंद्र प्रताप के नाम पर विश्वविद्यालय स्थापित किए जा रहे हैं। यह स्वागत योग्य है। लेकिन उसी निर्वासित सरकार के प्रधानमंत्री रहे बरकतउल्लाह के नाम पर पहले से मौजूद विश्वविद्यालय का नाम बदलने की कोशिश स्वाभाविक रूप से सवाल खड़े करती है। क्या इतिहास के कुछ नायकों को सम्मान मिलेगा और कुछ को केवल इसलिए भुला दिया जाएगा क्योंकि उनका नाम किसी विशेष धर्म से जुड़ा है?
दुनिया भर में घूमकर आज़ादी की लड़ाई लड़ने वाला भारतीय
बरकतउल्लाह उन गिने-चुने भारतीय क्रांतिकारियों में थे जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई को अंतरराष्ट्रीय स्वरूप दिया। जापान, जर्मनी, तुर्की, रूस, अमेरिका और अफगानिस्तान तक उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ समर्थन जुटाया। वे गदर आंदोलन से जुड़े रहे। रेशमी रुमाल आंदोलन में सक्रिय भूमिका निभाई। उन्होंने ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ विश्व जनमत तैयार करने का प्रयास किया। जब भारत में अधिकांश नेता अंग्रेजों से राजनीतिक अधिकारों की मांग कर रहे थे, तब बरकतउल्लाह दुनिया भर में घूमकर पूर्ण स्वतंत्रता की लड़ाई लड़ रहे थे।
उनकी राजनीतिक सक्रियता का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि ब्रिटिश खुफिया एजेंसियां लगातार उनकी निगरानी करती थीं। लेकिन आज उनके नाम पर स्थापित विश्वविद्यालय का नाम बदलने की तैयारी हो रही है।
नाम बदलने की राजनीति संयोग या पैटर्न?
समर्थकों का कहना है कि यह केवल सांस्कृतिक पहचान का प्रश्न है। लेकिन आलोचक पूछ रहे हैं कि आखिर नाम बदलने की यह प्रक्रिया बार-बार उन्हीं नामों तक क्यों पहुंचती है जो मुस्लिम शासकों, मुस्लिम ऐतिहासिक व्यक्तित्वों या मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों से जुड़े हैं? होशंगाबाद नर्मदापुरम बन गया। हबीबगंज स्टेशन रानी कमलापति स्टेशन बन गया। इस्लामनगर जगदीशपुर बन गया। औरंगाबाद संभाजीनगर बन गया। उस्मानाबाद धाराशिव बन गया। अहमदनगर अहिल्यानगर बन गया और अब बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का नाम बदलने की तैयारी है। प्रश्न यह नहीं कि नए नाम गलत हैं। प्रश्न यह है कि क्या भारत का इतिहास केवल एक दिशा में संशोधित किया जा रहा है? क्या इतिहास का पुनर्लेखन समावेशी है या चयनात्मक?
भोपाल के बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय का विवाद कोई अकेला मामला नहीं है। हाल के वर्षों में देश के अलग-अलग हिस्सों में स्थानों, संस्थानों और ऐतिहासिक पहचान से जुड़े नामों को बदलने की मांग लगातार बढ़ी है। राजस्थान के झुंझुनूं जिले का इस्लामपुर गांव इसका ताजा उदाहरण है। भाजपा विधायक राजेंद्र भांबू ने इस्लामपुर का नाम बदलकर “श्रीरामपुर” करने की सिफारिश की है। लेकिन दिलचस्प बात यह है कि इस प्रस्ताव का सबसे तीखा विरोध किसी राजनीतिक दल ने नहीं बल्कि खुद गांव के लोगों ने किया है।
करीब 15 हजार आबादी वाले इस गांव के निवासियों का कहना है कि इस्लामपुर नाम कोई हालिया राजनीतिक पहचान नहीं बल्कि लगभग छह शताब्दियों पुरानी ऐतिहासिक विरासत का हिस्सा है। गांव के पूर्व सरपंच अमीन मनियार के अनुसार इसकी स्थापना 1451 में नवाब इस्लाम खान ने की थी और तब से लेकर आज तक राजस्व अभिलेखों, सरकारी रिकॉर्ड और स्थानीय पहचान में इसका नाम इस्लामपुर ही दर्ज है।
ग्रामीणों का सवाल सीधा है कि यदि गांव के लोगों को अपने नाम से कोई समस्या नहीं है, यदि गांव में नाम को लेकर कोई सामाजिक तनाव या विवाद नहीं है, तो फिर नाम बदलने की जरूरत क्यों महसूस हो रही है? यह सवाल केवल भावनात्मक नहीं बल्कि व्यावहारिक भी है। नाम बदलने का अर्थ है हजारों लोगों के दस्तावेज़ बदलना, सरकारी रिकॉर्ड संशोधित करना, प्रशासनिक प्रक्रियाओं पर करोड़ों रुपये खर्च करना और लोगों को अनावश्यक परेशानियों में डालना। लेकिन इससे भी बड़ा सवाल पहचान का है।
