कहा जाता है कि संगीत इंसान के दिल को मुलायम बनाता है। गीत सीमाएं मिटाते हैं, इंसानों को जोड़ते हैं और समाज में प्रेम, करुणा तथा सह-अस्तित्व की भावना पैदा करते हैं। लेकिन इतिहास यह भी बताता है कि जब सत्ता, राजनीति और कट्टर विचारधाराएं संगीत पर कब्ज़ा कर लेती हैं, तो वही गीत इंसानियत के सबसे बड़े दुश्मन भी बन सकते हैं। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
रवांडा के नरसंहार से पहले रेडियो पर बजने वाले गीत और संदेश हों या जर्मनी में नाज़ी प्रचार का सांस्कृतिक तंत्र-इतिहास गवाह है कि सामूहिक नफ़रत कभी अचानक पैदा नहीं होती। पहले भाषा बदलती है, फिर गीत बदलते हैं, फिर समाज बदलता है और अंततः इंसान दूसरे इंसान को दुश्मन समझने लगता है। भारत में भी आज एक गंभीर सवाल हमारे सामने खड़ा है। क्या गीत-संगीत अब मनोरंजन नहीं, बल्कि सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का हथियार बन चुका है?
हाल में प्रकाशित सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ ऑर्गेनाइज्ड हेट (CSOH) की रिपोर्ट इसी सवाल को सामने रखती है। रिपोर्ट में ऐसे सैकड़ों गीतों का विश्लेषण किया गया है जिनमें मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों के प्रति घृणा, अपमान, षड्यंत्र सिद्धांत और कई मामलों में हिंसा का खुला या परोक्ष आह्वान होने का दावा किया गया है। यदि रिपोर्ट के निष्कर्ष सही हैं, तो मामला केवल कुछ आपत्तिजनक गानों का नहीं, बल्कि एक संगठित डिजिटल इकोसिस्टम का है, जिसमें नफ़रत केवल विचार नहीं, बल्कि आय का स्रोत भी बन चुकी है।
नफ़रत अब केवल भाषणों में नहीं, बीट्स और रील्स में भी है
एक समय था जब सांप्रदायिक भाषण चुनावी मंचों तक सीमित रहते थे। आज वही बातें गानों, इंस्टाग्राम रीलों, यूट्यूब शॉर्ट्स और वायरल वीडियो के जरिए करोड़ों लोगों तक पहुंच रही हैं। नफ़रत अब सिर्फ भाषण नहीं रही बल्कि वह अब मनोरंजन का रूप ले चुकी है। धुन आकर्षक होती है, वीडियो रंगीन होता है, शब्द उत्तेजक होते हैं और एल्गोरिदम उसे लाखों लोगों तक पहुंचा देता है। यही आधुनिक डिजिटल प्रोपेगैंडा की सबसे बड़ी ताकत है।
जब हिंसा गीत बन जाती है, तब उसे सुनने वाला उसे भाषण नहीं, मनोरंजन समझता है। यही उसकी सबसे खतरनाक विशेषता है। क्या यह केवल कलाकारों का काम है? नहीं। किसी भी सांस्कृतिक माहौल का निर्माण अकेले गायक नहीं करते। जब समाज में लगातार किसी एक समुदाय को “घुसपैठिया”, “देशद्रोही”, “जनसंख्या विस्फोट”, “लव जिहाद”, “थूक जिहाद”, “भूमि जिहाद” या ऐसे ही अन्य राजनीतिक नारों के जरिए संदेह की नजर से देखा जाने लगे, तो वही भाषा धीरे-धीरे फिल्मों में पहुंचती है, टीवी बहसों में पहुंचती है, सोशल मीडिया में पहुंचती है और आखिरकार गीतों में भी उतर आती है।
गीत तब केवल संगीत नहीं रहते। वे राजनीतिक घोषणापत्र बन जाते हैं। आलोचकों की सबसे बड़ी चिंता क्या है? सरकार और उसके समर्थक इन आलोचनाओं से असहमत हो सकते हैं। उनका तर्क हो सकता है कि वे केवल सांस्कृतिक पुनर्जागरण या राष्ट्रवाद का समर्थन करते हैं। लेकिन दूसरी ओर अनेक मानवाधिकार संगठनों, शिक्षाविदों, पत्रकारों और विपक्षी दलों का आरोप है कि पिछले कुछ वर्षों में धार्मिक अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफ़रत फैलाने वाली भाषा पर पर्याप्त और समान रूप से कार्रवाई नहीं हुई।
आलोचकों का कहना है कि कुछ मामलों में ऐसे भाषण देने वाले लोग राजनीतिक संरक्षण प्राप्त करते दिखाई दिए, जबकि दूसरी ओर सरकार की आलोचना करने वाले अनेक पत्रकारों, कार्यकर्ताओं या कंटेंट निर्माताओं के खिलाफ अपेक्षाकृत तेज़ कार्रवाई देखने को मिली। यह आरोप अपनी जगह राजनीतिक बहस का विषय है, लेकिन इतना अवश्य है कि इस असमानता की धारणा ने लोकतांत्रिक विमर्श को गहराई से प्रभावित किया है।
