नफरत बोलना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं है। यह लोकतंत्र के सीने पर हमला है। और अब सुप्रीम कोर्ट ने बेहद साफ शब्दों में बता दिया है कि हेट स्पीच कोई कानूनी ‘ग्रे एरिया’ नहीं, बल्कि एक स्पष्ट आपराधिक कृत्य है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने उस भ्रम को तोड़ दिया, जिसे वर्षों से नफरत के सौदागर फैलाते रहे हैं—कि भारत में हेट स्पीच के खिलाफ कोई ठोस कानून नहीं है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
अदालत ने स्पष्ट कहा कि भारतीय दंड संहिता और अन्य मौजूदा कानून दुश्मनी फैलाने, धार्मिक भावनाएं भड़काने और सार्वजनिक शांति भंग करने वालों से निपटने के लिए पूरी तरह सक्षम हैं। यह फैसला सिर्फ कानूनी व्याख्या नहीं, बल्कि उन तमाम लोगों के लिए करारा संदेश है जो टीवी स्टूडियो, चुनावी मंचों, धार्मिक सभाओं और सोशल मीडिया पर जहर उगलकर समाज को बांटने का कारोबार करते हैं।
“कोरोना जिहाद”, “यूपीएससी जिहाद”, “धर्म संसद”—ये केवल शब्द नहीं थे; ये सुनियोजित नफरत के हथियार थे। इन अभियानों ने न केवल एक समुदाय को निशाना बनाया, बल्कि भारत की संवैधानिक आत्मा पर भी हमला किया। अदालत ने यह भी साफ किया कि नए अपराध बनाना न्यायपालिका का काम नहीं, बल्कि संसद का अधिकार है। लेकिन यह टिप्पणी उतनी ही महत्वपूर्ण है कि समस्या कानून की कमी नहीं, बल्कि उसके कमजोर क्रियान्वयन की है।
यही इस देश की सबसे बड़ी विडंबना है कि कानून किताबों में सख्त है, लेकिन सत्ता के गलियारों में अक्सर नरम पड़ जाता है। जब किसी आम नागरिक की सोशल मीडिया पोस्ट पर तत्काल कार्रवाई हो सकती है, तो खुले मंचों से नरसंहार के आह्वान करने वालों पर कानून अचानक धीमा क्यों पड़ जाता है? यह सवाल अदालत ने भले प्रत्यक्ष न पूछा हो, लेकिन उसके निर्णय ने व्यवस्था को आईना जरूर दिखाया है।
हेट स्पीच सिर्फ शब्द नहीं होती बल्कि यह दंगों की प्रस्तावना होती है। यह भीड़ हिंसा की भूमिका लिखती है। यह इंसानों को नागरिक से दुश्मन में बदलने की साजिश होती है। भारत जैसे बहुलतावादी लोकतंत्र में नफरत की राजनीति केवल सामाजिक ताने-बाने को नहीं तोड़ती, बल्कि संविधान की मूल भावना-न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व को भी चुनौती देती है। सुप्रीम कोर्ट ने सरकारों को यह खुली छूट भी दी है कि वे बदलते समय के अनुसार नए कानूनी उपायों पर विचार करें।
यानी गेंद अब विधायिका और कार्यपालिका के पाले में है। अब बहाना नहीं चलेगा। कानून मौजूद है। अदालत स्पष्ट है। सवाल केवल इतना है कि क्या सरकारें नफरत फैलाने वालों पर कार्रवाई करने की राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएंगी? लोकतंत्र में असहमति जरूरी है, लेकिन नफरत नहीं। आलोचना स्वीकार्य है, लेकिन अमानवीयकरण नहीं। अभिव्यक्ति का अधिकार पवित्र है, पर किसी समुदाय की गरिमा को कुचलने का लाइसेंस नहीं। सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला भारतीय लोकतंत्र के लिए एक चेतावनी भी है और उम्मीद भी-नफरत चाहे जितनी ऊंची आवाज में बोले, संविधान की आवाज उससे हमेशा ऊंची रहेगी।
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