महाराष्ट्र विधानसभा में समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड-यूसीसी) को लेकर हुई बहस ने एक बार फिर उस संवैधानिक प्रश्न को राष्ट्रीय विमर्श के केंद्र में ला दिया है, जो आज़ादी के बाद से समय-समय पर उठता रहा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
समर्थक इसे संविधान के अनुच्छेद 44 में निहित राज्य के नीति-निर्देशक तत्वों को लागू करने की दिशा में आवश्यक कदम बताते हैं, जबकि विरोधियों का कहना है कि भारत जैसे बहुधार्मिक और बहुसांस्कृतिक देश में बिना व्यापक सहमति के यूसीसी लागू करना सामाजिक तनाव और अविश्वास को बढ़ा सकता है। असल सवाल केवल यह नहीं है कि यूसीसी लागू हो या न हो। असली सवाल यह है कि कैसा यूसीसी, किस प्रक्रिया से और किन समुदायों के विश्वास के साथ लागू किया जाएगा?
भारत की ताकत उसकी विविधता है
भारत एक ऐसा देश है जहां केवल धर्म ही अलग-अलग नहीं हैं, बल्कि एक ही धर्म के भीतर भी विवाह, उत्तराधिकार, गोद लेने, संपत्ति और पारिवारिक परंपराओं को लेकर अनेक रीति-रिवाज मौजूद हैं। मुस्लिम समुदाय में भी अलग-अलग फ़िक़्ह हैं। हिंदू समाज में भी क्षेत्रीय और पारंपरिक विविधताएं हैं। आदिवासी समुदायों की अपनी अलग परंपराएं हैं। पूर्वोत्तर राज्यों में विशेष संवैधानिक व्यवस्थाएं हैं। ऐसे देश में “एक कानून, सब पर समान रूप से” सुनने में जितना सरल लगता है, व्यवहार में उतना ही जटिल हो सकता है।
क्या यूसीसी केवल मुसलमानों के लिए है?
यूसीसी पर होने वाली अधिकांश राजनीतिक बहसों में ऐसा माहौल बनाया जाता है मानो इसका संबंध केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ से हो। जबकि वास्तविकता यह है कि यदि समान नागरिक संहिता लागू होती है तो उसका प्रभाव केवल मुसलमानों पर नहीं, बल्कि हिंदू, ईसाई, पारसी, आदिवासी और अन्य समुदायों की अनेक पारिवारिक और वैयक्तिक कानूनी व्यवस्थाओं पर भी पड़ सकता है। यदि समानता का सिद्धांत लागू होगा, तो वह सभी पर समान रूप से लागू होना चाहिए। यही संविधान की भी अपेक्षा है।
क्या अभी सही समय है?
यह भी एक गंभीर प्रश्न है। देश इस समय बेरोज़गारी, महंगाई, कृषि संकट, शिक्षा, पेपर लीक, स्वास्थ्य और आर्थिक असमानता जैसी अनेक चुनौतियों का सामना कर रहा है। ऐसे समय में यह प्रश्न स्वाभाविक है कि क्या सरकार की प्राथमिकता सामाजिक सहमति वाले सुधार होने चाहिए या ऐसे मुद्दे जो समाज को वैचारिक आधार पर और अधिक विभाजित कर सकते हैं? यह प्रश्न राजनीतिक है, लेकिन इसे नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।
सहमति के बिना कानून नहीं, टकराव पैदा होता है
इतिहास बताता है कि सामाजिक सुधार केवल कानून बना देने से सफल नहीं होते। वे तब सफल होते हैं जब समाज को साथ लेकर चला जाए। सती प्रथा का उन्मूलन हो, बाल विवाह विरोधी कानून हो या महिलाओं के अधिकारों से जुड़े सुधार। हर बड़े परिवर्तन के साथ सामाजिक संवाद भी जुड़ा था। यदि यूसीसी को केवल राजनीतिक बहुमत के आधार पर लागू किया गया और संबंधित समुदायों की आशंकाओं को दूर नहीं किया गया, तो उसका परिणाम कानूनी विवादों, सामाजिक तनाव और संवैधानिक चुनौतियों के रूप में सामने आ सकता है।
