मंदिर हो या मस्जिद, चंदे का एक-एक पैसा जनता का है, किसी ट्रस्ट की जागीर नहीं, अयोध्या का श्रीराम मंदिर करोड़ों हिंदुओं की आस्था का केंद्र है। इस मंदिर के निर्माण के लिए देश-विदेश के करोड़ों श्रद्धालुओं ने अपनी श्रद्धा, विश्वास और मेहनत की कमाई का दान दिया। किसी ने सौ रुपये दिए, किसी ने लाखों, तो किसी ने जीवनभर की बचत भगवान श्रीराम के चरणों में समर्पित कर दी। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन आज वही श्रद्धालु पूछ रहे हैं कि क्या भगवान के नाम पर चढ़ाया गया चढ़ावा भी सुरक्षित नहीं है? राम मंदिर में चढ़ावे की कथित चोरी और गबन के मामले में एफआईआर दर्ज होना, आठ लोगों की गिरफ्तारी, विशेष जांच दल (एसआईटी) की जांच, ट्रस्ट के दो वरिष्ठ पदाधिकारियों चंपत राय और अनिल मिश्रा का नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए इस्तीफा देना और अब कांग्रेस द्वारा ट्रस्ट के अन्य पदाधिकारियों से पूछताछ व गिरफ्तारी की मांग- ये घटनाएं साधारण नहीं हैं। जांच अभी जारी है और अंतिम निष्कर्ष आना बाकी है, लेकिन इतना तय है कि यह मामला केवल कुछ कर्मचारियों की कथित चोरी तक सीमित नहीं रह गया है।
यह पहली बार नहीं है
देश में धार्मिक आस्था के नाम पर धन जुटाने और उसके उपयोग को लेकर पहले भी कई विवाद सामने आते रहे हैं। अलग-अलग मंदिरों, आश्रमों और धार्मिक संस्थाओं में समय-समय पर चढ़ावे, जमीनों, ट्रस्टों और संपत्तियों के प्रबंधन को लेकर आरोप लगे हैं। कई मामलों में जांच हुई, कहीं अदालतें पहुंचीं और कुछ मामलों में कार्रवाई भी हुई। इसका अर्थ यह नहीं कि हर मंदिर या हर ट्रस्ट भ्रष्ट है।
लेकिन यह जरूर साबित होता है कि जहां करोड़ों-अरबों रुपये का लेन-देन होगा, वहां पारदर्शिता और जवाबदेही भी उतनी ही मजबूत होनी चाहिए। धर्म का नाम किसी को कानून से ऊपर नहीं उठा देता। यदि मंदिर में चोरी हुई है तो यह केवल आर्थिक अपराध नहीं, करोड़ों श्रद्धालुओं की आस्था के साथ विश्वासघात भी है।
सिर्फ छोटे कर्मचारी या पूरी व्यवस्था?
अब तक की कार्रवाई में जिन लोगों को गिरफ्तार किया गया है, वे चढ़ावे की गिनती और प्रबंधन से जुड़े कर्मचारी बताए जा रहे हैं। दूसरी ओर विपक्ष का आरोप है कि केवल छोटे कर्मचारियों को गिरफ्तार करके मामले को सीमित करने की कोशिश हो रही है, जबकि ट्रस्ट के शीर्ष पदाधिकारियों की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए। दूसरी तरफ ट्रस्ट और उससे जुड़े लोग इन आरोपों से इनकार करते हुए निष्पक्ष जांच की बात कह रहे हैं। जांच पूरी होने से पहले किसी व्यक्ति की आपराधिक जिम्मेदारी तय नहीं की जा सकती।
लेकिन एक प्रश्न अवश्य उठता है कि यदि करोड़ों रुपये के चढ़ावे के प्रबंधन में गंभीर अनियमितताएं हुईं, तो क्या केवल निचले स्तर के कर्मचारी ही जिम्मेदार हो सकते हैं? किसी भी संस्था में जवाबदेही ऊपर से नीचे तक तय होती है। इसलिए यदि जांच की आंच शीर्ष स्तर तक जाती है तो उसे भी निष्पक्ष रूप से आगे बढ़ना चाहिए। यदि कोई निर्दोष है तो उसे क्लीन चिट मिले, और यदि कोई दोषी है तो उसके पद, प्रभाव या राजनीतिक संबंध उसे बचाने का आधार नहीं बनने चाहिए।
जब सवाल पूछो तो कहा जाता है-‘यह हिंदुओं का मामला है’
