सय्यद मोईनुद्दीन बड़ेसाब (मुख्य संपादक)
भाग 1 — इतिहास के पन्नों में दबा सच:- भारत की आज़ादी की कहानी सिर्फ़ एक धर्म, जाति या भाषा की नहीं है — यह हर भारतीय की कुर्बानियों से लिखी गई है। लेकिन अफ़सोस, आज़ादी के कई सुनहरे पन्नों में मुसलमानों के योगदान को या तो छोटा करके दिखाया गया, या पूरी तरह भुला दिया गया।
1857 की पहली जंग-ए-आज़ादी में मुसलमानों की भूमिका निर्णायक थी।
मौलवी अहमदुल्लाह शाह को अंग्रेज़ “रामपुर का शेर” कहते थे — उन्होंने फ़ैज़ाबाद और शाहजहांपुर में अंग्रेज़ों को कड़ी टक्कर दी [1]।
बख़्त ख़ाँ, तोपख़ाने के माहिर, दिल्ली में बगावत की सैन्य कमान संभालते रहे [2]।
बेग़म हज़रत महल ने लखनऊ में अंग्रेज़ों के खिलाफ़ मोर्चा खोला और अंत तक आत्मसमर्पण नहीं किया [3]।
क्रांतिकारी आंदोलन में भी मुसलमान पीछे नहीं रहे।
अशफ़ाक़ुल्ला ख़ाँ — काकोरी कांड के लिए फांसी चढ़ते समय उन्होंने कहा, “मेरी आखिरी ख्वाहिश है कि मुझे तिरंगे में लपेटा जाए” [4]।
सैफ़ुद्दीन किचलू, जलियांवाला बाग़ आंदोलन में अहम चेहरा रहे [5]।
ख़िलाफ़त आंदोलन (1919-1924) ने हिंदू-मुस्लिम एकता को नई मज़बूती दी, जिसे महात्मा गांधी ने भी समर्थन दिया। इसमें मौलाना अबुल कलाम आज़ाद की भूमिका ऐतिहासिक रही [6]।
जलियांवाला बाग़ में शहीद हुए कई सौ लोगों में बड़ी संख्या मुसलमानों की थी — लेकिन आज स्कूल की किताबों में यह तथ्य मुश्किल से मिलता है [7]।
भाग 2 — आज़ादी के बाद की कुर्बानियां:- आज़ादी के बाद भी मुसलमानों ने देश की रक्षा में जान दी। ब्रिगेडियर मोहम्मद उस्मान, जिन्हें “नौशेरा का शेर” कहा जाता है, 1947-48 के कश्मीर युद्ध में शहीद हुए और मरणोपरांत महावीर चक्र मिला [8]।
अब्दुल हमीद, 1965 की भारत-पाकिस्तान जंग में अकेले कई पाकिस्तानी टैंक तबाह करने के लिए परमवीर चक्र से सम्मानित हुए [9]।
कैप्टन हनीफ़ुद्दीन, कारगिल युद्ध में शहीद, जिनका शव पाकिस्तान ने भी सम्मान के साथ लौटाया [10]।
इसके अलावा, विज्ञान में ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, साहित्य में राही मासूम रज़ा, खेल में मोहम्मद अजहरुद्दीन और कई अन्य ने देश का नाम रोशन किया।
भाग 3 — कुर्बानियों के बावजूद शक और अत्याचार:- इतिहास के इन सुनहरे पन्नों के बावजूद, आज मुसलमानों पर शक की छाया गहरी की जा रही है।
मॉब लिंचिंग: अख़लाक़ (दादरी), पहलू ख़ान (राजस्थान), तबरेज़ अंसारी (झारखंड) जैसे मामलों ने दुनिया भर में भारत की छवि को धक्का पहुंचाया [11]।
राजनीतिक और कानूनी दबाव: CAA-NRC को लेकर मुसलमानों को “घुसपैठिया” कहा गया, और बुलडोज़र कार्रवाई का इस्तेमाल अक्सर मुस्लिम इलाकों पर केंद्रित रहा [12]।
मीडिया नैरेटिव: “देशभक्त मुसलमान” जैसी अभिव्यक्ति खुद इस बात का सबूत है कि उन्हें देशभक्ति का प्रमाणपत्र देने वाला माहौल बनाया गया है।
Pew Research (2021) के अनुसार, 80% भारतीय मुसलमान मानते हैं कि उनके साथ भेदभाव होता है [13]।
