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Home»भारत

धर्म के नाम पर सड़क जाम? सुप्रीम कोर्ट की दो-टूक—आस्था निजी है, अराजकता नहीं!

adminBy adminMay 3, 2026 भारत No Comments3 Mins Read
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भारत में धर्म आस्था का विषय है, लेकिन जब यही आस्था दूसरों के अधिकारों, सार्वजनिक व्यवस्था और संवैधानिक मूल्यों पर भारी पड़ने लगे, तो राज्य का हस्तक्षेप न केवल उचित बल्कि अनिवार्य हो जाता है। सुप्रीम कोर्ट की सबरीमाला मामले में आई हालिया टिप्पणी ने इसी संवैधानिक मर्यादा को रेखांकित किया है। मुख्य न्यायाधीश न्यायमूर्ति सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने साफ कहा कि धार्मिक स्वतंत्रता असीमित नहीं है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें

पूजा-पाठ आपका अधिकार है, लेकिन धर्म की आड़ में सार्वजनिक जीवन को बाधित करने, सड़कों को जाम करने या दूसरों के अधिकारों का हनन करने की अनुमति किसी को नहीं दी जा सकती। न्यायमूर्ति बी. वी. नागरत्ना की टिप्पणी—”आप अपनी धार्मिक गतिविधि करें, लेकिन सड़कों को अवरुद्ध करके नहीं” आज के भारत के लिए एक ऐतिहासिक संदेश है। यह उन सभी के लिए चेतावनी है जो धार्मिक स्वतंत्रता को कानून से ऊपर मानने लगे हैं।

सवाल केवल सबरीमाला श्री धर्म संस्था मंदिर का नहीं है। सवाल पूरे देश का है। बीते वर्षों में धार्मिक जुलूसों के दौरान हिंसा, पथराव, आगजनी और सांप्रदायिक तनाव की घटनाओं में चिंताजनक बढ़ोतरी हुई है। कई शहरों में त्योहारों और शोभायात्राओं के नाम पर सड़कों पर शक्ति प्रदर्शन ने सामाजिक सौहार्द को गंभीर चोट पहुंचाई है। धर्म जब निजी आस्था से निकलकर सार्वजनिक शक्ति प्रदर्शन का माध्यम बन जाता है, तब वह भक्ति कम और राजनीतिक प्रदर्शन अधिक प्रतीत होता है। नतीजा—दंगे, जान-माल का नुकसान, और समाज में गहरी होती खाइयाँ।

इसीलिए अब समय आ गया है कि राज्य सभी धर्मों के सार्वजनिक जुलूसों और शोभायात्राओं के लिए कड़े, समान और निष्पक्ष नियम बनाए। जहां आवश्यक हो, संवेदनशील इलाकों में ऐसे जुलूसों पर प्रतिबंध लगाने से भी परहेज़ नहीं किया जाना चाहिए। कानून की नजर में कोई धर्म विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हो सकता। यह प्रतिबंध आस्था पर नहीं, अराजकता पर होगा; पूजा पर नहीं, प्रदर्शन पर होगा; धर्म पर नहीं, हिंसा की संभावनाओं पर होगा।

भारतीय संविधान सभी धर्मों को समान अधिकार देता है, लेकिन किसी को भी सार्वजनिक शांति भंग करने का लाइसेंस नहीं देता। धार्मिक स्वतंत्रता वहीं तक है, जहां से दूसरे नागरिक की स्वतंत्रता शुरू होती है। सुप्रीम कोर्ट का संदेश स्पष्ट है—मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा और चर्च सभी पूजनीय हैं, लेकिन सड़कें, बाजार और सार्वजनिक स्थल पूरे देश के हैं। उन्हें टकराव का मैदान नहीं बनने दिया जा सकता। अगर देश में शांति, कानून का राज और सांप्रदायिक सौहार्द बनाए रखना है, तो हर धर्म, हर संगठन और हर नागरिक को यह समझना होगा कि आस्था दिल में होनी चाहिए, सड़क पर नहीं।

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