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Home»एलान विशेष

सिर्फ़ c करना काफ़ी नहीं: झूठे मुकदमों और सत्ता के दुरुपयोग की कीमत कौन चुकाएगा?

adminBy adminJune 22, 2026 एलान विशेष No Comments4 Mins Read
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दिल्ली हाईकोर्ट द्वारा न्यूज़क्लिक और उसके संस्थापक-संपादक प्रबीर पुरकायस्थ के खिलाफ दर्ज एफआईआर और प्रवर्तन निदेशालय की कार्रवाई को रद्द किए जाने के बाद एक बार फिर देश में न्याय, जवाबदेही और सत्ता के दुरुपयोग को लेकर बहस तेज़ हो गई है। अदालत की टिप्पणियां केवल एक समाचार पोर्टल या एक पत्रकार तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे उस बड़ी समस्या की ओर इशारा करती हैं जो पिछले कुछ वर्षों में लोकतंत्र और नागरिक अधिकारों के लिए गंभीर चुनौती बनकर उभरी है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि किसी व्यक्ति को वर्षों तक झूठे या कमजोर आरोपों के आधार पर जांच एजेंसियों, पुलिस या प्रशासनिक तंत्र द्वारा परेशान किया जाता है और अंततः अदालत उसे निर्दोष घोषित कर देती है, तो उस व्यक्ति के खोए हुए वर्षों, उसकी बदनाम हुई प्रतिष्ठा, आर्थिक नुकसान और मानसिक पीड़ा की भरपाई कौन करेगा?

हमारे देश में अक्सर यह देखने को मिलता है कि किसी व्यक्ति के खिलाफ बड़े-बड़े आरोपों के साथ छापेमारी होती है, गिरफ्तारी होती है, मीडिया ट्रायल चलता है और उसे अपराधी की तरह पेश किया जाता है। लेकिन जब वर्षों बाद अदालत में आरोप टिक नहीं पाते, तब वही मीडिया चुप हो जाता है, वही एजेंसियां खामोश हो जाती हैं और वही राजनीतिक ताकतें कोई जवाब नहीं देतीं जिन्होंने आरोपों को लेकर शोर मचाया था।

समस्या केवल न्यूज़क्लिक की नहीं है। देश में ऐसे सैकड़ों मामले हैं जिनमें पत्रकार, सामाजिक कार्यकर्ता, छात्र, विपक्षी नेता, व्यापारी और आम नागरिक लंबी कानूनी लड़ाई लड़ने के बाद निर्दोष साबित हुए हैं। लेकिन निर्दोष साबित होने के बावजूद उनकी खोई हुई नौकरी वापस नहीं आती, उनकी बर्बाद हुई साख नहीं लौटती और न ही उनके परिवार द्वारा झेली गई पीड़ा का कोई हिसाब लिया जाता है।

यही वजह है कि अब बहस केवल अदालतों द्वारा मामलों को रद्द करने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। सवाल यह भी उठना चाहिए कि जिन अधिकारियों ने बिना पर्याप्त आधार के कार्रवाई की, जिन लोगों ने दुर्भावनापूर्ण शिकायतें कीं या जिन संस्थाओं ने अपनी शक्तियों का दुरुपयोग किया, उनकी जवाबदेही कैसे तय होगी?

लोकतंत्र में किसी भी जांच एजेंसी या सरकारी संस्था को कानून से ऊपर नहीं माना जा सकता। यदि किसी अधिकारी की लापरवाही, पक्षपात या राजनीतिक दबाव के कारण किसी निर्दोष व्यक्ति की जिंदगी बर्बाद होती है तो केवल केस बंद कर देना न्याय नहीं कहलाएगा। न्याय तभी पूरा होगा जब गलत कार्रवाई करने वालों को भी उसके परिणाम भुगतने पड़ें।

दुनिया के कई लोकतांत्रिक देशों में दुर्भावनापूर्ण अभियोजन (Malicious Prosecution) और गलत कार्रवाई के मामलों में पीड़ितों को मुआवजा देने तथा जिम्मेदार अधिकारियों पर कार्रवाई करने की व्यवस्था मौजूद है। भारत में भी अब इस दिशा में गंभीर बहस की आवश्यकता है। ऐसा कानून बनाया जाना चाहिए जिसमें यह प्रावधान हो कि यदि अदालत किसी मामले को पूरी तरह निराधार, दुर्भावनापूर्ण या शक्तियों के दुरुपयोग का मामला मानती है, तो संबंधित अधिकारियों की भूमिका की स्वतंत्र जांच हो। दोषी पाए जाने पर उन्हें निलंबित किया जाए, विभागीय कार्रवाई की जाए और पीड़ित को उचित मुआवजा दिया जाए।

इस मुद्दे पर देश की तमाम विपक्षी पार्टियों को भी केवल राजनीतिक बयानबाजी तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें संसद और विधानसभाओं में ऐसे कानून की मांग करनी चाहिए जो नागरिकों को झूठे मुकदमों और सत्ता के दुरुपयोग से सुरक्षा प्रदान करे। यदि लोकतंत्र में नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करनी है तो जवाबदेही का सिद्धांत केवल जनता पर नहीं, बल्कि राज्य और उसकी संस्थाओं पर भी समान रूप से लागू होना चाहिए।

दरअसल, किसी निर्दोष व्यक्ति को जेल भेजना, उसकी आजीविका छीन लेना और वर्षों तक उसे अदालतों के चक्कर लगवाना स्वयं में एक सजा है। यदि बाद में अदालत यह कह दे कि आरोप गलत थे, तो यह केवल कानूनी राहत हो सकती है, पूर्ण न्याय नहीं। पूर्ण न्याय तब होगा जब बेगुनाह को हुए नुकसान की भरपाई हो और गलत कार्रवाई करने वालों को स्पष्ट संदेश मिले कि कानून का दुरुपयोग करने की भी एक कीमत होती है।

आज जरूरत इस बात की है कि देश में एक ऐसी व्यवस्था विकसित हो जहां न्याय केवल आरोपों को खारिज करने तक सीमित न रहे, बल्कि झूठे आरोप लगाने और सत्ता का दुरुपयोग करने वालों को भी कटघरे में खड़ा करे। क्योंकि जब तक गलत कार्रवाई करने वालों को कोई भय नहीं होगा, तब तक निर्दोष लोगों की जिंदगी बर्बाद करने का यह सिलसिला रुकने वाला नहीं है। लोकतंत्र की असली मजबूती इसी में है कि वह केवल अपराधियों को सजा न दे, बल्कि निर्दोषों को परेशान करने वालों को भी जवाबदेह बनाए।

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