जब मुल्क संविधान और क़ानून से नहीं, बल्कि व्हाट्सएप ग्रुप और दक्षिणपंथी संगठनों की धमकियों से चलने लगे, तो समझ लीजिए कि लोकतंत्र खतरनाक मोड़ पर पहुंच चुका है। महाराष्ट्र के पुणे जिले के पौड़ और पिरंगुट गांवों में मुसलमानों के खिलाफ जो कुछ हुआ है, वो सिर्फ़ ‘बहिष्कार’ नहीं है, बल्कि यह एक सुनियोजित और संगठित सांप्रदायिक सफ़ाया अभियान का ट्रेलर है — जिसकी पटकथा लिखी गई है आरएसएस की लैब में, और मंज़ूरी मिली है महाराष्ट्र की सत्ता में बैठे तथाकथित ‘सेक्युलर’ नेताओं की चुप्पी से।
बाहरी मुसलमान’ कौन? क्या संविधान उन्हें नागरिक नहीं मानता? 40 सालों से बेकरी चला रहे रोशन बेकरी के मालिक को सिर्फ इसलिए धमकाया गया क्योंकि उनके पिता उत्तर प्रदेश से थे! सवाल ये है कि क्या महाराष्ट्र अब किसी मुसलमान के लिए ‘दूसरा देश’ हो गया है? क्या अब बेकरी, चिकन सेंटर, कबाड़ी दुकान, नाई की दुकान — सब ‘देशभक्ति’ के नए पैमाने हो गए हैं?
दुकान खोली तो अंजाम भुगतोगे” — ये धमकी कोई सड़कछाप गुंडा नहीं, बल्कि हिन्दू राष्ट्र सेना और उसके समर्थकों के जरिए खुलेआम दी गई। लेकिन महाराष्ट्र की सरकार कहां है? अजित पवार की एनसीपी, जो खुद को शरद पवार की विरासत की वाहक कहती है, और एकनाथ शिंदे की शिवसेना, जो अब बीजेपी की गोदी में बैठी है — क्या इन दोनों की सरकार सिर्फ सत्ता की मलाई खाने आई है?
राज्य की भूमिका: चुप्पी = सहमति?:- जब एक बेकरी बंद होती है, तो सिर्फ एक दुकान नहीं बंद होती, बल्कि 400 मज़दूरों की रोज़ी-रोटी छिनती है। इनमें हिंदू भी हैं और मुसलमान भी। जब मस्जिदों के बाहर पोस्टर लगाए जाते हैं कि “नमाज़ सिर्फ स्थानीय मुसलमान ही पढ़ें”, तो ये न सिर्फ धार्मिक स्वतंत्रता पर हमला है, बल्कि भारत के संविधान की आत्मा को चीर देने वाली हरकत है। लेकिन महाराष्ट्र पुलिस क्या करती है? कुछ पोस्टर हटा लिए जाते हैं, और पुलिस प्रेस में कहती है — “हालात काबू में हैं।” सवाल ये है कि जब दुकानें बंद हैं, जब लोग गांव छोड़ रहे हैं, जब बच्चों की पढ़ाई छूट रही है, जब मेडिकल स्टोर पर जाने पर तस्वीर खींचकर वॉट्सऐप ग्रुप में भेजी जाती है — तो ये कौन सा काबू है?
धनंजय देसाई: फिर वही चेहरा, फिर वही नफ़रत:- 2014 में आईटी प्रोफेशनल मोहसिन शेख की हत्या के मामले में आरोपी रह चुका धनंजय देसाई एक बार फिर इन धमकियों के पीछे प्रमुख चेहरा बताया जा रहा है। वो आज फरार है, लेकिन उसका विचार ज़हर की तरह गांव-गांव फैल रहा है। सवाल उठता है कि अगर कोई मुसलमान इस तरह का कोई बयान देता, तो क्या अब तक उसका घर बुलडोज़र से नहीं गिरा दिया गया होता?
गांव की संस्कृति को किसने बर्बाद किया?:- पिरंगुट के पूर्व कांग्रेस अध्यक्ष अशोक मात्रे कहते हैं, “मुलशी की गंगा-जमुनी तहज़ीब को आरएसएस और हिंदू राष्ट्र सेना ने बर्बाद किया।” ये बयान बहुत कुछ कहता है। क्योंकि ये गांव पहले वो जगह था, जहां मुसलमान हरिनाम सप्ताह में हिस्सा लेते थे। अब ये वो गांव बन गया है, जहां मस्जिद जाने से भी डर लगता है।
सरकार की चुप्पी = सांप्रदायिकता की सहमति?:- महाराष्ट्र सरकार इस वक्त भाजपा, अजित पवार की एनसीपी और शिंदे की शिवसेना के गठबंधन से चल रही है। लेकिन इस गठबंधन ने अगर पुणे के गांवों में नफ़रत के इस विस्फोट को अनदेखा किया, तो यह सिर्फ़ चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि साफ-साफ सांप्रदायिक पक्षपात है। क्या अजित पवार सिर्फ़ मुख्यमंत्री की कुर्सी की दौड़ में ही व्यस्त रहेंगे, या फिर महाराष्ट्र के मुसलमानों की सुरक्षा और सम्मान की भी ज़िम्मेदारी लेंगे?
संविधान के खिलाफ है बहिष्कार की राजनीति:- पीयूसीएल और एपीसीआर ने इसे ‘संविधान विरोधी’ करार दिया है और कानूनी कार्रवाई की तैयारी कर ली है। लेकिन सवाल ये है — जब तक कानून लागू होगा, तब तक कितने और परिवार उजड़ेंगे? कितने और बच्चे स्कूल छोड़ देंगे? कितनी और दुकानें बंद होंगी? कितने और लोग ‘गैर स्थानीय’ करार देकर गांवों से खदेड़े जाएंगे?
अंतिम सवाल:- क्या मुसलमान अब सिर्फ वोट बैंक हैं या इंसान भी? जब मुसलमानों की दुकानों पर ताले लगते हैं, तो वो सिर्फ एक मज़हब की हार नहीं होती — वो भारत के आत्मा की हार होती है। जो लोग आज चुप हैं, वे भूल न जाएं कि जब सांप्रदायिकता की आग फैलती है, तो वो मज़हब देखकर नहीं जलाती।
ये लेख एक चेतावनी है — महाराष्ट्र सरकार, पुलिस प्रशासन और नागरिक समाज के लिए भी। अगर अभी नहीं चेते, तो कल ये आग सिर्फ पौड़ और पिरंगुट नहीं, पूरे राज्य और देश को लील जाएगी। क्या आप चुप रहेंगे? या आवाज़ उठाएंगे?