पश्चिम बंगाल की राजनीति एक बार फिर उथल-पुथल के दौर से गुजर रही है। विधानसभा चुनाव में तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) की हार के बाद जिस तरह पार्टी के भीतर असंतोष, नेताओं पर हमले, विधायकों की बर्खास्तगी और राजनीतिक खींचतान सामने आ रही है, उसने यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या बंगाल की सबसे बड़ी क्षेत्रीय पार्टी किसी बड़े संकट की ओर बढ़ रही है। अभिषेक बनर्जी पर अंडे फेंके जाने की घटना हो, सांसद कल्याण बनर्जी द्वारा खुद पर हमले का दावा हो या फिर पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में दो विधायकों को निष्कासित करने का फैसला। एलान के व्हॉट्सऐप चैनल से जुड़ने के लिए यहाँ क्लिक करें
इन सभी घटनाओं ने यह संकेत दिया है कि टीएमसी के भीतर सब कुछ सामान्य नहीं है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि टीएमसी की सबसे बड़ी ताकत हमेशा ममता बनर्जी की लोकप्रियता रही है। पार्टी किसी वैचारिक ढांचे से ज्यादा ममता बनर्जी के नेतृत्व और जनाधार पर खड़ी रही। लेकिन चुनावी हार के बाद पहली बार पार्टी के भीतर नेतृत्व, संगठन और उत्तराधिकार को लेकर सवाल खुलकर सामने आने लगे हैं।
विधानसभा के कथित फर्जी हस्ताक्षर विवाद में जिन दो विधायकों ने शिकायत की थी, उन्हें पार्टी से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। इससे यह धारणा भी बनी कि टीएमसी के भीतर असहमति के लिए जगह लगातार कम होती जा रही है। दूसरी ओर, पार्टी से निकाले गए नेताओं का आरोप है कि वे केवल कथित अनियमितताओं को उजागर कर रहे थे।
बंगाल की राजनीति में यह संकट केवल एक पार्टी का आंतरिक मामला नहीं है। यह उस बड़े राजनीतिक बदलाव का हिस्सा है जिसमें क्षेत्रीय दल लगातार दबाव महसूस कर रहे हैं। पिछले एक दशक में देश के कई राज्यों में यह देखा गया है कि चुनावी हार के बाद विपक्षी दलों के विधायक, सांसद और प्रभावशाली नेता बड़ी संख्या में सत्ताधारी दलों की ओर जाते रहे हैं। महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, गोवा, असम, कर्नाटक और कई अन्य राज्यों में ऐसे राजनीतिक घटनाक्रम सामने आए हैं, जिनके बाद विपक्षी दलों ने आरोप लगाया कि लोकतांत्रिक जनादेश को तोड़ने और निर्वाचित प्रतिनिधियों को अपने पक्ष में करने की कोशिश की गई।
भाजपा इन आरोपों को खारिज करती रही है और उसका कहना है कि दूसरे दलों के नेता स्वेच्छा से उसकी नीतियों और नेतृत्व में विश्वास जताकर पार्टी में शामिल होते हैं। वहीं विपक्ष का आरोप है कि केंद्रीय एजेंसियों के दबाव, राजनीतिक प्रभाव और सत्ता के आकर्षण के जरिए विपक्षी दलों को कमजोर किया जाता है। सच्चाई चाहे जो भी हो, लेकिन यह तथ्य है कि भारतीय राजनीति में दल-बदल पहले से कहीं अधिक सामान्य होता जा रहा है।
बंगाल के मौजूदा घटनाक्रम को भी इसी संदर्भ में देखा जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा फिलहाल टीएमसी के असंतुष्ट नेताओं पर नजर बनाए हुए है। कई रिपोर्टों में यह दावा किया गया है कि यदि बड़ी संख्या में विधायक अलग होकर कोई नया समूह बनाते हैं, तो उन्हें बाहरी समर्थन दिया जा सकता है। हालांकि अभी तक ऐसी किसी संभावना की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या टीएमसी वास्तव में टूट जाएगी? फिलहाल इसके स्पष्ट संकेत नहीं हैं। ममता बनर्जी अभी भी पार्टी का सबसे बड़ा चेहरा हैं और उनके पास पर्याप्त विधायक तथा सांसद मौजूद हैं।
लेकिन यह भी सच है कि चुनावी हार के बाद पैदा हुआ असंतोष यदि बढ़ता है, तो पार्टी को लंबे समय तक आंतरिक चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। बंगाल की राजनीति का इतिहास बताता है कि सत्ता परिवर्तन के साथ राजनीतिक निष्ठाएं भी तेजी से बदलती रही हैं। कभी वाम मोर्चा का मजबूत किला माने जाने वाले राज्य में टीएमसी ने उभार दर्ज किया और अब भाजपा राज्य की प्रमुख शक्ति बन चुकी है। ऐसे में टीएमसी के सामने सबसे बड़ी चुनौती केवल भाजपा नहीं, बल्कि अपने संगठन को एकजुट बनाए रखना है।
आज का बंगाल केवल एक राज्य का राजनीतिक संकट नहीं, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के उस दौर का प्रतिबिंब है जहां चुनावी राजनीति के साथ-साथ दल-बदल, राजनीतिक पुनर्संरेखण और सत्ता की नई समीकरणें लोकतांत्रिक व्यवस्था को लगातार नया आकार दे रही हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि टीएमसी इस संकट से उबर पाती है या बंगाल एक और बड़े राजनीतिक पुनर्गठन का गवाह बनने जा रहा है।
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