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Home»विदेश

भारत ने फ़लस्तीन का दिया मज़बूत साथ, नेतन्याहू के तेवर सख़्त – क्या बदल रहा है मध्य-पूर्व समीकरण?

adminBy adminSeptember 16, 2025 विदेश No Comments5 Mins Read
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“UNGA voting Palestine independence India support Israel America oppose”
“Palestine ko azad rashtra ka darja – UN me bharat ne diya support, Israel-America ka virodh”
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संयुक्त राष्ट्र महासभा में शुक्रवार को हुआ मतदान पूरी दुनिया की राजनीति में एक नया मोड़ लेकर आया है। 142 देशों ने मिलकर फ़लस्तीन को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा देने वाले प्रस्ताव के पक्ष में वोट दिया। विरोध करने वालों की संख्या सिर्फ़ 10 थी, जबकि 12 देश वोटिंग से दूर रहे। इस प्रस्ताव को “न्यूयॉर्क घोषणापत्र” कहा गया है और इसे लेकर पूरी दुनिया में भूचाल आ गया है। विरोध करने वाले 10 देश (विरुद्ध)

1.  इजराइल

2. संयुक्त राज्य अमेरिका

3. अर्जेंटीना

4. हंगरी

5. माइक्रोनेशिया

6. नाउरू

7. पलाउ

8. पापुआ न्यू गिनी

9. परागुआ

10. टोंगा

मतदान से दूर रहने वाले 12 देश (मतदान से परहेज)

1. चेक गणराज्य

2. कैमरून

3. कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य

4. इक्वाडोर

5. इथियोपिया

6.  अल्बानिया

7. फ़िजी

8. ग्वाटेमाला

9. समोआ

10. उत्तरी मैसेडोनिया

11. मोल्दोवा

12. दक्षिण सूडान

भारत ने इस प्रस्ताव का समर्थन करके एक बार फिर साफ़ कर दिया है कि वह दशकों पुरानी अपनी विदेश नीति से पीछे नहीं हटेगा। भारत न केवल फ़लस्तीन की आज़ादी और संप्रभुता का हिमायती है, बल्कि उसने खुले मंच पर दिखा दिया कि इज़राइल से गहरे सामरिक और रक्षा संबंध होने के बावजूद वह फ़लस्तीन के न्यायपूर्ण अधिकार की अनदेखी नहीं कर सकता।

नेतन्याहू का ऐलान – “फ़लस्तीनी राष्ट्र कभी नहीं बनेगा” मतदान से ठीक पहले इज़राइल के प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने वेस्ट बैंक की अदुमीम बस्ती में दौरे के दौरान चौंकाने वाला बयान दिया। उसने कहा –“फ़लस्तीनी राष्ट्र कभी नहीं बनेगा, यह ज़मीन हमारी है।” इस बयान के साथ ही उसने बस्तियों के विस्तार की विवादित योजना पर हस्ताक्षर भी कर दिए। यानी वह इलाक़ा जिस पर फ़लस्तीनियों का दावा है, अब वहाँ नई यहूदी बस्तियाँ बसाई जाएंगी। यह ऐलान सीधे तौर पर दो-राष्ट्र समाधान को चुनौती देता है।

भारत का कूटनीतिक संतुलन:- भारत का रुख़ यहाँ बेहद अहम है।

भारत ने 1974 में फ़लस्तीन मुक्ति संगठन (PLO) को मान्यता देने वाला पहला गैर-अरब देश बनकर इतिहास रचा था।

1988 में भारत उन पहले देशों में था जिसने फ़लस्तीनी राष्ट्र को मान्यता दी।

मोदी सरकार के दौर में भी फ़रवरी 2018 में प्रधानमंत्री मोदी स्वयं फ़लस्तीन गए, और राष्ट्रपति महमूद अब्बास से मुलाक़ात कर यह भरोसा दिया कि भारत हमेशा फ़लस्तीनी लोगों के साथ खड़ा रहेगा। हालाँकि, भारत इज़राइल का भी एक अहम रक्षा सहयोगी है। मिसाइल टेक्नॉलॉजी से लेकर खुफ़िया जानकारी और साइबर सुरक्षा तक, दोनों देशों के रिश्ते बेहद गहरे हैं। इसके बावजूद भारत ने संयुक्त राष्ट्र में फिर एक बार खुलकर फ़लस्तीन के हक़ में वोट देकर यह संकेत दिया है कि इज़राइल की दोस्ती उसे न्याय से पीछे नहीं खींच सकती।