नफ़रत का पूरा उद्योग तैयार हो चुका है
यदि रिपोर्ट के निष्कर्षों पर विश्वास करें, तो यह केवल वैचारिक अभियान नहीं बल्कि आर्थिक मॉडल भी है। वीडियो पर विज्ञापन चलते हैं। यूट्यूब की मोनेटाइजेशन होती है। सुपर थैंक्स से पैसा आता है। रील्स से लोकप्रियता मिलती है। फॉलोअर बढ़ते हैं। और फिर यही लोकप्रियता राजनीतिक और सामाजिक प्रभाव में बदल जाती है। यानी नफ़रत अब केवल विचारधारा नहीं, बल्कि बिजनेस मॉडल भी बनती जा रही है। यह लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।
फिल्म, टीवी और मीडिया की भूमिका पर भी सवाल
आलोचकों का कहना है कि पिछले वर्षों में ऐसी कई फिल्में, टीवी बहसें और कुछ धारावाहिक आए जिन पर धार्मिक ध्रुवीकरण को बढ़ावा देने के आरोप लगे। दूसरी ओर, इन कृतियों के समर्थकों का कहना है कि वे ऐतिहासिक या समकालीन घटनाओं को अपने दृष्टिकोण से प्रस्तुत करते हैं। यही कारण है कि सांस्कृतिक माध्यमों की भूमिका पर बहस तेज हुई है। सवाल यह नहीं कि किसी फिल्म या गीत को किसी एक विचारधारा से जोड़ा जाए, बल्कि यह है कि क्या किसी समुदाय के प्रति अमानवीय भाषा, सामूहिक दोषारोपण या हिंसा के संकेत सामान्य मनोरंजन का हिस्सा बनते जा रहे हैं। यदि ऐसा है, तो यह केवल कला का प्रश्न नहीं, सामाजिक उत्तरदायित्व का प्रश्न भी है।
लोकतंत्र की परीक्षा
लोकतंत्र की असली परीक्षा तब नहीं होती जब हम अपने जैसे लोगों के अधिकारों की रक्षा करें। असली परीक्षा तब होती है जब हम उन लोगों के अधिकारों की भी रक्षा करें जिनसे हम असहमत हैं। यदि किसी मुसलमान, ईसाई, दलित, आदिवासी, हिंदू, सिख या किसी भी समुदाय के खिलाफ हिंसा का सार्वजनिक आह्वान गीतों के माध्यम से होने लगे और समाज उसे सामान्य मानने लगे, तो यह केवल उस समुदाय की हार नहीं होगी। यह भारतीय संविधान की हार होगी।
सरकार, प्लेटफॉर्म और समाज-तीनों की जिम्मेदारी
सरकार का दायित्व है कि कानून का निष्पक्ष और समान अनुपालन सुनिश्चित करे। डिजिटल प्लेटफॉर्मों का दायित्व है कि वे अपनी घोषित नीतियों के अनुरूप घृणा और हिंसा को बढ़ावा देने वाले कंटेंट पर प्रभावी कार्रवाई करें। और समाज का दायित्व है कि वह किसी भी समुदाय के खिलाफ नफ़रत को मनोरंजन के रूप में स्वीकार न करे। भारत की पहचान उसकी विविधता है। यह वह देश है जहां कबीर, गुरु नानक, ख्वाजा मोइनुद्दीन चिश्ती, महात्मा गांधी, डॉ. भीमराव आंबेडकर और मौलाना आज़ाद जैसे विचारों ने नफ़रत नहीं, बल्कि संवाद की परंपरा बनाई।
यदि आज संगीत प्रेम की जगह प्रतिशोध सिखाने लगे, यदि कलाकार इंसानियत की जगह दुश्मनी बेचने लगें, यदि एल्गोरिदम करुणा से अधिक घृणा को बढ़ावा देने लगें और यदि समाज इसे सामान्य मान ले, तो यह केवल सांस्कृतिक संकट नहीं होगा बल्कि यह लोकतंत्र की आत्मा पर सबसे गहरा प्रहार होगा। नफ़रत का गीत कुछ मिनटों का हो सकता है, लेकिन उसका असर पीढ़ियों तक रहता है। इसलिए सवाल केवल यह नहीं कि ऐसे गीत कौन गा रहा है।
सवाल यह भी है कि उन्हें सुन कौन रहा है, बढ़ावा कौन दे रहा है, उनसे कमाई कौन कर रहा है, और सबसे महत्वपूर्ण- उन्हें रोकने की जिम्मेदारी कौन निभा रहा है। क्योंकि इतिहास बताता है कि सभ्यताएं केवल तलवारों से नहीं टूटतीं; वे पहले शब्दों से टूटती हैं। और जब शब्द ज़हर बन जाएं, तो समाज का मौन भी अपराध बन जाता है।
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