गुजरात में 70 वर्षीय ज़हीरुद्दीन शेख की कथित हिरासत में मौत और बिहार के मधुबनी में 66 वर्षीय इस्लाम नदाफ की कथित भीड़ हिंसा में मौत, दो अलग-अलग राज्यों की घटनाएं हैं। लेकिन इन दोनों मामलों में एक समानता दिखाई देती है कि परिवारों का यह आरोप कि उन्हें समय पर न्याय नहीं मिला, उनकी शिकायतों को गंभीरता से नहीं लिया गया और संस्थाओं से उन्हें अपेक्षित राहत नहीं मिली। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
ज़हीरुद्दीन शेख को गुजरात पुलिस ने गो-हत्या से जुड़े एक मामले में गिरफ्तार किया था। कुछ ही घंटों बाद उनकी तबीयत बिगड़ी और अस्पताल में उनकी मौत हो गई। परिवार का आरोप है कि हिरासत में उनके साथ मारपीट की गई और उन्हें कोई अज्ञात पदार्थ खिलाया गया। दूसरी ओर पुलिस का कहना है कि वह मामले की जांच कर रही है और कानूनी प्रक्रिया का पालन किया जा रहा है।
जब परिवार ने कथित हिरासत में मौत के मामले में तत्काल एफआईआर दर्ज कराने की मांग करते हुए गुजरात हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, तो अदालत ने याचिका खारिज करते हुए कहा कि पहले भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के तहत उपलब्ध वैकल्पिक कानूनी उपायों का इस्तेमाल किया जाना चाहिए। अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि कानून में निर्धारित प्रक्रिया को दरकिनार कर सीधे संवैधानिक अधिकार क्षेत्र का उपयोग नहीं किया जा सकता।
कानूनी दृष्टि से यह फैसला स्थापित न्यायिक सिद्धांतों के अनुरूप हो सकता है, लेकिन पीड़ित परिवारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं के बीच यह सवाल भी उठ रहा है कि जब आरोप स्वयं पुलिस पर हों, तब आम नागरिक को न्याय की प्रक्रिया कितनी निष्पक्ष और प्रभावी दिखाई देती है। उधर बिहार के मधुबनी में इस्लाम नदाफ की मौत का मामला भी कई गंभीर सवाल खड़े करता है। परिवार और स्थानीय लोगों का आरोप है कि एक विवाद के बाद भीड़ ने उनके घर पर हमला किया, महिलाओं तक के साथ मारपीट की गई और इस्लाम नदाफ को इतनी बुरी तरह पीटा गया कि बाद में उनकी मौत हो गई।
परिजनों का आरोप है कि पुलिस से कई बार शिकायत करने के बावजूद कार्रवाई नहीं हुई और एफआईआर दर्ज करने में भी टालमटोल की गई। यदि इन आरोपों में सच्चाई है, तो यह केवल एक आपराधिक घटना नहीं बल्कि कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक जवाबदेही का भी प्रश्न है। किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था में पुलिस की पहली जिम्मेदारी शिकायत दर्ज करना और निष्पक्ष जांच सुनिश्चित करना होती है। जब पीड़ित पक्ष को यह महसूस होने लगे कि उसकी बात नहीं सुनी जा रही, तो संस्थाओं पर विश्वास कमजोर होने लगता है।
इन दोनों मामलों को व्यापक संदर्भ में देखें तो वे भारत में न्याय व्यवस्था को लेकर बढ़ती चिंताओं की ओर संकेत करते हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के आंकड़े बताते हैं कि जेलों में हर वर्ष बड़ी संख्या में प्राकृतिक और अप्राकृतिक मौतें होती हैं। दूसरी ओर भीड़ हिंसा, सांप्रदायिक तनाव और हिरासत में उत्पीड़न जैसे आरोप भी समय-समय पर सामने आते रहते हैं। ऐसे मामलों में न्याय केवल होना ही नहीं चाहिए, बल्कि होते हुए दिखाई भी देना चाहिए। यहीं से न्यायपालिका की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है।
अदालतें लोकतंत्र में अंतिम उम्मीद मानी जाती हैं। लेकिन जब किसी मामले में पीड़ित परिवार को तत्काल राहत नहीं मिलती, या कानूनी प्रक्रिया लंबी और जटिल प्रतीत होती है, तब समाज के एक हिस्से में निराशा पैदा होती है। यह कहना सही नहीं होगा कि देश में अदालतों से इंसाफ़ की उम्मीद पूरी तरह समाप्त हो रही है, क्योंकि न्यायपालिका ने अनेक मामलों में नागरिक अधिकारों की रक्षा की है और सरकारों व प्रशासन को जवाबदेह भी ठहराया है।
लेकिन यह भी उतना ही सच है कि न्याय मिलने में देरी, लंबी कानूनी प्रक्रियाएं और संवेदनशील मामलों में उठने वाले सवाल लोगों के विश्वास की परीक्षा लेते हैं। सबसे बड़ी चिंता यह है कि जब किसी नागरिक को लगे कि पुलिस उसकी नहीं सुन रही, प्रशासन निष्क्रिय है और न्याय पाने की राह बेहद कठिन है, तब लोकतांत्रिक संस्थाओं पर उसका भरोसा कमज़ोर होने लगता है। गुजरात और बिहार की ये घटनाएं इसी व्यापक संकट की ओर संकेत करती हैं।
लोकतंत्र की मजबूती केवल कानून बनाने से नहीं होती, बल्कि इस बात से होती है कि सबसे कमजोर और सबसे हाशिए पर खड़े नागरिक को भी यह भरोसा हो कि यदि उसके साथ अन्याय होगा तो राज्य, पुलिस और अदालतें उसकी बात सुनेंगी। यदि यह भरोसा कमजोर पड़ता है, तो यह केवल किसी एक समुदाय या परिवार का संकट नहीं रहता, बल्कि पूरे लोकतांत्रिक ढांचे के लिए एक गंभीर चेतावनी बन जाता है |
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