यरुशलम का अल-अक्सा मस्जिद परिसर — सदियों से आस्था, संघर्ष और संधियों का केंद्र। लेकिन हाल ही में इसराइल के कट्टरपंथी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री इतेमार बेन-ग्विर की इस स्थल पर ‘प्रार्थना यात्रा’ ने एक बार फिर वो ख़ौफ़ जगा दिया है जिसे फ़लस्तीनी दशकों से महसूस कर रहे हैं:”क्या अल-अक्सा अगला निशाना है?”
‘यात्रा’ या ‘घोषित अतिक्रमण’?:- बेन-ग्विर की इस यात्रा को सिर्फ़ एक धार्मिक ‘अधिकार’ के रूप में पेश किया जा रहा है, लेकिन तस्वीरें कुछ और कहती हैं: उन्होंने वहां यहूदी प्रार्थना सभा का नेतृत्व किया — जो दशकों पुरानी उस व्यवस्था का सीधा उल्लंघन है जिसके तहत यहूदियों को परिसर में तो जाने दिया जाता है, लेकिन प्रार्थना करने की मनाही है। उनका वहां जाना किसी निजी श्रद्धा का मामला नहीं, बल्कि एक राजनैतिक और सामरिक प्रदर्शन था — जो यह बताता है कि इसराइल अब यथास्थिति की आड़ में नई ज़मीन हड़पने को तैयार है।
यथास्थिति का ढहता भ्रम:- 1967 के युद्ध के बाद बनी व्यवस्था के तहत: अल-अक्सा का धार्मिक संरक्षण जॉर्डन के पास है। लेकिन सुरक्षा और नियंत्रण इज़राइल के हाथों में है। यह संतुलन ही एक नाज़ुक शांति का आधार था। अब जब एक मंत्री — और वो भी राष्ट्रीय सुरक्षा मंत्री — खुलेआम इस समझौते को लांघता है, तो क्या इसे महज़ ‘व्यक्तिगत आस्था’ कहा जा सकता है?
क्या इज़राइल की नीयत अब और स्पष्ट हो गई है?:- इस घटना को इज़राइल की ‘आक्रामक चुप्पी’ ने और भी खतरनाक बना दिया: प्रधानमंत्री कार्यालय कहता है: “हमारी यथास्थिति की नीति में कोई बदलाव नहीं” — लेकिन मंत्री का आचरण इसका उल्टा साबित करता है। इतेमार बेन-ग्विर वही नेता हैं जो पहले भी कह चुके हैं: “हमें टेंपल माउंट पर यहूदी संप्रभुता स्थापित करनी चाहिए।” क्या यह सिर्फ़ धार्मिक उन्माद है, या सरकार के समर्थन से की जा रही रणनीतिक जमीनबंदी?
मुस्लिम जगत में गूंजते अलार्म: उकसावे की नई लहर:- जॉर्डन ने इस दौरे को “ख़तरनाक उकसावा” कहा। हमास का बयान था — “यह फ़लस्तीनी अस्मिता पर हमला है।” फिलिस्तीनी अथॉरिटी के राष्ट्रपति कार्यालय ने तीखी प्रतिक्रिया दी — “यह सब सीमाएं पार कर चुका है।” क्योंकि अल-अक्सा मुसलमानों के लिए मक्का और मदीना के बाद तीसरा सबसे पवित्र स्थल है — और वहां यहूदी प्रार्थना सिर्फ़ आस्था नहीं, कब्ज़े का ऐलान मानी जाती है।
इतिहास दोहराया जा रहा है, लेकिन तेज़ी से:-1948 में देश बना।1967 में अल-अक्सा पर क़ब्ज़ा किया गया, लेकिन यथास्थिति का वादा दिया गया।
2025 में: अब यथास्थिति तोड़ी जा रही है — धीरे, लेकिन सुनियोजित तरीक़े से।
क्या यह वही रणनीति है जो वेस्ट बैंक में बस्तियां बसाने के दौरान अपनाई गई थी?