सच्चर कमेटी रिपोर्ट (2006) ने दिखाया कि शिक्षा, रोज़गार और राजनीति में मुसलमान देश के सबसे पिछड़े समुदायों में से हैं [14]।
भाग 4 — मांस प्रतिबंध विवाद और सच्चाई:- स्वतंत्रता दिवस पर महाराष्ट्र, तेलंगाना और कई जगहों पर मांस बिक्री पर प्रतिबंध लगाया गया। इसे कुछ लोग “संस्कृति” के नाम पर सही ठहराते हैं, लेकिन सरकारी आंकड़े कुछ और कहते हैं।
NSSO 2011-12 और NFHS-5 (2019-21) के अनुसार: भारत की 70-80% आबादी मांसाहारी है [15]।
मांस खाने वालों में हिंदुओं की संख्या मुसलमानों से ज़्यादा है, क्योंकि हिंदू जनसंख्या 80% से अधिक है [16]।
कई हिंदू समुदाय (अगरी, कोली, गोआ, पूर्वोत्तर के जनजातीय) रोज़ मांस खाते हैं।
यानी मांस बंद करने का सीधा असर सिर्फ़ मुसलमानों पर नहीं, बल्कि करोड़ों हिंदू मांसाहारियों पर भी पड़ता है।
भाग 5 —आज़ादी का मतलब सिर्फ़ झंडा फहराना और राष्ट्रगान गाना नहीं — बल्कि हर नागरिक की व्यक्तिगत स्वतंत्रता की रक्षा करना है। जब वही देश, जिसके लिए मुसलमानों ने अपना खून बहाया, आज उन्हें शक की नज़रों से देखता है, तो यह अन्याय ही नहीं, बल्कि इतिहास के साथ धोखा है। तिरंगा किसी एक धर्म का नहीं — यह हर भारतीय की आज़ादी का प्रतीक है। और जो लोग 15 अगस्त के दिन लोगों की थाली पर ताला लगाना चाहते हैं, उन्हें याद रखना चाहिए — तिरंगा हर तरह की स्वतंत्रता के लिए लहरता है, जिसमें खाने की स्वतंत्रता भी शामिल है।
संदर्भ (References)
[1] Rudrangshu Mukherjee, Awadh in Revolt 1857-58: A Study of Popular Resistance, OUP India, 2002.
[2] William Dalrymple, The Last Mughal, Penguin, 2006.
[3] Rosie Llewellyn-Jones, The Last King in India, Oxford University Press, 2014.
[4] “Kakori Train Robbery 1925”, National Archives of India.
[5] Amar Farooqui, Jallianwala Bagh: An Empire of Fear and the Making of the Amritsar Massacre, Penguin, 2019.
[6] Gail Minault, The Khilafat Movement: Religious Symbolism and Political Mobilization in India, Columbia University Press, 1982.
[7] Government of India, List of Martyrs, Jallianwala Bagh Memorial.
[8] “Brigadier Mohammad Usman Biography”, Ministry of Defence, India.
[9] “PVC Abdul Hamid Gallantry Awards Citation”, Indian Army Archives.
[10] “Capt. Hanifuddin Martyr Story”, Kargil War Memorial Records.
[11] Human Rights Watch, Violent Cow Protection in India, 2019.
[12] Amnesty International India, Targeted Demolitions and Human Rights, 2022.
[13] Pew Research Center, Religion in India: Tolerance and Segregation, 2021.
[14] Government of India, Sachar Committee Report, 2006.
[15] National Sample Survey Office (NSSO) 68th Round, 2011-12.
[16] National Family Health Survey (NFHS-5), Ministry of Health and Family Welfare, 2