पंजाब के स्थानीय निकाय चुनावों में आम आदमी पार्टी (AAP) की बड़ी जीत केवल एक चुनावी सफलता नहीं है, बल्कि इसने भारतीय राजनीति में एक पुरानी बहस को भी फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है-ईवीएम बनाम बैलेट पेपर। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
नगर निगमों, नगर परिषदों और नगर पंचायतों के इन चुनावों में AAP ने 1,977 में से 958 वार्ड जीतकर स्पष्ट बढ़त हासिल की। कांग्रेस काफी पीछे रही, जबकि भाजपा और शिरोमणि अकाली दल भी अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सके। मुख्यमंत्री भगवंत मान और अरविंद केजरीवाल ने इसे अपनी सरकार के कामकाज पर जनता की मुहर बताया, जबकि विपक्ष ने प्रशासनिक मशीनरी के दुरुपयोग के आरोप लगाए। लेकिन राजनीतिक बहस का एक दूसरा पहलू भी सामने आया।
चूंकि ये चुनाव बैलेट पेपर के जरिए हुए थे, इसलिए सोशल मीडिया और राजनीतिक हलकों में फिर यह सवाल उठने लगा कि यदि बैलेट पेपर पर विपक्षी दल बेहतर प्रदर्शन कर सकते हैं, तो राष्ट्रीय और राज्य स्तर के चुनावों में ईवीएम को लेकर उठने वाली आशंकाओं का क्या अर्थ है? भारत में ईवीएम को लेकर विवाद कोई नया नहीं है। कई विपक्षी दल समय-समय पर चुनावी प्रक्रिया में अधिक पारदर्शिता की मांग करते रहे हैं।
कुछ दलों ने वीवीपैट की 100 प्रतिशत गिनती की मांग की है, जबकि कुछ नेता बैलेट पेपर पर वापसी की वकालत करते रहे हैं। दूसरी ओर, भारत का चुनाव आयोग और न्यायपालिका लगातार यह कहते रहे हैं कि ईवीएम में छेड़छाड़ के आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त प्रमाण प्रस्तुत नहीं किए गए हैं और चुनावी प्रक्रिया में अनेक सुरक्षा उपाय मौजूद हैं। यहीं सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न पैदा होता है। यदि किसी राजनीतिक दल या विपक्षी गठबंधन को वास्तव में यह विश्वास है कि चुनावी प्रक्रिया में गंभीर तकनीकी गड़बड़ियां हैं, तो फिर उसकी रणनीति क्या होनी चाहिए?
क्या चुनाव लड़ते रहना और हार के बाद सवाल उठाना पर्याप्त है, या फिर संस्थागत सुधारों के लिए व्यापक राजनीतिक आंदोलन चलाना चाहिए? विपक्ष की आलोचना करने वाले लोग अक्सर यह सवाल पूछते हैं कि यदि ईवीएम पर इतना अविश्वास है, तो लगभग सभी विपक्षी दल चुनावी मैदान में उसी प्रणाली के तहत लगातार भाग क्यों लेते हैं। वहीं विपक्ष का तर्क होता है कि लोकतांत्रिक राजनीति में चुनावों का बहिष्कार समाधान नहीं है, क्योंकि इससे राजनीतिक मैदान पूरी तरह प्रतिद्वंद्वी दल के लिए खुल सकता है। इसलिए वे चुनाव लड़ने के साथ-साथ चुनावी सुधारों की मांग भी करते हैं।
पंजाब के निकाय चुनावों का एक बड़ा संदेश यह भी है कि स्थानीय स्तर पर मतदाता अभी भी सत्ता परिवर्तन और राजनीतिक विकल्प चुनने की क्षमता रखते हैं। यदि चुनाव परिणाम केवल तकनीक से तय होते, तो देश के विभिन्न राज्यों में अलग-अलग दलों की जीत और हार को समझाना कठिन होता। पिछले वर्षों में अलग-अलग राज्यों में भाजपा, कांग्रेस, क्षेत्रीय दलों और गठबंधन सरकारों की जीत-हार का क्रम लगातार बदलता रहा है। फिर भी यह सच है कि लोकतंत्र केवल निष्पक्ष होने से नहीं चलता, बल्कि निष्पक्ष दिखाई भी देना चाहिए।
इसलिए चुनावी प्रक्रिया को लेकर उठने वाले सवालों को खारिज करने के बजाय अधिक पारदर्शिता, अधिक ऑडिट और जनता के विश्वास को मजबूत करने वाले उपायों पर गंभीर चर्चा होनी चाहिए। पंजाब के चुनाव परिणामों ने एक बार फिर यह दिखाया है कि जनता का मूड किसी भी राजनीतिक समीकरण को बदल सकता है। लेकिन इसके साथ ही उन्होंने यह बहस भी जीवित रखी है कि भारत की चुनावी व्यवस्था में जनता का विश्वास और अधिक मजबूत करने के लिए किन सुधारों की आवश्यकता है। लोकतंत्र की मजबूती का रास्ता चुनावों के बहिष्कार से नहीं, बल्कि चुनावी संस्थाओं में अधिक पारदर्शिता, जवाबदेही और सार्वजनिक विश्वास बढ़ाने से होकर गुजरता है।
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