दोस्तों संयुक्त राष्ट्र महासभा की अध्यक्ष अन्नालेना बेयरबॉक के भारत दौरे से पहले विश्व हिंदू परिषद ने पाकिस्तान और बांग्लादेश में अल्पसंख्यकों पर हो रहे अत्याचारों को लेकर चिंता जताई है। पहली नज़र में यह पहल सराहनीय लगती है। आखिर दुनिया के किसी भी कोने में किसी भी समुदाय पर होने वाला अन्याय चिंता का विषय होना चाहिए। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
लेकिन सवाल यहीं से शुरू होता है। क्या विहिप की संवेदनाएं सिर्फ सीमाओं के पार रहने वाले अल्पसंख्यकों के लिए हैं? क्या भारत के अल्पसंख्यक उसके लिए नागरिक नहीं हैं? क्या इंसाफ़ का पैमाना सरहद पार करते ही बदल जाता है? पाकिस्तान में जबरन धर्मांतरण हो, बांग्लादेश में मंदिरों पर हमला हो, तो विहिप का खून खौल उठता है।
होना भी चाहिए। लेकिन भारत में मॉब लिंचिंग हो, धार्मिक जुलूसों के नाम पर हिंसा हो, चर्चों पर हमले हों, मुसलमानों के आर्थिक बहिष्कार के खुले आह्वान हों, तब यही संगठन अक्सर या तो चुप रहता है या फिर उसके नेताओं के बयान आग में घी डालने का काम करते हैं।
इतिहास गवाह है कि विहिप का नाम केवल धार्मिक अभियानों तक सीमित नहीं रहा। बाबरी मस्जिद विध्वंस आंदोलन से लेकर तथाकथित “घर वापसी” अभियानों तक, “लव जिहाद” के नाम पर नफ़रत फैलाने से लेकर कई राज्यों में सांप्रदायिक ध्रुवीकरण तक, इस संगठन की भूमिका लगातार विवादों में रही है। कई मौकों पर इसके नेताओं के भड़काऊ भाषणों ने समाज में अविश्वास और वैमनस्य को बढ़ाया है। यही सबसे बड़ा विरोधाभास है।
एक तरफ़ विहिप संयुक्त राष्ट्र से अल्पसंख्यकों की सुरक्षा की मांग कर रहा है, दूसरी तरफ़ भारत में उसी के कार्यकर्ताओं और संबद्ध संगठनों पर अल्पसंख्यकों के खिलाफ नफरत, हिंसा, बहिष्कार और उकसावे के आरोप लगते रहे हैं। अगर विहिप सचमुच मानवाधिकारों के लिए चिंतित है, तो उसे सबसे पहले अपने घर के भीतर झांकना होगा। क्या वह भारत में मुसलमानों की लिंचिंग के खिलाफ उतनी ही मुखरता से बोलेगा? क्या वह चर्चों पर हमलों की निंदा करेगा? क्या वह अल्पसंख्यकों के आर्थिक बहिष्कार के आह्वानों का विरोध करेगा?
क्या वह अपने नेताओं की नफरत भरी भाषा पर लगाम लगाएगा? जब तक इन सवालों का जवाब नहीं मिलता, तब तक पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए बहाए गए आंसू महज़ राजनीतिक प्रतीकवाद ही माने जाएंगे। मानवाधिकार चुनिंदा नहीं होते। अल्पसंख्यकों की सुरक्षा सीमाओं में कैद नहीं होती। और न्याय का कोई धर्म नहीं होता।
यदि विहिप वास्तव में न्याय चाहता है, तो उसे इस मांग में भारत के मुसलमानों, ईसाइयों, सिखों, बौद्धों और पिछड़ों को भी शामिल करना होगा। वरना यह लड़ाई इंसाफ़ की नहीं, बल्कि राजनीति की मानी जाएगी। क्योंकि सच यही है जो संगठन पाकिस्तान और बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए आवाज़ उठाता है, उसे भारत के अल्पसंख्यकों की चीखें भी सुननी होंगी। वरना इतिहास उसे मानवाधिकारों का प्रहरी नहीं, बल्कि दोहरे मापदंडों का सबसे बड़ा प्रतीक लिखेगा।
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