“ग़ज़ा के 77 फीसद हिस्से पर अब इसराइली क़ब्ज़ा हो चुका है। हज़ारों घर मलबे में बदल गए हैं। 62 हज़ार से ज़्यादा लोग मारे जा चुके हैं… लेकिन मरने वालों की सही गिनती शायद कभी सामने ना आ सके क्योंकि हज़ारों लाशें अभी भी मलबे के नीचे दबी हुई हैं। 220 से ज़्यादा पत्रकार मारे गए हैं। ग़ज़ा में घर छोड़ना भी जुर्म बन गया है आज हालात ये हैं कि: जो घर में हैं, उन्हें बमों से मारा जा रहा है। जो घर छोड़ते हैं, उन्हें रास्ते में उड़ा दिया जाता है। और जिन्हें इज़राइल “सेफ ज़ोन” कहता है, वहां सबसे ज़्यादा हमले हो रहे हैं। ग़ज़ा अब वो जेल है, जहाँ कोई रास्ता बाहर नहीं, और अंदर बस मौत की गारंटी है। हर जगह सिर्फ़ तबाही। अस्पताल नहीं, पानी नहीं, बिजली नहीं — और जो राहत के ट्रक आने चाहिए थे…उनकी संख्या भी जानबूझकर सीमित रखी जा रही है।” “संयुक्त राष्ट्र खुद कह चुका है — ‘ग़ज़ा में हज़ारों परिवार भूख से मर रहे हैं, लेकिन इसराइल अब भी राहत रोक रहा है।’ “इज़राइल अब किसी सुरक्षा की खोज में नहीं, बल्कि फ़िलिस्तीनियों के सम्पूर्ण वजूद को मिटाने के मिशन पर है। यह महज़ एक सैन्य ऑपरेशन नहीं — यह एक योजनाबद्ध जनसंहार है। ये युद्ध नहीं है, ये बर्बरता है। एक ‘नस्लीय सफ़ाया’ है, इज़रायली हथियार कंपनियाँ आज दुनिया के मेले में गर्व से कह रही हैं: “बेस्ट इन क्लास – टेस्टेड ऑन ग़ज़ा” क्या इससे घिनौना कोई प्रचार हो सकता है? यानी ग़ज़ा में बच्चों की लाशों पर हथियारों की मार्केटिंग की जा रही है — और फिर भी फ्रांस जैसे देश चुप हैं? “दुनिया भर में अगर कोई और देश ये कर रहा होता —तो उसे आतंकवादी घोषित किया जा चुका होता। लेकिन यहाँ इज़राइल को खुली छूट मिली है —क्योंकि वो अमेरिका का दोस्त है।” “यही दोहरा मापदंड है। यही ‘ग्लोबल हिपोक्रेसी’ है।” जो अमेरिका हर बार मानवाधिकार की दुहाई देता है, वही आज इज़राइल को बम, हथियार और नैतिक समर्थन देकर नरसंहार का भागीदार बन चुका है। यूरोप की चुप्पी और दोहरा रवैया पूरी तरह बेनक़ाब है — यूक्रेन पर आँसू बहाने वाले फ़िलिस्तीन पर पत्थर हो जाते हैं। ग़ज़ा में अब तक हज़ारों बच्चे मारे जा चुके हैं। ये सिर्फ़ संख्या नहीं — ये आने वाली नस्लों का सफ़ाया है। संयुक्त राष्ट्र राहत और कार्य एजेंसी चीख रही है — लेकिन सिर्फ़ शब्दों में। “बच्चे भूखे हैं, बेघर हैं, मारे जा रहे हैं” — पर क्या किया जा रहा है? कुछ नहीं। क्यों? क्योंकि मरने वाले मुसलमान हैं। अगर यही मरने वाले हज़ारों बच्चे यूक्रेन, इज़राइल, या अमेरिका के होते, तो आज आसमान से फौजें उतर रही होतीं। यूएन की चेतावनियाँ, WHO की बयानबाज़ियाँ, सब खोखली लगती हैं, जब बम एक अस्पताल की छत पर गिरते हैं। क्या ये वही इंसानियत है जिसके नाम पर दुनिया तालिबान, ईरान और रूस पर प्रतिबंध लगाती है? और यह हर उस देश की परीक्षा है जो “मानवाधिकार” की बात करता है। पश्चिमी लोकतंत्रों, तुम्हारे दोहरे मानदंड मानवता को गाली हैं। जब इज़राइल की फौज हथियार लेकर अल-अक्सा मस्जिद में घुसती है और वहाँ अपने धार्मिक अनुष्ठान करती है, तो ये सिर्फ़ इमारत पर हमला नहीं होता। ये पूरे मुस्लिम समुदाय की इज्जत पर हमला होता है। उस जगह का नियम