विरोधियों की प्रमुख आशंकाएं
यूसीसी के आलोचक कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठाते हैं-क्या यह वास्तव में सभी समुदायों के लिए समान कानून होगा? या व्यवहार में इसका सबसे अधिक असर केवल कुछ विशेष समुदायों पर पड़ेगा? क्या आदिवासी समुदायों की पारंपरिक व्यवस्थाएं सुरक्षित रहेंगी? क्या विभिन्न धार्मिक और सांस्कृतिक प्रथाओं का सम्मान बना रहेगा? क्या सरकार ने सभी समुदायों, महिला संगठनों, विधि विशेषज्ञों और सामाजिक संगठनों से व्यापक संवाद किया है? ये ऐसे प्रश्न हैं जिनका उत्तर केवल राजनीतिक भाषणों से नहीं, बल्कि मसौदा कानून और सार्वजनिक विमर्श से मिल सकता है।
समानता और एकरूपता में अंतर है
संविधान समानता की बात करता है। लेकिन समानता का अर्थ हमेशा एकरूपता नहीं होता। भारत का संविधान स्वयं धार्मिक और सांस्कृतिक विविधता को मान्यता देता है। इसलिए किसी भी सुधार का उद्देश्य अधिकारों की समानता होना चाहिए, न कि विविधताओं का अनावश्यक उन्मूलन।
राजनीतिक विमर्श की दिशा भी चिंता का विषय
दुर्भाग्य यह है कि यूसीसी पर गंभीर संवैधानिक बहस कम और भावनात्मक तथा चुनावी राजनीति अधिक दिखाई देती है। एक पक्ष इसे राष्ट्रवाद का प्रतीक बताता है। दूसरा पक्ष इसे अल्पसंख्यकों के अधिकारों पर हमला मानता है। इन दोनों अतियों के बीच सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न कहीं खो जाता है-क्या प्रस्तावित कानून वास्तव में न्यायपूर्ण, व्यावहारिक और संवैधानिक होगा?
सरकार की जिम्मेदारी अधिक है
यदि सरकार वास्तव में यूसीसी लागू करना चाहती है, तो उसे सबसे पहले प्रस्तावित मसौदा पूरी पारदर्शिता के साथ सार्वजनिक करना चाहिए। हर राज्य, हर समुदाय, महिला संगठनों, विधि आयोग, बार एसोसिएशनों और नागरिक समाज से सुझाव लेने चाहिए। कानून केवल संसद या विधान सभा में बहुमत से नहीं, बल्कि समाज के विश्वास से भी मजबूत होता है। समान नागरिक संहिता पर बहस लोकतंत्र के लिए अच्छी बात है।
लेकिन यह बहस संविधान की भाषा में होनी चाहिए, चुनावी नारों की भाषा में नहीं। यदि यूसीसी वास्तव में सभी नागरिकों को समान अधिकार, लैंगिक न्याय और कानूनी स्पष्टता देता है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि यह समाज के किसी हिस्से में यह भावना पैदा करता है कि उसकी धार्मिक या सांस्कृतिक पहचान को पर्याप्त संवाद के बिना बदला जा रहा है, तो सरकार का दायित्व है कि वह उन आशंकाओं को गंभीरता से सुने।
भारत की सबसे बड़ी शक्ति उसकी विविधता है। इसलिए किसी भी कानून की सफलता इस बात से तय होगी कि वह समानता स्थापित करता है या केवल एकरूपता थोपने का प्रयास करता है। लोकतंत्र में कानून बनाना आसान है। विश्वास बनाना कहीं अधिक कठिन है।
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