— पहले धार्मिक दावा, फिर राजनीतिक दबाव, फिर सेना, फिर क़ब्ज़ा?
यह सिर्फ़ ‘मंत्री की यात्रा’ नहीं — यह एक टेस्ट केस है:- बेन-ग्विर की यात्रा इज़राइल की भविष्य की नीति का ‘प्रारंभिक ट्रेलर’ है। इसमें देखा जा रहा है कि दुनिया कितना विरोध करती है, मुस्लिम देश कितना बोलते हैं, और फिलिस्तीनी कितना सहते हैं।
अगर प्रतिक्रिया कमज़ोर रही, तो अगला क़दम होगा: “यहूदी प्रार्थना के लिए स्थायी जगह”, फिर “संयुक्त धार्मिक अधिकार”, फिर अंततः: ‘टेंपल माउंट पर यहूदी संप्रभुता’।
अब सवाल यह नहीं कि बेन-ग्विर क्यों गए — सवाल यह है कि क्या यह अल-अक्सा की आखिरी इज्ज़त थी? क्योंकि यह एक राजनीतिक बम है — जिसकी आग आस्था से नहीं, लालच और वर्चस्व की नीयत से निकली है।
ग़ज़ा पर पूरी तरह क़ब्ज़े की तैयारी: नेतन्याहू के प्रस्ताव से बंधकों की जान संकट में
इसराइल की आंतरिक राजनीति और ग़ज़ा में जारी युद्ध अब एक नए मोड़ पर पहुंच चुका है। इसराइली मीडिया के अनुसार प्रधानमंत्री बिन्यामिन नेतन्याहू ने सुरक्षा कैबिनेट में ग़ज़ा पट्टी पर पूरी तरह क़ब्ज़ा करने का प्रस्ताव रखा है। एक वरिष्ठ अधिकारी के हवाले से कहा गया कि “फ़ैसला हो चुका है” और सरकार अब हमास को हराने तथा ग़ज़ा पर सम्पूर्ण नियंत्रण की दिशा में बढ़ेगी। लेकिन यह प्रस्ताव केवल सैन्य योजना नहीं, बल्कि एक मानवीय संकट का खतरा भी पैदा कर रहा है। ग़ज़ा में अब भी दर्जनों बंधक फंसे हैं, जिनमें से लगभग 20 के जीवित होने की आशंका है। उनके परिवार इस प्रस्ताव से बुरी तरह विचलित हैं। उन्हें डर है कि क़ब्ज़े की कार्यवाही इन बंधकों की जान को खतरे में डाल सकती है। चौंकाने वाली बात यह है कि इस योजना का विरोध खुद इसराइली सेना के वरिष्ठ अधिकारियों में भी देखा जा रहा है। लेकिन नेतन्याहू के करीबी अधिकारी ने कहा कि “अगर यह योजना चीफ़ ऑफ़ स्टाफ को स्वीकार्य नहीं है, तो उन्हें इस्तीफ़ा दे देना चाहिए” — यह बयान दर्शाता है कि सरकार अब भीतर की असहमति को भी नकारने के मूड में है। एक और महत्वपूर्ण पहलू यह है कि जनमत इस पूरी योजना के खिलाफ है। तीन में से चार इसराइली युद्धविराम और बंधकों की सुरक्षित वापसी के पक्ष में हैं, जबकि नेतन्याहू राजनीतिक अस्तित्व बचाने की जिद में पूरे क्षेत्र को और अधिक रक्तपात की ओर धकेल रहा है।
ग़ज़ा पर पूरी तरह क़ब्ज़े की योजना केवल सैन्य रणनीति नहीं, बल्कि एक राजनीतिक हठ है जो बंधकों की ज़िंदगी, ग़ज़ा की आम जनता और इसराइली समाज — तीनों को खतरनाक दिशा में ले जा सकती है। सवाल यह नहीं है कि नेतन्याहू क्या चाहता है, सवाल यह है कि क्या इस लड़ाई की आग में मासूमों को जलने से बचाया जा सकेगा?