इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक बार फिर साबित कर दिया है कि जब सत्ता खामोश हो जाए, संस्थाएं आंखें मूंद लें और कानून का इस्तेमाल कमजोरों को डराने के लिए होने लगे, तब न्यायपालिका ही संविधान की आखिरी उम्मीद बनकर खड़ी होती है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
एक तरफ अदालत ने राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग को आईना दिखाते हुए साफ कहा कि जब देश में मुसलमानों की मॉब लिंचिंग होती है, जब नफरत के नाम पर लोगों को सड़कों पर पीटा जाता है, जब उनके घरों पर बुलडोजर चलते हैं, तब राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग की खामोशी सबसे ज़्यादा चुभती है। और फिर सवाल उठता है कि आखिर यह खामोशी क्यों?
क्या इसलिए कि इन संस्थाओं के शीर्ष पदों पर बैठने वाले लोगों की नियुक्ति वही सत्ता करती है, जिसके खिलाफ उन्हें आवाज़ उठानी पड़ सकती है? जिसने कुर्सी दी हो, उसके खिलाफ बोलना आसान नहीं होता। यही वजह है कि कई बार मानवाधिकार जैसी संवैधानिक और अर्ध-न्यायिक संस्थाएं सत्ता के सामने बेबस, और जनता के सामने खामोश नज़र आती हैं। इलाहाबाद हाईकोर्ट की टिप्पणी सिर्फ एनएचआरसी पर सवाल नहीं है, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर है, जहां निगरानी करने वाली संस्थाओं की स्वतंत्रता धीरे-धीरे कमजोर की जा रही है।
अगर मानवाधिकार आयोग को वास्तव में जनता का प्रहरी बनाना है, तो उसकी नियुक्ति प्रक्रिया पूरी तरह स्वतंत्र, पारदर्शी और सरकार के प्रभाव से मुक्त होनी चाहिए। ऐसी संस्थाओं को सत्ता का विस्तार नहीं, संविधान का प्रहरी होना चाहिए।
क्योंकि जब पहरेदार ही सत्ता के दरबार में खड़ा हो जाए, तो आम नागरिक की सुरक्षा कौन करेगा? लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता। लोकतंत्र उन स्वतंत्र संस्थाओं से जीवित रहता है, जो सत्ता से सवाल पूछने का साहस रखती हैं। और अगर यह साहस खत्म हो गया, तो संविधान सिर्फ किताबों में रह जाएगा, ज़मीन पर नहीं। जिस आयोग का काम मानवाधिकारों की रक्षा करना है, वही मुसलमानों पर हो रही मॉब लिंचिंग, हमलों और नफरत भरे अपराधों पर अक्सर खामोश नजर आता है। यह टिप्पणी केवल एनएचआरसी पर नहीं, बल्कि उस पूरे तंत्र पर सवाल है, जो पीड़ितों की चीखें सुनकर भी अनसुना कर देता है।
जब किसी समुदाय के लोगों को भीड़ पीट-पीटकर मार दे, जब उनके खिलाफ झूठे आरोप लगाकर उन्हें निशाना बनाया जाए, तब मानवाधिकार आयोग की जिम्मेदारी सबसे पहले बनती है। लेकिन अदालत ने पूछा है कि आखिर वह कहां था, जब देश में नफरत की आग भड़क रही थी? दूसरे मामले में भी हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश सरकार को कड़ा संदेश दिया।
केवल शक के आधार पर मोहम्मद चांद की गाड़ी जब्त कर ली गई, उनकी रोजी-रोटी छीन ली गई, और 18 महीनों तक उन्हें आर्थिक बर्बादी झेलनी पड़ी। बाद में अदालत ने पाया कि बीफ होने का कोई पुख्ता सबूत ही नहीं था। यह फैसला सिर्फ दो लाख रुपये के मुआवजे का नहीं है। यह उस सोच पर करारा तमाचा है, जिसमें पहले मुसलमानों को आरोपी बना दिया जाता है और सबूत बाद में तलाशे जाते हैं।
उत्तर प्रदेश सहित भाजपा राज्यों में पिछले कुछ वर्षों में बुलडोजर, गो-रक्षा और कथित एनकाउंटर की राजनीति ने कानून के राज पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। अदालत का यह फैसला बताता है कि संविधान अभी जिंदा है, और न्याय अभी बिकाऊ नहीं हुआ है। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग जैसी संस्थाओं को भी समझना होगा कि उनका दायित्व सत्ता को खुश करना नहीं, बल्कि नागरिकों के अधिकारों की रक्षा करना है। अगर वे अपने मूल कर्तव्य से भटकेंगे, तो अदालतें उन्हें याद दिलाती रहेंगी।
इन दोनों फैसलों का संदेश बिल्कुल साफ है कि कानून किसी की जागीर नहीं है। नफरत, पूर्वाग्रह और सत्ता का दुरुपयोग हमेशा न्याय के दरवाजे पर हारता है। लोकतंत्र की असली ताकत संसद की बहुमत में नहीं, अदालत की निष्पक्षता में होती है। और इलाहाबाद हाईकोर्ट ने यह ताकत एक बार फिर देश को दिखा दी है।
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