न्यूयॉर्क घोषणापत्र – दो-राष्ट्र समाधान की निर्णायक दस्तक। यह प्रस्ताव सिर्फ़ एक औपचारिक घोषणा नहीं है। इसमें कहा गया है कि: फ़लस्तीन और इज़राइल, दोनों को स्वतंत्र, लोकतांत्रिक और सुरक्षित राष्ट्र के रूप में अस्तित्व मिलना चाहिए।

यह प्रक्रिया ठोस, समयबद्ध और अपरिवर्तनीय होनी चाहिए। ग़ज़ा युद्ध को खत्म करने और शांति बहाली के लिए वैश्विक प्रयासों को तेज़ किया जाए। हमास को भविष्य के नेतृत्व से बाहर रखा जाए और सभी हथियार फ़लस्तीनी अथॉरिटी को सौंपे जाएँ।

संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने साफ़ कहा –“मध्य पूर्व में शांति के लिए दो-राष्ट्र समाधान ही मुख्य रास्ता है।”

अमेरिका और इज़राइल का विरोध:- मतदान में सिर्फ़ 10 देशों ने विरोध किया। इनमें सबसे अहम हैं – अमेरिका और इज़राइल। अमेरिका का रुख़ साफ़ है – वह हमास को आतंकवादी संगठन मानता है और किसी भी ऐसे प्रस्ताव का विरोध करता है जिसमें फ़लस्तीन को बिना शर्त राष्ट्र का दर्जा देने की बात हो। अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रुबियो अब जल्द ही इज़राइल जा रहे हैं ताकि इस मुद्दे पर चर्चा कर सकें।

इज़राइल के संयुक्त राष्ट्र दूत डैनी डैनन ने तो इस प्रस्ताव को “एकतरफ़ा और खोखला” बताया और कहा कि इससे असली शांति प्रक्रिया कमजोर होगी। उनका आरोप है कि यह हमास को 7 अक्तूबर के हमले का राजनीतिक फायदा देगा।

यूरोप और अरब देशों का दबाव:- इस बार दिलचस्प मोड़ यह है कि कई पश्चिमी देश जो अब तक चुप्पी साधे रहते थे, उन्होंने भी खुलकर समर्थन दिया। फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों पहले ही कह चुके हैं कि वे औपचारिक तौर पर फ़लस्तीन को राष्ट्र का दर्जा देंगे। नॉर्वे, स्पेन, आयरलैंड और यूके भी इस दिशा में बढ़ रहे हैं।

अरब लीग पहले ही इस प्रस्ताव को मंजूरी दे चुकी थी। यानी वैश्विक मंच पर अब इज़राइल और अमेरिका को कड़ी कूटनीतिक चुनौती मिल रही है।

भारत के लिए चुनौती और अवसर:- भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि वह अपने दोस्त इज़राइल और मित्र फ़लस्तीन दोनों के बीच संतुलन कैसे बनाए रखे। एक तरफ़ भारत को इज़राइल से रक्षा तकनीक और रणनीतिक सहयोग चाहिए। दूसरी तरफ़ अरब देशों और मुस्लिम दुनिया के साथ उसके ऐतिहासिक और ऊर्जा-संबंधी रिश्ते हैं। भारत की यही “रणनीतिक बहु-संतुलन नीति” उसकी सबसे बड़ी ताक़त भी है। फ़लस्तीन के समर्थन में वोट देकर भारत ने अरब देशों और ग़्लोबल साउथ के बीच अपनी साख मज़बूत की है।

संयुक्त राष्ट्र में हुए इस मतदान ने एक बार फिर दुनिया को दो हिस्सों में बाँट दिया है। एक तरफ़ अमेरिका और इज़राइल हैं जो फ़लस्तीन राष्ट्र की राह रोकना चाहते हैं। दूसरी तरफ़ भारत समेत 142 देश हैं जो मानते हैं कि बिना दो-राष्ट्र समाधान के मध्य पूर्व में स्थायी शांति असंभव है। भारत का यह क़दम न केवल उसकी ऐतिहासिक नीति का दोहराव है बल्कि आने वाले समय में उसके कूटनीतिक प्रभाव को और मज़बूत करेगा। सवाल यह है कि नेतन्याहू और अमेरिका की कड़ी आपत्ति के बावजूद क्या फ़लस्तीन को आखिरकार संयुक्त राष्ट्र की पूर्ण सदस्यता और स्वतंत्र राष्ट्र का दर्जा मिल पाएगा? अगर ऐसा हुआ, तो यह 21वीं सदी की सबसे बड़ी भू-राजनीतिक घटनाओं में गिना जाएगा।

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