है कि सिर्फ मुसलमान ही वहाँ नमाज़ पढ़ सकते हैं, लेकिन अब वहाँ टैंक और फौज खड़ी है और ज़ायोनी लोग अपनी मनमानी कर रहे हैं। ये जो हुआ, वो सिर्फ़ फ़लस्तीनी मुसलमानों की अपमानना नहीं है, बल्कि हर मुसलमान के दिल को चोट पहुँचाने वाला काम है। ये हमला मुसलमानों की आस्था और अधिकारों पर ज़ोरदार वार है, जिसे दुनिया को देखना और रोकना ही होगा। तो फिर अरब बादशाहतें कहाँ हैं? जब ग़ज़ा की सड़कों पर मासूम बच्चों के जिस्म जल रहे हों, अस्पतालों पर बम बरसाए जा रहे हों, भूख से बिलखते लोग मलबे में अपने परिजनों की लाशें तलाश रहे हों — तब अगर कोई दुनिया चुप है, तो वह उतनी ही गुनहगार है जितना इज़राइल। “ये सिर्फ़ एक देश नहीं, एक पूरी कौम को मिटाने की कोशिश है। अगर आज आपने आवाज़ नहीं उठाई —तो कल इतिहास पूछेगा — अल्लाह पूछेगा, तुम कहाँ थे, जब ग़ज़ा जल रहा था?” लेकिन सबसे बड़ी गद्दारी आई है उन मुल्कों से, जिन्हें उम्मा (मुस्लिम जगत) का रहनुमा कहा जाता था। सऊदी अरब, यूएई, मिस्र, क़तर, तुर्की — सब के सब चुप हैं। कोई इज़राइल से तेल का व्यापार बंद नहीं करता, कोई राजदूत नहीं बुलाता, कोई अंतरराष्ट्रीय मंचों पर इज़राइल के खिलाफ़ एक भी कड़ा बयान नहीं देता। सऊदी अरब, जो खुद को “हरम की हिफ़ाज़त करने वाला” कहता है, वो यहूदियों से रिश्ते सामान्य कर रहा है, यूएई ने तो इज़राइली फौजों को अपने एयरबेस तक इस्तेमाल करने दिए हैं। सऊदी, यूएई, मिस्र, जोर्डन, तुर्की — सब इज़राइल से दोस्ती के लिए लाइन में खड़े हैं। जो अपने टीवी पर ग़ज़ा की तस्वीरें दिखाते हैं, वहीं पर्दे के पीछे इज़राइली राजदूतों से समझौते साइन कर रहे हैं। कहाँ गया तुम्हारा ईमान? कहाँ गई उम्मत की गैरत? जब यमन के हौथी मिसाइलों से जवाब दे सकते हैं, तो अरब की सबसे बड़ी फौजें तेल और एसी में क्यों पड़ी हैं? जब ज़मीर मर जाए, तब ही नरसंहार “राजनीति” बनती है और जो इसे रोक नहीं रहे, वे सब उतने ही दोषी हैं जितना इज़राइल। “आप जानते हैं सबसे बड़ा पाप क्या है?— खामोशी।अरब सरकारों, तुम्हारी चुप्पी गुनाह है। क्योंकि अगर आज ग़ज़ा मिटा, तो कल सऊदी अरब पर भी बम गिरेंगे — और तब चुप्पी के लिए कोई माफ़ी नहीं होगी।कब तक चुप रहोगे? अगर तुम्हारा ईमान मर चुका है, तो तुम्हारे बैंक अकाउंट, पेट्रोल और एसी तुम्हें नहीं बचाएंगे।क्या अब भी आप चुप रहेंगे? यह युद्ध अब सिर्फ़ फ़लस्तीनियों का नहीं है। यह हर उस इंसान का युद्ध है जो ज़ुल्म के खिलाफ़ खड़ा होना चाहता है। यह हर उस मुसलमान का इम्तेहान है जो कहता है “लाब्बैक या अल-अक्सा।” बहिष्कार कीजिए। आवाज़ उठाइए। इज़राइल के समर्थन में खड़े हर देश, ब्रांड और मीडिया संस्थान का पर्दाफाश कीजिए। बोलना पड़ेगा – ख़ामोशी इबादत नहीं, गुनाह है, मुसलमानों तुम्हारा बहिष्कार, तुम्हारी आवाज़, तुम्हारी दुआ — अब सिर्फ़ विकल्प नहीं, फर्ज़ है। ग़ज़ा अकेला नहीं है — लेकिन क्या तुम उसके साथ हो? अगर हां तो फिलस्तीन के समर्थन में हमारी ये आवाज़ हर मुसलमान तक पहुंचाओ और विशेषकर आपके कोई रिश्तेदार या दोस्त अहबाब अरब देशों में रहते हों तो उन तक पहुंचाना न भूलो- फ्री फिलिस्तीन
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