दोस्तों गणतंत्र दिवस भारत का त्योहार है, लेकिन मुसलमानों के लिए इसे धीरे-धीरे इम्तिहान बनाया जा रहा है। छत्तीसगढ़ वक्फ बोर्ड का यह फ़रमान कि सभी मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों पर अनिवार्य रूप से तिरंगा फहराया जाए, असल में देशभक्ति नहीं, बल्कि संदेह की राजनीति का हिस्सा है। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
आपको बता दें कि देश की आज़ादी से लेकर आजतक देश के हर मदरसे में गल्ली से दिल्ली तक 15 अगस्त और 26 जनवरी को सिर्फ तिरंगा ही नहीं लहराया जाता बल्कि देश भक्ति पर आधारित कार्यकर्मों का आयोजन भी किया जाता है जबकि इन लाखों मदरसों को ऐसा करने का कोई सरकारी आदेश नहीं था बल्कि ये देश के प्रति मुहब्बत का जज़्बा और देश भक्ति की अलामत है उसके बावजूद मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों पर तिरंगा फहराने के इस आदेश का क्या मतलब है ? सवाल साफ़ है मुसलमान ही क्यों? हर बार मुसलमान ही क्यों? क्या देशभक्ति का ठेका सिर्फ़ मुसलमानों पर है?
अगर तिरंगा राष्ट्र की पहचान है, तो फिर आदेश सिर्फ़ मस्जिदों, मदरसों और दरगाहों के लिए ही क्यों जारी होता है? मंदिरों के लिए क्यों नहीं? हिंदुत्ववादी संगठनों के दफ़्तरों के लिए क्यों नहीं? संविधान को गाली देने वाले मंचों के लिए क्यों नहीं? या फिर यह मान लिया गया है कि हिंदू देशभक्त पैदा होता है और मुसलमान को साबित करना पड़ता है? तिरंगा अब प्यार नहीं, शक का औज़ार बन गया है आज मुसलमान से कहा जाता है “अगर देश से मोहब्बत है तो तिरंगा फहराओ” कल कहा जाएगा “नारा लगाओ” परसों कहा जाएगा “चुप रहो”
यह सिलसिला देशभक्ति का नहीं, आज्ञाकारिता (obedience) का है।
संविधान बदलने वालों से कोई सवाल नहीं
यह देश देख रहा है कि संविधान बदलने की बातें खुलेआम होती हैं, मनुस्मृति लाने के नारे लगते हैं, धर्मनिरपेक्षता को ‘गलती’ बताया जाता है, लेकिन न तो उनके ख़िलाफ़ फ़रमान निकलता है, न उनके दफ़्तरों पर तिरंगा अनिवार्य होता है। क्यों? क्योंकि असली निशाना संविधान के दुश्मन नहीं, संविधान पर भरोसा करने वाले मुसलमान हैं।
“तिरंगे के खिलाफ़ है तो देशद्रोही है” यह फैसला कौन करेगा? वक्फ बोर्ड अध्यक्ष का यह बयान कि “जो तिरंगा नहीं फहराता, उसे देश में रहने का हक़ नहीं”यह बयान सिर्फ़ ग़ैर-ज़िम्मेदाराना नहीं, ख़तरनाक है। देश में रहने का हक़ किसी भाजपाई मौलवी से नहीं, किसी नेता से नहीं, किसी बोर्ड से नहीं बल्कि संविधान से मिलता है। और संविधान कहीं नहीं कहता कि “तिरंगा फहराओ वरना देश छोड़ो।
अगर ऐसा है तो 70 साल तक आरएसएस के मुख्यालय पे तिरंगा नहीं लहराया गया ,क्या यह हिंदुत्व को खुश करने की कोशिश है? कड़वी सच्चाई यह है कि यह फ़रमान हिंदुत्ववादियों को यह कहने का मौका देता है कि “देखो, हमने दबाव डाला तो मुसलमान झुक गए ” यह आदेश मुसलमानों की हिफ़ाज़त नहीं करता, उनकी निगरानी करता है। यह नफ़रत को रोकता नहीं, उसे वैधता देता है। मुसलमानों को देशभक्त होने का तमगा नहीं चाहिए, भारत का मुसलमान किसी सर्टिफ़िकेट का मोहताज नहीं, किसी फ़रमान का गुलाम नहीं, किसी धमकी से देशभक्त नहीं बनेगा, वह पहले भी इस देश का था, आज भी है, और हमेशा रहेगा।
आख़िरी सवाल- अगर तिरंगा सच में सबका है, तो उसे सब पर बराबर लागू करो। वरना यह मान लिया जाएगा कि यह देशभक्ति नहीं, एक समुदाय को झुकाने की राजनीति है। और याद रखिए जो देशभक्ति डर से करवाई जाए, वह एकता नहीं, गुलामी पैदा करती है।