इस पूरे विवाद के बीच कुछ स्वयंभू हिंदू धर्मरक्षक सोशल मीडिया पर यह कहते दिखाई दिए कि “मंदिर हमारा है, चंदा हमारा है, मुसलमानों को बोलने का कोई अधिकार नहीं।” यदि यही तर्क मान लिया जाए, तो फिर एक सवाल भी पूछा जाना चाहिए। जब वक्फ बोर्ड की बात आती है…जब मदरसों की बात आती है…जब मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की बात आती है…जब तीन तलाक, हलाला, मस्जिदों या मुस्लिम समाज के धार्मिक मामलों पर कानून बनाने या राजनीतिक बहस की बात आती है…
तब भारतीय जनता पार्टी, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और उनसे जुड़े अनेक संगठन यह क्यों नहीं कहते कि “यह मुसलमानों का आंतरिक मामला है”? फिर वहां संसद में कानून क्यों बनते हैं? वहां टीवी डिबेट क्यों होती हैं? वहां राजनीतिक अभियान क्यों चलाए जाते हैं? यदि सिद्धांत यह है कि किसी धर्म के धार्मिक मामलों में दूसरे धर्म के लोग नहीं बोलेंगे, तो यह सिद्धांत सभी धर्मों पर समान रूप से लागू होना चाहिए। और यदि सिद्धांत यह है कि जब मामला सार्वजनिक धन, सार्वजनिक संस्था, कानून, संविधान और पारदर्शिता का हो, तब हर नागरिक सवाल पूछ सकता है- तो फिर यह अधिकार राम मंदिर के मामले में भी उतना ही लागू होता है।
दोहरा मापदंड लोकतंत्र में स्वीकार नहीं किया जा सकता। मंदिर किसी दल की संपत्ति नहीं है। राम किसी राजनीतिक दल के नहीं हैं। राम केवल हिंदुओं के भी नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति और सभ्यता के नैतिक आदर्श हैं। महात्मा गांधी के राम भी थे और करोड़ों सामान्य श्रद्धालुओं के भी। इसलिए यदि राम मंदिर के चढ़ावे में गड़बड़ी का आरोप लगता है तो सवाल पूछना राम का अपमान नहीं, बल्कि राम के नाम पर जुटाई गई आस्था की रक्षा करना है। भगवान को भक्तों के चढ़ावे की आवश्यकता नहीं होती, लेकिन ट्रस्टों को उस चढ़ावे का ईमानदारी से हिसाब देना पड़ता है।
मंदिर हो या वक्फ-कानून सब पर बराबर लागू हो
इस पूरे विवाद से सबसे बड़ा सबक यही निकलता है कि देश में धार्मिक संस्थाओं के वित्तीय प्रबंधन को लेकर समान मानक होने चाहिए। मंदिर हो…मस्जिद हो…गुरुद्वारा हो…चर्च हो…वक्फ बोर्ड हो…या कोई धार्मिक ट्रस्ट… जहां जनता का पैसा है, वहां ऑडिट भी होना चाहिए, पारदर्शिता भी होनी चाहिए और जवाबदेही भी तय होनी चाहिए। धर्म के नाम पर किसी को जांच से छूट नहीं मिल सकती। भगवान राम को राजनीति का सबसे बड़ा प्रतीक बनाने वालों को यह भी समझना होगा कि राम का सबसे बड़ा संदेश मर्यादा और सत्य है।
यदि राम के नाम पर जुटाए गए चढ़ावे में गड़बड़ी हुई है, तो उसकी निष्पक्ष जांच होना ही राम के प्रति सच्ची श्रद्धा होगी। और यदि जांच में कोई निर्दोष साबित होता है तो उसका सम्मान भी उतना ही जरूरी है। लेकिन यदि कोई दोषी पाया जाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई इसलिए नहीं होनी चाहिए कि वह किसी दल, संगठन या धर्म से जुड़ा है, बल्कि इसलिए कि उसने करोड़ों श्रद्धालुओं के विश्वास को चोट पहुंचाई है। भारत का संविधान यही कहता है कि कानून का हाथ मंदिर के दरवाजे पर रुकना नहीं चाहिए और न ही मस्जिद की चौखट पर। आस्था सबकी अपनी-अपनी हो सकती है, लेकिन ईमानदारी और जवाबदेही सबके लिए समान होनी चाहिए।
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