ग़ज़ा सिटी इन दिनों फिर से आग और धुएं में घिरा हुआ है। शनिवार को इसराइल ने ग़ज़ा की दूसरी सबसे ऊंची इमारत, सुसी टावर को जमींदोज़ कर दिया। यह लगातार दूसरा दिन था जब ग़ज़ा की ऊंची-ऊंची इमारतें ढहाकर मलबे में बदल दी गईं। शुक्रवार को मुश्तहा टावर को निशाना बनाया गया था और अब सुसी टावर भी मलबे में तब्दील। सवाल यह है कि क्या इसराइल की यह रणनीति ग़ज़ा को सिर्फ़ खंडहर बनाने की है?
इसराइल का दावा बनाम हमास का इनकार:- इसराइल डिफ़ेंस फ़ोर्स (IDF) का दावा है कि हमास इन टावरों का इस्तेमाल सैन्य गतिविधियों के लिए कर रहा था, लेकिन हमास ने इस आरोप को पूरी तरह ख़ारिज किया।
अगर मान भी लें कि किसी इमारत का इस्तेमाल किया जा रहा था, तो क्या पूरा टावर उड़ाना ही एकमात्र जवाब है?
ये सवाल दुनिया भर के मानवाधिकार संगठनों और अंतर्राष्ट्रीय समुदाय के सामने खड़ा है।
युद्ध से पहले चेतावनी या मनोवैज्ञानिक दबाव?:- हमले से पहले इसराइल ने ग़ज़ा के निवासियों पर पर्चे गिराए, जिनमें उन्हें ‘मानवीय क्षेत्र’ की ओर जाने की अपील की गई थी। लेकिन ग़ज़ा जैसे घनी आबादी वाले इलाके में लाखों लोगों को ‘एक सुरक्षित ज़ोन’ की ओर धकेलना क्या व्यावहारिक है या यह महज़ मनोवैज्ञानिक युद्धनीति है?
क्या ये सिर्फ़ इमारतें गिराना है या लोकतंत्र और इंसानियत की नींव हिलाना?
इमारतें ढह रही हैं, लेकिन साथ ही ढह रहे हैं ग़ज़ा के नागरिकों के सपने और ज़िंदगी। एक-एक टावर सिर्फ़ सीमेंट और ईंटों का ढेर नहीं, बल्कि उसमें बसे परिवारों का भविष्य और उम्मीदें थीं।
ग़ज़ा का आसमान अब सिर्फ़ धुएं से नहीं, बल्कि इंसानियत के सवालों से भी घिरा हुआ है।
अंतरराष्ट्रीय राजनीति की खामोशी:- सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतनी बड़ी तबाही के बावजूद अंतर्राष्ट्रीय राजनीति क्यों खामोश है? क्या ग़ज़ा के बच्चों की चीखें, खंडहरों में दबे बुज़ुर्गों की कराह और बेघर परिवारों की बेबसी दुनिया की ताक़तवर कुर्सियों तक नहीं पहुँचती?
नतीजा:- ग़ज़ा की ऊंची इमारतें सिर्फ़ पत्थर नहीं थीं — वे इस पूरे इलाके के खड़े होने की पहचान थीं। अब वे राख हो चुकी हैं और इसके पीछे छिपे सवाल हर उस इंसान से जवाब मांग रहे हैं जो इंसानियत में विश्वास करता है।
क्या इमारतें ही असली दुश्मन हैं? या असली लड़ाई सत्ता, राजनीति और कब्ज़े की हवस की है?