दुनिया चौंक रही है, लेकिन इतिहास मुस्कुरा रहा है। जिस अफ़ग़ान ज़मीन को अमेरिका ने 20 साल तक रौंदा, उसे आज रूस ने एक बराबर राष्ट्र की तरह मान्यता दी है।”रूस का साहसिक ऐलान: अफ़ग़ानिस्तान की संप्रभुता को सलाम:- रूस ने तालिबान के नेतृत्व वाले अफ़ग़ान इस्लामी अमीरात को औपचारिक मान्यता देकर न सिर्फ एक नया कूटनीतिक अध्याय शुरू किया है, बल्कि पश्चिमी वर्चस्ववादी मानसिकता को सीधी चुनौती भी दी है। काबुल में रूसी राजदूत दिमित्री ज़िरनोव ने अफग़ान विदेश मंत्री आमिर ख़ान मुत्ताक़ी को जब यह संदेश सौंपा, तो सिर्फ एक देश ने नहीं, पूरे ग्लोबल साउथ ने तालियां बजाईं। यह बदलाव अन्य देशों के लिए एक उदाहरण बनेगा” – मुत्ताक़ी। और क्यों न बने?
– क्या अफ़ग़ानिस्तान 20 साल तक अमेरिका का उपनिवेश था?
– क्या तालिबान से बेहतर थे वे ‘अमेरिकी पिट्ठू’ जो ड्रोन हमलों की अनुमति देते थे?
– क्या 2021 से पहले का अफ़ग़ानिस्तान वास्तव में लोकतांत्रिक था? तालिबान की आलोचना अपने स्थान पर, मगर सवाल अब यह है: क्या दुनिया को हर बार वही मानना पड़ेगा जिसे वॉशिंगटन मंज़ूरी दे? 20 साल की तबाही, और फिर ‘मान्यता न देने’ का दंभ?:- अमेरिका और उसके सहयोगियों ने 2001 से 2021 तक अफ़ग़ानिस्तान पर कब्ज़ा जमाए रखा लाखों आम अफ़ग़ानों की जान ली ड्रोन, ऑपरेशन और फेक चुनावों से पूरा समाज झुलसा दिया और जब निकलने की बारी आई —तो अफ़ग़ानिस्तान को तबाह करके, भूखा-प्यासा छोड़कर अमेरिका भाग गया। अब वही अमेरिका दुनिया से कहता है: तालिबान को मान्यता मत दो, ये मानवाधिकार नहीं मानते।”क्यों भाई? तो बगराम जेल में जिन पर अत्याचार किए गए, वो मानवाधिकार थे या “कोलैटरल डैमेज”?
रूस का फ़ैसला: भू-राजनीतिक नक्शे पर नया रंग:- रूस ने साफ किया: हम अफ़ग़ानिस्तान से ऊर्जा, कृषि, बुनियादी ढांचे और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग चाहते हैं। अब उन्हें आतंकवादी नहीं, सहयोगी मानते हैं।” 2022 में रूस ने ही अफ़ग़ानिस्तान को तेल, गैस, गेहूं की आपूर्ति का पहला समझौता किया था। 2024 में तालिबान को रूस की ‘आतंकी संगठनों की सूची’ से हटा दिया गया। और अब, आधिकारिक मान्यता। यह सिर्फ अफ़ग़ानिस्तान को मान्यता नहीं, बल्कि अमेरिकी वर्चस्व को अस्वीकार करने की घोषणा है। तालिबान को आलोचना से छूट नहीं, पर अमेरिका को छूट क्यों? हां, तालिबान के शासन में कई गंभीर समस्याएं हैं – महिलाओं की शिक्षा– प्रेस की स्वतंत्रता– राजनीतिक विरोध की जगह। मगर क्या अमेरिका के कब्जे में यह सब था? क्या सीआईए की काली जेलें “मानवाधिकार स्कूल” थीं? क्या काबुल पर गिरते बम “लोकतंत्र की रौशनी” थे? तालिबान को सवालों का सामना करना होगा, मगर अमेरिका को भी अपनी कब्रों का हिसाब देना होगा।
अफग़ान राष्ट्रवाद बनाम अमेरिकी साम्राज्यवाद:- तालिबान कोई देवदूत नहीं हैं। मगर वे अफग़ान राष्ट्रवाद की वह कट्टर अभिव्यक्ति हैं जो हर बाहरी कब्जे के खिलाफ उठती रही है। चाहे वो ब्रिटिश हों, सोवियत हों, या अमेरिकी। अब रूस का ये कदम उस संघर्ष को संवैधानिक दर्जा देता है –और पश्चिम को बताता है कि, “मान्यता कोई परमिशन नहीं होती, यह संप्रभुता की पहचान होती है।” एक खंडहर से उठते हुए मुल्क को सलाम। आज अफ़ग़ानिस्तान के पास पैसे नहीं, मगर स्वाभिमान है। आज वहां सपने नहीं, मगर संप्रभुता है। और इस नई यात्रा में रूस का साथ मिलना एक ऐतिहासिक मोड़ है। अमेरिका और उसके सहयोगियों से बस एक सवाल: 20 साल तक कब्जा कर, जब निकले तो अफ़ग़ानिस्तान को भिखारी बनाकर छोड़ा…अब जब वो खुद खड़ा हो रहा है, तो तुम्हें क्यों तकलीफ़ हो रही है?”