क्या किसी स्थान का नाम वहां रहने वाले लोगों की सहमति से तय होगा या राजनीतिक इच्छाओं के आधार पर? क्या किसी गांव, शहर या संस्थान का ऐतिहासिक नाम इसलिए बदल दिया जाएगा क्योंकि वह किसी मुस्लिम शासक, स्वतंत्रता सेनानी या ऐतिहासिक व्यक्तित्व से जुड़ा है? इस्लामपुर के लोग अपने गांव के नाम को केवल एक शब्द नहीं बल्कि अपनी स्थानीय स्मृति, इतिहास और सामाजिक पहचान के रूप में देखते हैं। यही वजह है कि वे इसे सांप्रदायिक मुद्दा बनाने के बजाय ऐतिहासिक विरासत के प्रश्न के रूप में देख रहे हैं।
बरकतउल्लाह विश्वविद्यालय, होशंगाबाद, हबीबगंज, इस्लामनगर और अब इस्लामपुर जैसे मामलों को एक साथ देखने पर यह बहस और गहरी हो जाती है। सवाल यह नहीं कि नए नाम अच्छे हैं या बुरे। सवाल यह है कि क्या भारत अपने इतिहास में नए अध्याय जोड़ रहा है या पुराने पन्ने फाड़ रहा है? क्योंकि किसी राष्ट्र की परिपक्वता इस बात से नहीं मापी जाती कि वह कितने नाम बदल सकता है, बल्कि इस बात से मापी जाती है कि वह अपने अतीत की विविधताओं और जटिलताओं को कितनी उदारता से स्वीकार कर सकता है।
स्वतंत्रता आंदोलन की स्मृतियों पर राजनीति
भारतीय स्वतंत्रता संग्राम किसी एक धर्म, जाति या विचारधारा की देन नहीं था। इसमें महात्मा गांधी थे, भगत सिंह थे, सुभाषचंद्र बोस थे, अशफाक उल्ला खां थे, खान अब्दुल गफ्फार खान थे, मौलाना आजाद थे, बिरसा मुंडा थे, रानी लक्ष्मीबाई थीं और मौलाना बरकतउल्लाह भी थे। यदि स्वतंत्रता आंदोलन के इतिहास को धार्मिक पहचान के चश्मे से देखा जाएगा तो आने वाली पीढ़ियों को अधूरा इतिहास मिलेगा। सबसे बड़ा खतरा यही है। जब किसी स्वतंत्रता सेनानी की स्मृति को सार्वजनिक संस्थानों से हटाया जाता है तो केवल एक नाम नहीं हटता, बल्कि उससे जुड़ी पूरी ऐतिहासिक चेतना कमजोर पड़ती है।
क्या नाम बदलने से विश्वविद्यालय बेहतर हो जाएगा?
भोपाल के विरोध प्रदर्शन करने वालों का सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है। क्या विश्वविद्यालयों की रैंकिंग सुधर जाएगी? क्या शोध बेहतर हो जाएगा? क्या छात्रों को रोजगार मिलने लगेगा? क्या शिक्षा का स्तर ऊंचा हो जाएगा? यदि इन सवालों का उत्तर “नहीं” है, तो फिर नाम परिवर्तन को इतनी प्राथमिकता क्यों दी जा रही है? देश के विश्वविद्यालय आज वित्तीय संकट, शिक्षकों की कमी, शोध के गिरते स्तर और रोजगार की चुनौतियों से जूझ रहे हैं। लेकिन इन समस्याओं पर गंभीर बहस कम और नाम बदलने पर अधिक ऊर्जा खर्च की जा रही है।
सार्वजनिक स्मृति पर किसका अधिकार?
मौलाना बरकतउल्लाह का नाम हटाने का प्रस्ताव एक बार फिर उस मूल प्रश्न को सामने लाता है कि सार्वजनिक स्मृति का निर्माण कौन करेगा? क्या इतिहास का निर्धारण राजनीतिक बहुमत करेगा? क्या हर नई सरकार अपनी वैचारिक पसंद के अनुसार स्मारकों, संस्थानों और विश्वविद्यालयों की पहचान बदलती रहेगी? या फिर राष्ट्र उन सभी लोगों को याद रखेगा जिन्होंने उसकी स्वतंत्रता, संस्कृति और विकास में योगदान दिया, चाहे उनकी धार्मिक पहचान कुछ भी रही हो?
असली चिंता नाम नहीं, संदेश है
संभव है कि सरकार इस प्रस्ताव को सांस्कृतिक पुनर्स्थापना का नाम दे। संभव है कि कानूनी प्रक्रिया पूरी होने के बाद विश्वविद्यालय का नाम भी बदल जाए। लेकिन इस पूरे विवाद की सबसे बड़ी चिंता नाम परिवर्तन नहीं है। चिंता उस संदेश की है जो समाज तक पहुंच रहा है। जब बार-बार मुस्लिम नामों से जुड़े स्थानों, संस्थानों और स्मृतियों को बदला जाता है तो एक बड़ा वर्ग यह महसूस करने लगता है कि उसके इतिहास और योगदान को सार्वजनिक जीवन से धीरे-धीरे हटाया जा रहा है। लोकतांत्रिक समाज इतिहास को मिटाकर नहीं, बल्कि उसे और व्यापक बनाकर मजबूत होते हैं।
राजा भोज को सम्मान मिलना चाहिए। लेकिन उतना ही सम्मान मौलाना बरकतउल्लाह को भी मिलना चाहिए। क्योंकि किसी राष्ट्र की महानता इस बात में नहीं होती कि वह किन नामों को याद रखता है, बल्कि इस बात में होती है कि वह किन नामों को भुलाने से इंकार करता है।
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